भारत(सुनील कोठारी)। भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षितिज पर वर्ष 2026 की शुरुआत किसी काली छाया से कम नहीं रही है जहां आसमान छूती रसोई गैस की कीमतों ने आम आदमी के जीवन को दुश्वारियों के भंवर में झोंक दिया है। देश का मध्यम वर्ग हो या दो वक्त की रोटी के लिए जूझता निम्न आय वर्ग एलपीजी के दामों में आई बेतहाशा आग ने हर घर के बजट को राख कर दिया है। जनवरी से लेकर मई 2026 के इन पांच महीनों में गैस सिलेंडरों की कीमतों में जो उतार चढ़ाव और क्रूर बढ़ोतरी देखी गई है उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल में महंगाई अब केवल एक आर्थिक समस्या नहीं बल्कि एक भयावह मानवीय त्रासदी का रूप ले चुकी है। जनता अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए त्राहि त्राहि कर रही है लेकिन विडंबना देखिए कि सत्ता के गलियारों में बैठे नीति नियंता इस चीख पुकार से बेखबर होकर केवल आंकड़ों की बाजीगरी में मशगूल हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि कीमतों का यह तांडव उस समय और उग्र हो गया जब देश में चुनावी शोर थम चुका था जिससे यह आभास होता है कि जनता की जेब पर डाका डालना अब व्यवस्था का नया सामान्य बन चुका है।
कीमतों के इस खूनी खेल का सिलसिला जनवरी के ठंडे महीनों से शुरू हुआ था जब धीरे धीरे अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता का हवाला देकर तेल कंपनियों ने अपने हाथ खोलने शुरू किए। फरवरी के अंत तक आते आते पश्चिम एशिया के तनाव ने आग में घी का काम किया लेकिन असली तबाही मार्च के महीने में शुरू हुई। 7 मार्च 2026 की उस सुबह को देश कभी नहीं भूल पाएगा जब घरेलू गैस के 14.2 किलो वाले सिलेंडर पर अचानक ₹60 का बोझ लाद दिया गया जिसके बाद देश की राजधानी दिल्ली में एक सिलेंडर की कीमत ₹913 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई। इसी दौरान कमर्शियल सिलेंडर पर भी ₹114.50 की मार पड़ी जिसने छोटे दुकानदारों के माथे पर पसीने की बूंदें ला दीं। अप्रैल का महीना आते ही 1 तारीख को कमर्शियल गैस के दाम फिर से ₹196 बढ़ा दिए गए लेकिन यह तो बस आने वाले तूफान की आहट मात्र थी। जैसे ही मई का महीना शुरू हुआ सरकार और तेल विपणन कंपनियों ने महा विस्फोट करते हुए कमर्शियल गैस की कीमतों में ₹993 की ऐसी ऐतिहासिक और कमरतोड़ वृद्धि की जिसने 19 किलो के सिलेंडर की कीमत को ₹3,071.50 के डरावने स्तर पर पहुंचा दिया।
इस आर्थिक सुनामी का सबसे वीभत्स रूप भारत की स्ट्रीट इकोनॉमी यानी हमारे उन मेहनतकश रेहड़ी पटरी वालों पर देखने को मिल रहा है जो लोकतंत्र की असली बुनियाद हैं। जो छोटे उद्यमी सड़क किनारे अपनी छोटी सी चाय की दुकान पकौड़े का ठेला या छोटा सा ढाबा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते थे उनके लिए एलपीजी की ये नई कीमतें किसी डेथ वारंट से कम साबित नहीं हो रही हैं। कल्पना कीजिए उस रेहड़ी वाले की जिसकी कुल जमा दैनिक कमाई ₹500 से ₹700 के बीच होती है वह अब एक झटके में सिलेंडर की कीमत में हुई ₹1000 की बढ़ोतरी को कैसे झेलेगा। कमर्शियल गैस का दाम ₹3000 के पार निकल जाने का सीधा अर्थ यह है कि अब चाय का एक प्याला या साधारण भोजन की एक थाली बेचना भी घाटे का सौदा बन चुका है। लागत और मुनाफे का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है जिसके कारण देश के हजारों छोटे होटलों और ढाबों पर ताले लटक गए हैं। मजबूरन लोग फिर से पुराने और असुरक्षित तरीकों जैसे कोयले या लकड़ी के चूल्हे की ओर लौट रहे हैं जो न केवल उनके स्वास्थ्य को लील रहा है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के दावों की भी धज्जियां उड़ा रहा है।

बाजार में केवल कीमतों की ही समस्या नहीं है बल्कि आधिकारिक दाम बढ़ने के साथ ही कालाबाजारी का एक नया और संगठित तंत्र सक्रिय हो गया है जिसने छोटे व्यापारियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया है। जब सरकारी दरें बढ़ती हैं तो सिलेंडरों की कृत्रिम किल्लत पैदा कर दी जाती है जिसके परिणामस्वरूप दूर दराज के इलाकों और छोटे कस्बों में लोग एक सिलेंडर के लिए ₹6,000 तक की फिरौती देने को मजबूर हो रहे हैं। मोदी सरकार की नीतियों का विश्लेषण करें तो यह साफ झलकता है कि आम जनता को राहत के कागजी दावों और सुनहरे भविष्य के मायाजाल में उलझाकर रखा जा रहा है। उज्ज्वला योजना जैसी महत्वाकांक्षी स्कीमों का ढोल तो बहुत जोर शोर से पीटा गया लेकिन हकीकत यह है कि ₹300 की प्रतीकात्मक सब्सिडी अब उस ऊंट के मुंह में जीरे के समान है जो ₹1000 के घरेलू गैस सिलेंडर को भरवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। सब्सिडी का पैसा बैंक खातों में आने की प्रक्रिया इतनी पेचीदा और अनिश्चित है कि गरीब परिवारों ने अब सिलेंडर को कोने में रखकर फिर से धुएं वाली रसोई को अपना नसीब मान लिया है।
