नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश के सियासी गलियारों में इस वक्त महिला आरक्षण को लेकर जो शोर मचा है, उसने आम जनमानस को भ्रम की एक ऐसी भूलभुलैया में धकेल दिया है जहाँ सच और झूठ की लकीरें धुंधली पड़ चुकी हैं। बीते चौबीस घंटों से हर तरफ यही खबर सुर्खियां बटोर रही है कि नारी शक्ति के अधिकारों पर प्रहार हुआ है, लेकिन इस पूरी गहमागहमी के बीच जो बात जानबूझकर छिपाई जा रही है, वह यह है कि परोसी जा रही खबरें पूरी तरह से तथ्यहीन और भ्रामक हैं। मुख्यधारा के मीडिया से लेकर अखबारों के पन्नों तक जिस ‘महिला आरक्षण बिल’ के गिरने का मातम मनाया जा रहा है, असल में वह बिल तो अस्तित्व में ही नहीं है क्योंकि वह बहुत पहले ही कानून की शक्ल अख्तियार कर चुका है। यह पत्रकारिता के गिरते स्तर का ही प्रमाण है कि बुनियादी शोध किए बिना जनता के सामने एक ऐसा नैरेटिव पेश किया जा रहा है जिसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है। सच्चाई तो यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंकने में मशगूल हैं, जबकि मूल कानून के प्रावधानों और हालिया संशोधनों को लेकर जनता को अंधेरे में रखा जा रहा है।
राजनीतिक चश्मे को उतारकर अगर हम संवैधानिक दस्तावेजों को खंगालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि महिला आरक्षण कोई आज का मुद्दा नहीं है जिसे अचानक से गिरा दिया गया हो। भारतीय इतिहास के सुनहरे पन्नों में यह दर्ज है कि सितंबर दौ हज़ार तेईस में ही इस विधेयक ने अपनी कानूनी यात्रा पूरी कर ली थी, जब संसद के दोनों सदनों ने इसे अपनी स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद अट्ठाईस सितंबर दौ हज़ार तेईस का वह ऐतिहासिक दिन आया जब महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने हस्ताक्षरों से इसे कानून के रूप में मान्यता दी। इतना ही नहीं, महज कुछ ही दिन पहले यानी सोलह अप्रैल दौ हज़ार छब्बीस को इस कानून को विधिवत रूप से अधिसूचित (नोटिफाई) भी कर दिया गया था, जिसमें महिलाओं को स्पष्ट रूप से तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब कानून पहले से ही प्रभावी है, तो फिर मीडिया किस ‘बिल’ के गिरने का ढोल पीट रहा है और क्यों देश को गुमराह किया जा रहा है?
वर्तमान में जो विवाद का असली केंद्र है, वह कोई नया बिल नहीं बल्कि दौ हज़ार तेईस के मूल कानून में किया गया एक विशिष्ट संवैधानिक बदलाव है। सरकार द्वारा लाया गया एक सौ इकतीस वां संशोधन ही वह धुरी है जिसके चारों ओर आज की पूरी राजनीति घूम रही है, मगर कोई भी समाचार चैनल इस तकनीकी बारीकी को समझाने का कष्ट नहीं कर रहा है। यहाँ असली खेल शब्दों और तारीखों का है, जिसे बीजेपी, कांग्रेस, एनडी और इंडिया गठबंधन जैसे तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। पत्रकारिता का धर्म तो यह था कि वह जनता को यह बताती कि सरकार इस संशोधन की आड़ में क्या छुपाना चाह रही है या विपक्ष इसके विरोध में कौन से नए तर्क गढ़ रहा है। अफसोस की बात यह है कि निष्पक्षता की कसौटी पर सब फेल नजर आ रहे हैं और खबर के नाम पर सिर्फ एक ‘प्रोपेगेंडा’ परोसा जा रहा है जो असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए काफी है।
विपक्ष के लगातार बढ़ते दबाव और चुनावी गणित के बीच सरकार की मंशा पर भी अब उंगलियां उठने लगी हैं, खासकर उस प्रावधान को लेकर जो आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ता है। जब दौ हज़ार तेईस में यह ऐतिहासिक कानून बनाया गया था, तब सरकार ने इसे चतुराई से दौ हज़ार छः सौ सत्ताईस की संभावित जनगणना और उसके बाद होने वाले निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण यानी परिसीमन के साथ नत्थी कर दिया था। अब सत्ता पक्ष को यह आभास हो रहा है कि जातिगत जनगणना की बढ़ती मांग के बीच परिसीमन की प्रक्रिया एक पेचीदा राजनीतिक जाल बन सकती है, जिसमें उलझने पर चुनावी समीकरण बिगड़ने का डर है। इसी डर के चलते अब गुपचुप तरीके से यह कोशिश की जा रही है कि दौ हज़ार ग्यारह की पुरानी जनगणना को ही परिसीमन का आधार मान लिया जाए। यह ‘कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना’ वाली पुरानी कहावत को चरितार्थ करता है, जहाँ रक्षा कवच के नाम पर असल में राजनीतिक सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है।
