spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeभारतमहिला आरक्षण कानून की आड़ में छिपी सत्ता की असली सच्चाई और...

महिला आरक्षण कानून की आड़ में छिपी सत्ता की असली सच्चाई और जनगणना का भयंकर खेल सच जानिए

बिल की आड़ में छिपी कानून की असली हकीकत और जनगणना के चक्रव्यूह में फंसा महिलाओं का संवैधानिक हक जो सत्ता के गलियारों में अब महज एक चुनावी मोहरा बनकर रह गया है।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश के सियासी गलियारों में इस वक्त महिला आरक्षण को लेकर जो शोर मचा है, उसने आम जनमानस को भ्रम की एक ऐसी भूलभुलैया में धकेल दिया है जहाँ सच और झूठ की लकीरें धुंधली पड़ चुकी हैं। बीते चौबीस घंटों से हर तरफ यही खबर सुर्खियां बटोर रही है कि नारी शक्ति के अधिकारों पर प्रहार हुआ है, लेकिन इस पूरी गहमागहमी के बीच जो बात जानबूझकर छिपाई जा रही है, वह यह है कि परोसी जा रही खबरें पूरी तरह से तथ्यहीन और भ्रामक हैं। मुख्यधारा के मीडिया से लेकर अखबारों के पन्नों तक जिस ‘महिला आरक्षण बिल’ के गिरने का मातम मनाया जा रहा है, असल में वह बिल तो अस्तित्व में ही नहीं है क्योंकि वह बहुत पहले ही कानून की शक्ल अख्तियार कर चुका है। यह पत्रकारिता के गिरते स्तर का ही प्रमाण है कि बुनियादी शोध किए बिना जनता के सामने एक ऐसा नैरेटिव पेश किया जा रहा है जिसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है। सच्चाई तो यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंकने में मशगूल हैं, जबकि मूल कानून के प्रावधानों और हालिया संशोधनों को लेकर जनता को अंधेरे में रखा जा रहा है।

राजनीतिक चश्मे को उतारकर अगर हम संवैधानिक दस्तावेजों को खंगालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि महिला आरक्षण कोई आज का मुद्दा नहीं है जिसे अचानक से गिरा दिया गया हो। भारतीय इतिहास के सुनहरे पन्नों में यह दर्ज है कि सितंबर दौ हज़ार तेईस में ही इस विधेयक ने अपनी कानूनी यात्रा पूरी कर ली थी, जब संसद के दोनों सदनों ने इसे अपनी स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद अट्ठाईस सितंबर दौ हज़ार तेईस का वह ऐतिहासिक दिन आया जब महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने हस्ताक्षरों से इसे कानून के रूप में मान्यता दी। इतना ही नहीं, महज कुछ ही दिन पहले यानी सोलह अप्रैल दौ हज़ार छब्बीस को इस कानून को विधिवत रूप से अधिसूचित (नोटिफाई) भी कर दिया गया था, जिसमें महिलाओं को स्पष्ट रूप से तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब कानून पहले से ही प्रभावी है, तो फिर मीडिया किस ‘बिल’ के गिरने का ढोल पीट रहा है और क्यों देश को गुमराह किया जा रहा है?

वर्तमान में जो विवाद का असली केंद्र है, वह कोई नया बिल नहीं बल्कि दौ हज़ार तेईस के मूल कानून में किया गया एक विशिष्ट संवैधानिक बदलाव है। सरकार द्वारा लाया गया एक सौ इकतीस वां संशोधन ही वह धुरी है जिसके चारों ओर आज की पूरी राजनीति घूम रही है, मगर कोई भी समाचार चैनल इस तकनीकी बारीकी को समझाने का कष्ट नहीं कर रहा है। यहाँ असली खेल शब्दों और तारीखों का है, जिसे बीजेपी, कांग्रेस, एनडी और इंडिया गठबंधन जैसे तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। पत्रकारिता का धर्म तो यह था कि वह जनता को यह बताती कि सरकार इस संशोधन की आड़ में क्या छुपाना चाह रही है या विपक्ष इसके विरोध में कौन से नए तर्क गढ़ रहा है। अफसोस की बात यह है कि निष्पक्षता की कसौटी पर सब फेल नजर आ रहे हैं और खबर के नाम पर सिर्फ एक ‘प्रोपेगेंडा’ परोसा जा रहा है जो असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए काफी है।