विपक्षी दलों और आर्थिक जानकारों का यह सीधा आरोप है कि केंद्र की मोदी सरकार ने चुनाव के दौरान कीमतों को जानबूझकर थामे रखा और जैसे ही मतदान की प्रक्रिया पूरी हुई जनता पर महंगाई का बम फोड़ दिया। इसे आम नागरिक के साथ एक बहुत बड़ा विश्वासघात माना जा रहा है क्योंकि जिस जनता ने भारी उम्मीदों के साथ सत्ता की चाबी सौंपी थी उसे ही अब विश्व गुरु और विकसित भारत के नारों के बीच महंगाई की आग में झोंका जा रहा है। जब देश का बुनियादी ईंधन ही आम आदमी की पहुंच से दूर हो जाए तो विकास की बड़ी बड़ी बातें बेमानी लगने लगती हैं। गैस के दामों में लगी यह आग केवल रसोई तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसने पूरी अर्थव्यवस्था में एक भयावह डोमिनोज़ इफ़ेक्ट पैदा कर दिया है। कमर्शियल गैस महंगी होने का सीधा असर खाद्य महंगाई पर पड़ा है जिससे बाहर का खाना मिठाइयां और यहां तक कि रोजमर्रा का नाश्ता भी महंगा हो गया है। मध्यमवर्गीय परिवारों की हालत यह है कि वे अब अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जरूरी खर्चों में कटौती करके रसोई गैस के बिलों का भुगतान कर रहे हैं।
लगातार बढ़ती इन कीमतों ने भारतीय समाज में एक गहरा मनोवैज्ञानिक दबाव और असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है जहां लोग अब यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी कड़ी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स और महंगे ईंधन की भेंट चढ़ रहा है। जनता के भीतर पनप रहा यह क्रोध अब सड़कों पर भी दिखने लगा है जहां मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान दिल्ली हैदराबाद और विजयवाड़ा जैसे बड़े शहरों में गैस की किल्लत और कीमतों के खिलाफ बड़े पैमाने पर उग्र प्रदर्शन हुए हैं। मोदी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की राजनीति में रसोई और महंगाई हमेशा से निर्णायक कारक रहे हैं और जब जब जनता की थाली और चूल्हे पर प्रहार हुआ है तब तब बड़े बड़े सिंहासनों की नींव हिल गई है। जो जनता कभी मोदी जी को सिर आंखों पर बिठाती थी वही अब 2014 से पहले के दामों और आज की स्थितियों की तुलना कर रही है जो सरकार की लोकप्रियता के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। जनता की चुप्पी को उसकी कमजोरी समझना सत्ता की सबसे बड़ी भूल हो सकती है क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय उसी जनता के हाथ में होता है जो आज त्राहि त्राहि कर रही है।

अंततः जनवरी से मई 2026 के बीच एलपीजी की कीमतों में आई यह सुनामी केवल एक आर्थिक रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है बल्कि यह उन करोड़ों भारतीय आंखों के आंसू हैं जो धुएं और महंगाई के बीच अपना भविष्य तलाश रहे हैं। केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र का विकास उसकी जनता की खुशहाली में निहित होता है न कि उसे महंगाई की आग में झोंकने में। यदि सरकार ने जल्द ही ठोस कदम उठाते हुए कमर्शियल और घरेलू गैस की कीमतों पर लगाम नहीं लगाई और छोटे व्यापारियों व रेहड़ी पटरी वालों को वास्तविक राहत नहीं दी तो यह महंगाई का मुद्दा आने वाले समय में सत्ता के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन जाएगा। जनता अब झूठ और भ्रम के पर्दों को फाड़कर वास्तविकता देख रही है और वह सही समय पर अपने इस उत्पीड़न का हिसाब मांगने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है। समय आ गया है कि सरकार वैश्विक संकटों का बहाना छोड़कर अपनी घरेलू जिम्मेदारी समझे और मध्यम व गरीब वर्ग के चूल्हे को बुझने से बचाए वरना इतिहास के पन्नों में यह दौर केवल जनता के संघर्ष और सरकार की विफलता के रूप में दर्ज होगा।





