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हर की पैड़ी पर नियमों को ताक पर रखकर शुरू हुआ आस्था के सौदे का नया खेल

ब्रह्मकुंड की पावन धरा पर वैदिक मंत्रों की जगह गूंज रही व्यापार की आवाज और एनजीटी के नियमों को ठेंगा दिखाकर गंगा की निर्मलता से खिलवाड़ कर रही व्यवस्थाओं पर उठे बेहद तीखे सवाल।

हरिद्वार(सुनील कोठारी)। तीर्थनगरी के सबसे पावन स्थल हर की पैड़ी ब्रह्मकुंड की मर्यादा और आध्यात्मिक वातावरण को लेकर इन दिनों चारों तरफ तीखी बहस छिड़ गई है। सनातन धर्म के इस सर्वाेच्च केंद्र से उठ रहे गंभीर स्वर सीधे तौर पर उन व्यवस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, जिन्हें इस पावन क्षेत्र की शुचिता का रक्षक बनाया गया था। आज देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के मन में यह कड़वा सवाल कौंध रहा है कि क्या मोक्षदायिनी मां गंगा के इस परम पवित्र तट पर नियमों की पुरानी संहिता को ताक पर रखकर केवल व्यावसायिक हितों का एक नया साम्राज्य स्थापित कर दिया गया है। जिस स्थल पर कदम रखते ही मनुष्य को अलौकिक शांति और परम तत्व की अनुभूति होनी चाहिए, वहां लगातार बढ़ती अव्यवस्था, अतिक्रमण और व्यावसायिक गतिविधियां आस्थावानों के हृदय को गहरे तक कचोट रही हैं। यह स्थिति उस समय और भी विचलित करने वाली हो जाती है जब हम देखते हैं कि इस पावन धारा की अविरलता को अक्षुण्ण रखने के लिए जिम्मेदार तंत्र स्वयं इस पूरे विवाद के केंद्र में आ गया है।

करोड़ों सनातनी भाई-बहनों की अटूट आस्था के वैश्विक केंद्र पर मंडराते इस संकट ने पूरी धर्मनगरी के प्रबुद्ध समाज को झकझोर कर रख दिया है। सदियों से यह मान्यता रही है कि मां गंगा की इस कल-कल बहती पवित्र धारा के केवल दर्शन मात्र से ही मानव जीवन के समस्त संताप और पाप धुल जाते हैं, परंतु वर्तमान में यहां का दृश्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस दिव्य क्षेत्र की सुदृढ़ व्यवस्था, घाटों के सुचारू संचालन और धार्मिक परंपराओं के अक्षुण्ण निर्वहन के उद्देश्य से ही दशकों पहले श्री गंगा सभा जैसी प्रतिष्ठित संस्था की नींव रखी गई थी। उस समय यह परिकल्पना की गई थी कि यह संस्था गंगा मैया की मर्यादा की प्रहरी बनेगी और यहां आने वाले यात्रियों को एक निश्छल और पूरी तरह से आध्यात्मिक वातावरण उपलब्ध कराएगी। परंतु आज धरातल पर जो परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं, वे इस मूल भावना के ठीक विपरीत जाती प्रतीत होती हैं, जिससे यह आशंका बलवती होने लगी है कि संस्था अपने मुख्य उद्देश्यों से भटक चुकी है।

नगर पालिका अधिनियम 1916 के प्राचीन प्रावधानों पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि हर की पैड़ी की पावनता को सुरक्षित रखने के लिए बेहद कड़े और स्पष्ट नियम बनाए गए थे। इन विधिक प्रावधानों के तहत ब्रह्मकुंड के संपूर्ण संवेदनशील और धार्मिक परिक्षेत्र में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि, अनधिकृत सामान बेचने, फेरी लगाने अथवा मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू किया गया था। विडंबना देखिए कि एक सदी से भी अधिक समय पूर्व बनाए गए ये नियम आज भी कागजों पर पूरी तरह प्रभावी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में इनकी धज्जियां उड़ती साफ देखी जा सकती हैं। स्थानीय नागरिकों से लेकर दूर-दराज से आने वाले तीर्थयात्रियों तक, हर कोई यह पूछ रहा है कि आखिर किसकी शह पर इन कड़े नियमों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। घाटों पर जिस तरह से अनियंत्रित तरीके से व्यावसायिक गतिविधियां फल-फूल रही हैं, उसने प्रशासनिक तंत्र और प्रबंधकीय संस्था की कार्यप्रणाली पर बहुत बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

ब्रह्मकुंड की पावन परिधि में प्रवेश करते ही जहां कानों में वेदों की ऋचाएं, दिव्य मंत्रोच्चार और शंखध्वनि की गूंज सुनाई देनी चाहिए थी, वहां अब पूजन सामग्री और फूलों के दोने बेचने वालों की ऊंची आवाजें कानों को चुभने लगी हैं। देव विग्रहों के सम्मुख जहां भक्त बैठकर ध्यान लगाते थे और शांत चित्त से ईश्वर की आराधना में लीन होते थे, वहां अब चारों तरफ फूलों के बड़े-बड़े ढेर और व्यापारिक सामान का जमावड़ा दिखाई देता है। आस्था के इस पावन आँगन में धीरे-धीरे पैर पसार रहे इस घोर व्यावसायिक माहौल ने श्रद्धालुओं को गहरे असमंजस और मानसिक पीड़ा में डाल दिया है। लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या धर्म की इस वैश्विक राजधानी का हृदय स्थल अब अपने आध्यात्मिक स्वरूप को खोकर पूरी तरह से एक बड़े बाजार के रूप में तब्दील होता जा रहा है, जहां श्रद्धा की जगह केवल और केवल मुनाफे को ही प्राथमिकता दी जा रही है।

