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7 साल का इंतज़ार और बदले में मिली मौत? जोड़ों के बीच से साफ़ दिख रही है नीचे की सड़क!

सात साल के लंबे इंतजार के बाद तैयार हुए इस ढांचे ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी हैं जहाँ विस्तार जोड़ों के बीच से मौत झांक रही है और प्रशासन की खामोशी बड़े हादसे को न्योता दे रही है।

काशीपुर। विनाशकारी लापरवाही की ऐसी भयावह तस्वीर पहले कभी नहीं देखी गई, जहाँ विकास के नाम पर बिछाया गया कंक्रीट का जाल अब मासूम जिंदगियों को निगलने के लिए अपना जबड़ा खोल चुका है। महाराणा प्रताप चौक पर निर्मित इस ROB की स्थिति आज किसी डरावने सपने जैसी हो गई है, जहाँ ऊँचाई पर दौड़ते वाहनों के पहियों के नीचे ज़मीन नहीं, बल्कि मौत की गहरी खाई दिखाई देती है। सात साल के लंबे इंतज़ार और जनता के सब्र की अग्निपरीक्षा के बाद जिस ढांचे को उम्मीदों का पुल बताया गया था, वह आज भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि आखिर किस तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया गया कि उद्घाटन के कुछ समय बाद ही पुल के जोड़ों ने इस कदर दम तोड़ दिया। यह महज़ एक तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि उस तंत्र की विफलता है जिसने जनता के करोड़ों रुपये के टैक्स को मिट्टी में मिलाकर उनके जीवन को जोखिम में डाल दिया है।

वीडियो फाइल के दृश्यों को यदि बारीकी से परखा जाए, तो रूह कांप जाती है क्योंकि पुल के विस्तार जोड़ों (joints) के बीच का फासला इतना विकराल हो गया है कि वहाँ से नीचे की सर्विस रोड और भागते वाहन स्पष्ट रूप से नज़र आ रहे हैं। यह स्थिति उस वक्त और भी खतरनाक हो जाती है जब भारी भरकम ट्रक और बसें इस पुल के ऊपर से गुज़रती हैं, जिससे पूरा ढांचा एक भयानक कंपन के साथ हिलने लगता है। निर्माण के दौरान जो सरिया और लोहे की पत्तियां कंक्रीट के भीतर सुरक्षित होनी चाहिए थीं, वे अब ज़ंग खाई हालत में बाहर की तरफ मुड़ चुकी हैं, जो किसी भी दोपहिया वाहन के टायर को फाड़ने या किसी राहगीर को गंभीर चोट पहुँचाने के लिए काफी हैं। इस पुल की बनावट में आई यह दरार चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता के मानकों को ताक पर रखकर केवल खानापूर्ति की गई है।

क्षेत्र की जनता के सिर पर मंडराता यह खतरा अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ किसी भी पल कोई बड़ी अनहोनी हो सकती है, क्योंकि दरार के भीतर से झांकती रोशनी यह बताने के लिए काफी है कि ऊपर का तल और नीचे की ज़मीन के बीच का संपर्क टूट चुका है। सात साल की लंबी अवधि में इस ढांचे को खड़ा करने वाले ठेकेदारों और इंजीनियरों की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सा सौ पचास दिनों की मेहनत का परिणाम इतना खोखला कैसे हो सकता है? स्थानीय व्यापारियों और राहगीरों का कहना है कि जब पुल का निर्माण चल रहा था, तब उन्होंने धूल और जाम की जो प्रताड़ना झेली थी, उसका सिला उन्हें आज मौत के डर के रूप में मिल रहा है। प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी इस आग में घी डालने का काम कर रही है, क्योंकि इतनी गंभीर समस्या के उजागर होने के बावजूद अभी तक मरम्मत की कोई ठोस कवायद ज़मीन पर दिखाई नहीं दे रही है।

आधुनिक वास्तुकला के इस तथाकथित नमूने ने महाराणा प्रताप चौक के पूरे यातायात तंत्र को एक विस्फोटक स्थिति में पहुँचा दिया है, जहाँ हर गुज़रता वाहन चालक अनजाने में अपनी जान दांव पर लगा रहा है। जब कोई तेज़ रफ्तार कार या बाइक इन जोड़ों के ऊपर से गुज़रती है, तो लगने वाला झटका न केवल वाहन के सस्पेंशन को तोड़ता है, बल्कि चालक के संतुलन को भी बिगाड़ सकता है, जिससे वह सीधे रेलिंग से टकराकर नीचे गिर सकता है। वीडियो साक्ष्यों में साफ दिख रहा है कि कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े उखड़कर नीचे गिर रहे हैं, जिससे नीचे चलने वाली सर्विस रोड पर भी जान का खतरा बढ़ गया है। यह विडंबना ही है कि जिस पुल को सफर आसान करने के लिए बनाया गया था, वह आज एक ऐसा “डेथ ट्रैप” बन गया है जिसे पार करते समय लोग भगवान का नाम जपने को मजबूर हैं।

जनता की सुरक्षा के साथ किए गए इस खिलवाड़ के पीछे जो भ्रष्टाचार का दीमक लगा है, उसने इस ROB की नींव को समय से पहले ही जर्जर बना दिया है, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। महाराणा प्रताप चौक पर रहने वाले निवासियों का आरोप है कि निर्माण सामग्री में रेत और घटिया सीमेंट की मिलावट की गई थी, जिसके कारण आज जोड़ों के बीच का गैप इतना चौड़ा हो गया है कि उसमें एक वयस्क का पैर आसानी से फंस सकता है। यदि समय रहते इन जोड़ों को उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकों से नहीं भरा गया और पूरे ढांचे का सुरक्षा ऑडिट नहीं कराया गया, तो यह लापरवाही आने वाले समय में एक बड़े नरसंहार का कारण बन सकती है। यह खबर उन तमाम अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी एयरकंडीशंड फाइलों में सब कुछ दुरुस्त होने का दावा करते हैं, जबकि हकीकत में आम आदमी की जान हवा में लटकी हुई है।

अंततः, यह केवल एक सड़क या पुल की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की हत्या है जो आम जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों और सरकारी विभागों पर करती है। सात साल तक शोर-शराबा और कागजी घोड़ों को दौड़ाने के बाद मिला यह उपहार अब किसी अभिशाप से कम नहीं लग रहा है, जहाँ हर पल एक नया खतरा जन्म ले रहा है। शासन-प्रशासन को चाहिए कि वे इस वीडियो में दिख रहे जानलेवा सुराखों को गंभीरता से लें और इससे पहले कि किसी घर का चिराग बुझे, इस ढांचे की कायाकल्प करने के लिए कठोर कदम उठाएं। महाराणा प्रताप चौक की चीखती हुई ये दरारें आज इंसाफ मांग रही हैं और पूछ रही हैं कि क्या विकास की कीमत इंसान के खून से चुकाई जाएगी या फिर ज़िम्मेदारों को उनके गुनाहों की सजा मिलेगी।

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