काशीपुर। विश्व भर में विख्यात और भारत की सनातनी संस्कृति की पहचान बन चुके अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के पावन और गौरवमयी अवसर पर देवभूमि के शिक्षण संस्थान श्रीराम इंस्टीट्यूट के विशाल बहुउद्देशीय सभागार में एक बेहद भव्य, अलौकिक और ऊर्जा से सराबोर योगाभ्यास कार्यक्रम का आयोजन अत्यंत सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस विशेष दिन की आभा और महत्ता उस समय कई गुना अधिक बढ़ गई, जब योग महोत्सव के साथ-साथ संस्थान के मार्गदर्शक और अत्यंत सम्मानित अध्यक्ष रविन्द्र कुमार का जन्मदिवस भी पूरे परिसर में बड़े ही अनूठे, उत्साहजनक और हर्षाेल्लासपूर्ण वातावरण के साथ मनाया गया। दोहरे उत्सव के इस सुखद संयोग ने पूरे संस्थान के माहौल को एक नई चेतना और दिव्य खुशियों से सराबोर कर दिया, जिससे वहां मौजूद हर व्यक्ति का चेहरा खिल उठा। इस गरिमापूर्ण और ऐतिहासिक महाआयोजन का विधिवत एवं भव्य शुभारंभ संस्थान के दूरदर्शी निदेशक डॉ. योगराज सिंह के कर-कमलों द्वारा किया गया, जिन्होंने भारतीय परंपरा का निर्वहन करते हुए समारोह में पधारे परम पूजनीय योगाचार्यों का स्वागत अत्यंत आदरपूर्वक उन्हें सुंदर पुष्पगुच्छ और स्मृति-चिह्न भेंट कर किया, जिससे पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
इस वृहद स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना शिविर में मुख्य योगाचार्य आर.सी. शर्मा, जो कि एक प्रख्यात योग प्रशिक्षक होने के साथ-साथ बेहद अनुभवी आयुर्वेदिक कंसलटेंट भी हैं, ने मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए उपस्थित जनसमुदाय को अपनी देखरेख में विभिन्न जटिल और सरल योगासनों का बेहद सूक्ष्मता और वैज्ञानिक तरीके से अभ्यास कराया। उन्होंने अभ्यास के दौरान प्रत्येक आसन के मानव शरीर पर पड़ने वाले चमत्कारी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों के बारे में अत्यंत गूढ़ और विस्तार से महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं, जिसे सुनकर प्रतिभागी मंत्रमुग्ध हो गए। आज की बेहद तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में मानसिक संतुलन को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता, आंतरिक शांति और सकारात्मक सोच के तीव्र विकास हेतु गहन ध्यान (मेडिटेशन) का भी व्यावहारिक अभ्यास कराया, जिससे सभागार में उपस्थित सैकड़ों लोगों ने एक असीम मानसिक शांति और दिव्य ऊर्जा का साक्षात अनुभव किया।

समारोह को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए और अपने जीवन के एक और सफल वर्ष को पूरा करने की खुशी साझा करते हुए संस्थान के ऊर्जावान अध्यक्ष रविन्द्र कुमार ने अत्यंत ओजस्वी शब्दों में कहा कि योग हमारी महान भारत भूमि की एक ऐसी प्राचीन, अद्वितीय और अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है, जिसने वर्तमान समय में अपनी वैज्ञानिकता के दम पर संपूर्ण विश्व पटल पर अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान स्थापित की है। उन्होंने अत्यंत तार्किक रूप से इस बात पर विशेष जोर दिया कि योग को केवल शरीर को बाहरी रूप से स्वस्थ और लचीला रखने का एक साधन या माध्यम मात्र नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि यह तो वास्तव में व्यक्ति के अंतर्मन और संपूर्ण जीवन में एक कड़ा अनुशासन, गहन सकारात्मकता, अडिग आत्मविश्वास और आत्मिक शांति का संचार करने वाली एक संपूर्ण जीवन पद्धति है जो मनुष्य का कायाकल्प कर देती है। उनके इस प्रेरणादायी वक्तव्य ने वहां मौजूद युवाओं और विद्यार्थियों में योग को अपनाने के लिए एक नया जोश और नई उमंग भर दी।