जल की स्वच्छता और पर्यावरण संतुलन को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी द्वारा समय-समय पर जारी किए गए बेहद कड़े दिशा-निर्देशों की भी इस क्षेत्र में जमकर अनदेखी हो रही है। पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि टन के हिसाब से गंगा जी में प्रवाहित होने वाले फूल, पत्ते, प्लास्टिक और अन्य सामग्रियां नदी के जल को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रही हैं और उसकी जैविक गुणवत्ता को नष्ट कर रही हैं। इसके बावजूद हर की पैड़ी पर इस तरह की पूजन सामग्रियों की अनियंत्रित बिक्री और फिर उनका सीधे जलधारा में विसर्जन बेधड़क जारी है, जिसे रोकने में जिम्मेदार तंत्र पूरी तरह नाकाम सिद्ध हुआ है। जब संपूर्ण राष्ट्र में गंगा की निर्मलता को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जा रही है, तब आस्था के सबसे बड़े केंद्र पर ही प्रदूषण फैलाने वाले इन कारकों पर कोई प्रभावी अंकुश न होना बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक विषय है।

घाटों पर पुरोहितों के बैठने के लिए बने पारंपरिक तख्तों के उपयोग को लेकर भी इन दिनों तीर्थयात्रियों के बीच तीखा असंतोष और तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जिन चौकियों और तख्तों को मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, संकल्पों और पूजा-अर्चना के संपादन के लिए आरक्षित होना चाहिए था, उनमें से कई अब फूल-फरोशी और अन्य व्यापारिक लेन-देन के बड़े अड्डों में तब्दील हो चुके हैं। आम जनता के बीच यह चर्चा बेहद आम हो चुकी है कि इन तख्तों के आसपास पूजन सामग्री बेचने का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है जो लगातार अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सख्त रवैए और कचरा नियंत्रण के दावों के बीच इस प्रकार के कारोबार का निरंतर फलना-फूलना यह साबित करता है कि नियमों की कड़ाई केवल फाइलों तक ही सीमित है और धरातल पर किसी भी प्रकार की कोई ठोस या पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती।

यह संपूर्ण परिदृश्य हमें आधुनिक भारत के महान निर्माता और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय जी के उन महान आदर्शों की याद दिलाता है, जिन्होंने गंगा संरक्षण के संकल्प के साथ इस पूरी व्यवस्था का ताना-बाना बुना था। मालवीय जी ने जिस पावन सोच, दूरदर्शिता और अटूट धार्मिक निष्ठा के साथ इस क्षेत्र की गरिमा बनाए रखने की नींव रखी थी, आज उनकी वह मूल भावना कहीं गहरे मलबे में दबी नजर आती है। आज जब हर की पैड़ी का आम श्रद्धालु इस अव्यवस्था को देखता है, तो उसके मन में स्वतः ही यह आत्ममंथन का प्रश्न उठता है कि क्या हम अपने उन महान पूर्वजों के सपनों को सुरक्षित रख पाए हैं। क्या सचमुच आज मां गंगा की अविरलता और घाटों की स्वच्छता हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है, या फिर हमने आस्था के नाम पर केवल आडंबर और व्यापारिक हितों को ही अपनी व्यवस्था का मुख्य आधार बना लिया है।

यह पावन धरोहर किसी एक विशिष्ट व्यक्ति, प्रभावशाली संस्था या सरकारी विभाग की बपौती नहीं है, बल्कि यह तो इस धरा पर रहने वाले करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों के अटूट विश्वास, समर्पण और प्राणों से प्रिय आस्था का प्रतीक है। इसलिए आज समय की यह सबसे बड़ी मांग है कि इस पावन क्षेत्र की गरिमा को पुनर्स्थापित करने के लिए मां गंगा की निर्मलता को बिना किसी समझौते के सर्वाेपरि स्थान दिया जाए। घाटों की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने वाले नियमों को बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग और हर रसूखदार व्यक्ति पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। जब तक व्यवस्था में पूरी तरह से पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी और श्रद्धालुओं की कोमल धार्मिक भावनाओं का सम्मान सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक इस पावन क्षेत्र की शुचिता पर उठने वाले इन गंभीर और तीखे सवालों का अंत होना संभव नहीं दिखता है।

हर की पैड़ी के घाटों पर हर रोज शाम को लाउडस्पीकरों के माध्यम से हजारों-लाखों की भीड़ को गंगा की स्वच्छता बनाए रखने और उसमें गंदगी न फैलाने की बड़ी-बड़ी कसमें और शपथ दिलाई जाती हैं। परंतु विरोधाभास देखिए कि जब वही श्रद्धालु अपनी आंखें खोलकर चारों तरफ फैले व्यावसायिक जाल और नियमों के सरेआम उल्लंघन को देखता है, तो उसका व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। वह यह जानने का पूरा हक रखता है कि क्या वे आदर्श और नियम केवल आम जनता के लिए हैं या फिर व्यवस्था की बागडोर संभालने वाले कर्णधारों और रसूखदारों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। क्या कभी वह शुभ दिन आएगा जब इस परम पावन तीर्थ की आत्मा को व्यावसायिक लाभ के दलदल से बाहर निकालकर अध्यात्म के ऊंचे शिखर पर स्थापित किया जाएगा। इन यक्ष प्रश्नों का उत्तर केवल प्रशासन या श्री गंगा सभा को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जागरूक समाज को मिलकर खोजना होगा क्योंकि यह विषय महज प्रशासनिक दांव-पेंच का नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवनदायिनी मां गंगा की अस्मिता से जुड़ा है।

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