देश में नारी सशक्तीकरण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं के लिए आंकड़े किसी आईने से कम नहीं हैं, जो यह बताते हैं कि हमारी कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है। हमने महिलाओं के उत्थान के लिए सशक्तिकरण वर्ष तो दौ हज़ार दौ में ही घोषित कर दिया था, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अगर हम भारत की स्थिति देखें, तो संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में हम दुनिया के एक सौ नब्बे देशों की सूची में शर्मनाक तरीके से एक सौ सैंतालीस वें पायदान पर खड़े हैं। यह आंकड़ा यह साबित करने के लिए काफी है कि सत्ता की मलाई चखने वाले पुरुष प्रधान समाज ने किस तरह महिलाओं को केवल कागजी अधिकारों तक सीमित रखा है। राजनीति का यह हमाम ऐसा है जहाँ हर कोई नंगा नजर आता है, क्योंकि जब वास्तव में हक देने की बारी आती है, तो जनगणना और परिसीमन जैसे बहाने सामने लाकर आधी आबादी को फिर से कतार के अंत में खड़ा कर दिया जाता है।
संसद की पोल-पट्टी अगर ढंग से खोली जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि महिला आरक्षण के नाम पर सिर्फ और सिर्फ वोटों की सौदेबाजी हो रही है। सरकार कह रही है कि वह महिलाओं को उनका हक दे रही है, लेकिन अगर नीयत साफ होती तो दौ हज़ार चौबीस के लोकसभा चुनाव में ही इसे लागू क्यों नहीं किया गया? क्यों महिलाओं को अगले कई सालों तक सिर्फ एक उम्मीद के सहारे छोड़ दिया गया? यह पूरा प्रपंच केवल इसलिए रचा जा रहा है ताकि महिलाओं को एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा सके और सत्ता की कुर्सी को सुरक्षित रखा जा सके। आज देश के हर नागरिक को यह पूछने की जरूरत है कि क्या वाकई यह संशोधन महिलाओं के हित में है या फिर यह परिसीमन के नाम पर किया जा रहा कोई नया राजनीतिक खेल है। अब समय आ गया है कि जनता सीधे सवाल पूछे और इन नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करे, क्योंकि यह लड़ाई अब केवल आरक्षण की नहीं बल्कि हमारे लोकतंत्र की साख की है।
महिला आरक्षण के इस पूरे घटनाक्रम को अगर गहराई से परखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्ता के गलियारों में बुना गया यह जाल जितना संवैधानिक दिखता है, उससे कहीं अधिक रणनीतिक है। दशकों से प्रतीक्षारत इस अधिकार को जब कानून की शक्ल दी गई, तो उसके साथ जुड़ी शर्तों और भविष्य की तारीखों ने इसकी पारदर्शिता पर कई गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। वर्तमान परिस्थितियों में जब डेटा, जनगणना और परिसीमन के तकनीकी पेंचों को ढाल बनाया जा रहा है, तब आम नागरिक के मन में यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या वाकई व्यवस्था की मंशा आधी आबादी को निर्णायक भूमिका में लाने की है। लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर यह बहस केवल नीतिगत नहीं बल्कि नैतिक भी हो चुकी है, क्योंकि अधिकारों की घोषणा और उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच का फासला ही किसी सरकार की ईमानदारी को दर्शाता है। अंततः, आज की सबसे बड़ी विवेचना यही है कि क्या यह आरक्षण वाकई एक रक्षा कवच है या फिर यह सिर्फ एक चुनावी लॉलीपॉप है जिसे जनता को बहलाने के लिए पेश किया गया है? आने वाला समय और लागू होने वाली प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि महिलाओं का यह संवैधानिक हक उनकी ताकत बनेगा या फिर राजनीतिक शतरंज की एक और बिछी हुई चाल बनकर रह जाएगा।