विपक्ष के लगातार बढ़ते दबाव और चुनावी गणित के बीच सरकार की मंशा पर भी अब उंगलियां उठने लगी हैं, खासकर उस प्रावधान को लेकर जो आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ता है। जब दौ हज़ार तेईस में यह ऐतिहासिक कानून बनाया गया था, तब सरकार ने इसे चतुराई से दौ हज़ार छः सौ सत्ताईस की संभावित जनगणना और उसके बाद होने वाले निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण यानी परिसीमन के साथ नत्थी कर दिया था। अब सत्ता पक्ष को यह आभास हो रहा है कि जातिगत जनगणना की बढ़ती मांग के बीच परिसीमन की प्रक्रिया एक पेचीदा राजनीतिक जाल बन सकती है, जिसमें उलझने पर चुनावी समीकरण बिगड़ने का डर है। इसी डर के चलते अब गुपचुप तरीके से यह कोशिश की जा रही है कि दौ हज़ार ग्यारह की पुरानी जनगणना को ही परिसीमन का आधार मान लिया जाए। यह ‘कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना’ वाली पुरानी कहावत को चरितार्थ करता है, जहाँ रक्षा कवच के नाम पर असल में राजनीतिक सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है।

देश में नारी सशक्तीकरण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं के लिए आंकड़े किसी आईने से कम नहीं हैं, जो यह बताते हैं कि हमारी कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है। हमने महिलाओं के उत्थान के लिए सशक्तिकरण वर्ष तो दौ हज़ार दौ में ही घोषित कर दिया था, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अगर हम भारत की स्थिति देखें, तो संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में हम दुनिया के एक सौ नब्बे देशों की सूची में शर्मनाक तरीके से एक सौ सैंतालीस वें पायदान पर खड़े हैं। यह आंकड़ा यह साबित करने के लिए काफी है कि सत्ता की मलाई चखने वाले पुरुष प्रधान समाज ने किस तरह महिलाओं को केवल कागजी अधिकारों तक सीमित रखा है। राजनीति का यह हमाम ऐसा है जहाँ हर कोई नंगा नजर आता है, क्योंकि जब वास्तव में हक देने की बारी आती है, तो जनगणना और परिसीमन जैसे बहाने सामने लाकर आधी आबादी को फिर से कतार के अंत में खड़ा कर दिया जाता है।

संसद की पोल-पट्टी अगर ढंग से खोली जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि महिला आरक्षण के नाम पर सिर्फ और सिर्फ वोटों की सौदेबाजी हो रही है। सरकार कह रही है कि वह महिलाओं को उनका हक दे रही है, लेकिन अगर नीयत साफ होती तो दौ हज़ार चौबीस के लोकसभा चुनाव में ही इसे लागू क्यों नहीं किया गया? क्यों महिलाओं को अगले कई सालों तक सिर्फ एक उम्मीद के सहारे छोड़ दिया गया? यह पूरा प्रपंच केवल इसलिए रचा जा रहा है ताकि महिलाओं को एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा सके और सत्ता की कुर्सी को सुरक्षित रखा जा सके। आज देश के हर नागरिक को यह पूछने की जरूरत है कि क्या वाकई यह संशोधन महिलाओं के हित में है या फिर यह परिसीमन के नाम पर किया जा रहा कोई नया राजनीतिक खेल है। अब समय आ गया है कि जनता सीधे सवाल पूछे और इन नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करे, क्योंकि यह लड़ाई अब केवल आरक्षण की नहीं बल्कि हमारे लोकतंत्र की साख की है।

महिला आरक्षण के इस पूरे घटनाक्रम को अगर गहराई से परखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्ता के गलियारों में बुना गया यह जाल जितना संवैधानिक दिखता है, उससे कहीं अधिक रणनीतिक है। दशकों से प्रतीक्षारत इस अधिकार को जब कानून की शक्ल दी गई, तो उसके साथ जुड़ी शर्तों और भविष्य की तारीखों ने इसकी पारदर्शिता पर कई गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। वर्तमान परिस्थितियों में जब डेटा, जनगणना और परिसीमन के तकनीकी पेंचों को ढाल बनाया जा रहा है, तब आम नागरिक के मन में यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या वाकई व्यवस्था की मंशा आधी आबादी को निर्णायक भूमिका में लाने की है। लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर यह बहस केवल नीतिगत नहीं बल्कि नैतिक भी हो चुकी है, क्योंकि अधिकारों की घोषणा और उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच का फासला ही किसी सरकार की ईमानदारी को दर्शाता है। अंततः, आज की सबसे बड़ी विवेचना यही है कि क्या यह आरक्षण वाकई एक रक्षा कवच है या फिर यह सिर्फ एक चुनावी लॉलीपॉप है जिसे जनता को बहलाने के लिए पेश किया गया है? आने वाला समय और लागू होने वाली प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि महिलाओं का यह संवैधानिक हक उनकी ताकत बनेगा या फिर राजनीतिक शतरंज की एक और बिछी हुई चाल बनकर रह जाएगा।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!