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ऐतिहासिक द्रोण सागर की पौराणिक धरोहर पर अतिक्रमण और चढ़ावे में धांधली पर हाईकोर्ट सख्त

महाभारत कालीन द्रोण सागर की पौराणिक भूमि पर भू-माफियाओं के अवैध कब्जों ने पकड़ा तूल, मंदिरों के चढ़ावे में भारी हेरफेर और प्रशासन की संदिग्ध चुप्पी पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा चार सप्ताह में विस्तृत जवाब।

नैनीताल/काशीपुर। उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने काशीपुर के गौरवशाली इतिहास और पौराणिक अस्मिता के प्रतीक द्रोण सागर की भूमि पर बढ़ते अवैध कब्जों और धार्मिक चढ़ावे की बंदरबांट को लेकर दायर जनहित याचिका पर आज एक बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की गरिमामयी खंडपीठ ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट और कड़े निर्देश जारी किए हैं कि आगामी चार सप्ताह के भीतर इस पूरे प्रकरण पर एक विस्तृत और पारदर्शी शपथ पत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। यह मामला केवल भूमि विवाद का नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत को बचाने का है जिसकी जड़ें द्वापर युग और महाभारत कालीन सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। न्यायालय की इस सक्रियता ने उन भू-माफियाओं और भ्रष्ट तत्वों के भीतर हड़कंप मचा दिया है जो लंबे समय से इस पौराणिक धरोहर की संपत्ति का निजी लाभ के लिए दोहन कर रहे थे। अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद की तिथि निर्धारित की गई है, जिस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं।

न्यायिक कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार की ओर से पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुपालन की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें यह दावा किया गया कि जिला अधिकारी की अध्यक्षता में गठित विशेष समिति ने क्षेत्र का सूक्ष्म निरीक्षण किया है और वहां किसी भी प्रकार का नया अतिक्रमण नहीं पाया गया है। हालांकि, सरकार के इस दावे का याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने पुरजोर विरोध किया और इसे तथ्यों को छिपाने की एक नाकाम कोशिश करार दिया। याचिकाकर्ता पक्ष ने न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के रूप में उन ताजी तस्वीरों और फोटोग्राफ्स को शपथ पत्र के साथ पेश किया, जो द्रोण सागर की भूमि पर धड़ल्ले से किए गए अवैध निर्माण और अतिक्रमण की पोल खोल रहे थे। साक्ष्यों के इस टकराव को देखते हुए खंडपीठ ने सरकार की रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त किया और प्रशासन को फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि वे हवा-हवाई दावों के बजाय जमीनी हकीकत पर आधारित विस्तृत हलफनामा पेश करें। न्यायालय ने साफ कर दिया कि ऐतिहासिक धरोहरों की अनदेखी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

काशीपुर के समाजिक और जागरूक नागरिक चक्रेश कुमार जैन द्वारा जनहित में दायर की गई इस याचिका ने द्रोण सागर के उस प्राचीन महात्म्य को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसे पांडवों ने अपने पूज्य गुरु द्रोणाचार्य के सम्मान में निर्मित किया था। जनहित याचिका में यह चिंता व्यक्त की गई है कि इस पवित्र स्थान पर न केवल अतिक्रमण का जाल फैल रहा है, बल्कि यहां असामाजिक तत्वों द्वारा अनैतिक गतिविधियों को भी अंजाम दिया जा रहा है, जिससे इस तीर्थ स्थल की मर्यादा भंग हो रही है। द्रोण सागर झील के चारों ओर विराजमान 30 ऐतिहासिक मंदिरों की श्रृंखला इसकी सांस्कृतिक भव्यता का प्रमाण है, लेकिन वर्तमान में यहां के चढ़ावे और आय का कोई पारदर्शी हिसाब-किताब नहीं है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यहां आने वाली बड़ी धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। द्वापर कालीन इस धरोहर का नाम द्रोण सागर पड़ा ही इसलिए था क्योंकि यह गुरु-शिष्य परंपरा का जीवित साक्ष्य है, जिसे आज भू-माफिया अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए खंडित करने पर तुले हुए हैं।

विधिक संघर्ष की इस लंबी गाथा में यह तथ्य भी उभरकर सामने आया है कि वर्ष 2018 में भी उच्च न्यायालय ने एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व को स्वीकार किया था और इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में सौंपने पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दी थी। इसके उपरांत, वर्ष 2020 में ऊधम सिंह नगर के तत्कालीन जिलाधिकारी ने झील के संरक्षण और प्रबंधन के लिए उप जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक त्रि-सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसका मुख्य दायित्व यहां से होने वाली समस्त आय को एक राष्ट्रीयकृत बैंक के पृथक खाते में जमा करना और विकास की रिपोर्ट तैयार करना था। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि वर्षों बीत जाने के बाद भी इस कमेटी ने न तो कोई ठोस रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी और न ही आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक किया गया। प्रशासन की इसी निष्क्रियता का लाभ उठाकर दबंगों ने झील की कीमती भूमि पर अवैध कब्जे कर लिए हैं, जिसे अब तत्काल प्रभाव से मुक्त कराने की मांग न्यायालय के द्वार तक जा पहुँची है।

उच्च न्यायालय में हुई इस गर्मागर्म बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आगामी चार हफ्ते शासन और प्रशासन के लिए भारी पड़ने वाले हैं, क्योंकि अब उन्हें न्यायालय को यह समझाना होगा कि आखिर क्यों अभी तक अतिक्रमणकारियों पर बुलडोजर नहीं चला। याचिकाकर्ता चक्रेश कुमार जैन की ओर से प्रभावी पैरवी करते हुए यह मांग की गई है कि द्रोण सागर की भूमि को राजस्व अभिलेखों के अनुसार चिन्हित कर उसे हर प्रकार के अवरोध से मुक्त किया जाए ताकि इसका प्राचीन स्वरूप बहाल हो सके। साथ ही, मंदिरों में होने वाली करोड़ों की आय का ऑडिट कराने और उसे सार्वजनिक हित में उपयोग करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है। काशीपुर की जनता अब इस ऐतिहासिक न्याय की प्रतीक्षा कर रही है, क्योंकि द्रोण सागर केवल एक जल निकाय नहीं बल्कि उनकी आस्था और पहचान का केंद्र है। न्यायालय के इस रुख से यह उम्मीद जगी है कि अब द्रोण सागर की भूमि से अतिक्रमण का साया छंटेगा और गुरु द्रोणाचार्य की यह पवित्र स्थली एक बार फिर अपने पुराने गौरव के साथ जगमगा उठेगी।

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