इसी क्रम में विचारों के आदान-प्रदान को आगे बढ़ाते हुए संस्थान के कुशल निदेशक डॉ. योगराज सिंह ने योग दर्शन के गहरे और दार्शनिक पहलुओं पर अपने अत्यंत सारगर्भित और वैचारिक दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए कहा कि योग का वास्तविक और सबसे सुंदर शाब्दिक अर्थ ही ‘जोड़ना’ होता है। उन्होंने बेहद सरल शब्दों में समझाया कि योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को सर्वप्रथम स्वयं के अंतर्मन से, तत्पश्चात समाज के अन्य अंगों से और अंततः इस अनंत प्रकृति की शक्तियों से पूरी तरह से एकाकार करता है। उन्होंने बताया कि नियमित योग साधना से इंसान के भीतर छिपे हुए उत्तम मानवीय मूल्यों जैसे कि निश्छल प्रेम, करुणा, गहरी सहानुभूति, परोपकार की भावना एवं निस्वार्थ सेवा जैसे नैतिक गुणों का स्वाभाविक रूप से विकास होता है तथा यह प्रत्येक मानव को एक पूरी तरह से निरोग, दीर्घायु, संतुलित और मर्यादित जीवन जीने की सबसे उत्तम प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम के उत्तरार्ध में अपने विचार साझा करते हुए संस्थान के प्रबुद्ध प्राचार्य डॉ. एस.एस. कुशवाहा ने वैश्विक परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज यह संपूर्ण विश्व के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव का समय है कि दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देश एवं वहां के आम लोग एक बेहतर स्वास्थ्य, सुदृढ़ रोग प्रतिरोधक क्षमता और स्वस्थ जीवनशैली को प्राप्त करने के लिए पूरी तरह से भारतीय योग विद्या को सहर्ष अपना रहे हैं। उन्होंने गर्व से भरे कंठ से इस बात का उल्लेख किया कि यह हम सभी भारतवासियों के लिए अत्यंत गौरव, सम्मान और अस्मिता का विषय है कि संपूर्ण विश्व को निरोगी काया का मार्ग दिखाने वाले इस महान योग की उत्पत्ति हमारी अपनी पवित्र भारत भूमि पर हुई है और आज पूरी दुनिया हमारे इस ज्ञान के सामने नतमस्तक है। उनके इस वक्तव्य ने राष्ट्रवाद और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना को और अधिक प्रगाढ़ कर दिया।
इस भव्य और ऐतिहासिक योग महाशिविर के मुख्य आकर्षण की बात करें, तो कार्यक्रम के दौरान संस्थान के समस्त ऊर्जावान शिक्षकगण, गैर-शिक्षण कर्मचारी, अधिकारी वर्ग एवं भारी संख्या में उपस्थित छात्र-छात्राओं तथा विद्यार्थियों ने अत्यंत उत्साहपूर्वक और अनुशासित होकर सभी प्रकार के योगासनों, प्राणायामों एवं ध्यान सत्र में अपनी सक्रिय और पूर्ण सहभागिता दर्ज कराई। कड़कड़ाती धूप के बीच भी वातानुकूलित सभागार में बैठे सभी लोगों ने इस अनूठे सत्र के माध्यम से अद्भुत शारीरिक स्फूर्ति और गहरी मानसिक शांति के अनमोल स्वास्थ्य लाभ का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया, जो उनके चेहरों की चमक से साफ दिखाई दे रहा था। इस बेहद सफल, गरिमापूर्ण और राष्ट्रव्यापी महत्व के कार्यक्रम का औपचारिक समापन बहुत ही भावुक और संकल्पित क्षणों के साथ हुआ, जब मुख्य योगाचार्य की उपस्थिति में सभागार में मौजूद सभी सम्मानित प्रतिभागियों, प्राध्यापकों और छात्रों ने जीवनपर्यंत प्रतिदिन नियमित रूप से योगाभ्यास करने और समाज को इस प्रति जागरूक करने का एक स्वर में सामूहिक संकल्प लिया।





