भीमताल। नैनीताल जनपद के भीमताल ब्लॉक में इन दिनों दहशत का साया इस कदर गहरा गया है कि इंसानी जिंदगी और मौत के बीच का फासला महज कुछ कदमों की दूरी पर सिमट कर रह गया है। झोलीकोट के सुरम्य पर्वतीय अंचल में स्थित जोोली गांव में घटित ताज़ा हृदयविदारक घटना ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ नियति ने एक बार फिर खूनी खेल खेलते हुए एक बेगुनाह महिला को असमय मौत के घाट उतार दिया। ४७ वर्षीय श्रीमती हेमा पांडे, जो अपने परिवार के भरण-पोषण और पशुओं के चारे की खातिर रोजमर्रा की तरह पास के घने जंगल में गई थीं, उन्हें क्या मालूम था कि पेड़ों के पीछे घात लगाए बैठा आदमखोर उनकी जान का दुश्मन बना बैठा है। जैसे ही हेमा अन्य महिलाओं के साथ जंगल के भीतर घास काटने में व्यस्त हुईं, झाड़ियों के पीछे छिपे आदमखोर बाघ ने बिजली की गति से उन पर हमला कर दिया और चंद ही सेकंडों में उन्हें गहरे जंगल की ओर खींच ले गया। चीख-पुकार सुनकर साथ गई महिलाओं ने शोर मचाया और गांव वालों को इस वीभत्स हमले की सूचना दी, जिसके बाद समूचे गांव में हाहाकार मच गया और आनन-फानन में लोग लाठी-डंडों के साथ अपनी जान हथेली पर लेकर जंगल की ओर दौड़ पड़े।
ग्रामीणों और वन विभाग की संयुक्त टीम ने जब जंगल की खाक छानी, तो लगभग दो किलोमीटर दूर जो नजारा दिखा, उसने उपस्थित हर व्यक्ति की रूह को कांपने पर मजबूर कर दिया क्योंकि बाघ ने श्रीमती हेमा पांडे के शरीर को बुरी तरह क्षत-विक्षत कर दिया था। घटनास्थल से बरामद शव की हालत इतनी भयावह थी कि उसे देख पाना भी किसी साधारण इंसान के वश में नहीं था क्योंकि आदमखोर तब तक शरीर का आधा हिस्सा अपना निवाला बना चुका था। हेमा पांडे के पति दयाल पांडे और उनका पूरा परिवार इस वज्रपात से पूरी तरह टूट चुका है, जबकि गांव के हर घर में मातम के साथ-साथ अब आक्रोश की ज्वाला भी धधक रही है। यह घटना केवल एक हमला नहीं है, बल्कि उस सरकारी तंत्र की विफलता का जीता-जागता सबूत है जो बार-बार सुरक्षा के दावे तो करता है लेकिन धरातल पर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। भीमताल ब्लॉक का यह शांत इलाका अब खौफ के साये में जीने को मजबूर है, जहाँ सूरज ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और लोग अपने ही आंगन में निकलने से कतराने लगे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अगला नंबर किसका होगा।
क्षेत्रीय निवासियों का मानना है कि इस पूरे इलाके में सक्रिय यह बाघ अब पूरी तरह से आदमखोर बन चुका है और उसे इंसानी मांस का चस्का लग चुका है, जिससे वह लगातार अपनी लोकेशन बदलकर नए शिकार की तलाश में रहता है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मौत के लिए सीधे तौर पर वन विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है क्योंकि इसी विशेष रेंज में पिछले कुछ ही समय के भीतर यह तीसरी या चौथी बड़ी घटना है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान रियल स्टेट वाले इलाकों और आसपास के क्षेत्रों में हुई घटनाओं को मिलाकर देखा जाए तो पूरे ब्लॉक में यह ९वीं या १०वीं मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटना है। इतनी बड़ी संख्या में मौतों के बावजूद प्रशासन द्वारा ठोस रणनीति न बनाया जाना विभाग की लापरवाही को उजागर करता है, जो केवल पिंजरे लगाने की खानापूर्ति तक सीमित रह गया है। लोगों का स्पष्ट कहना है कि जब तक उस असली आदमखोर को समाप्त या कैद नहीं किया जाता, तब तक यह खूनी सिलसिला रुकने वाला नहीं है और ग्रामीण सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
ग्रामीणों में विशेष रूप से इस बात को लेकर भारी गुस्सा है कि वन विभाग ने पिछले तीन महीनों में करीब पांच गुलदार और एक बाघ को पकड़ा तो है, लेकिन उनके दावे खोखले साबित हो रहे हैं क्योंकि असली गुनहगार अभी भी आजाद घूम रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग अपनी साख बचाने के चक्कर में अक्सर उन जानवरों को पकड़कर ले जाता है जो आदमखोर नहीं होते, जबकि वास्तविक हमलावर बाघ अभी भी पिंजरों से दूर रहकर रिहायशी इलाकों में खुलेआम घूम रहा है। लोगों का कहना है कि विभाग केवल आंकड़ों के खेल में उलझा हुआ है और उसे आम आदमी की जान की कोई परवाह नहीं है, जिसके कारण भीमताल की सड़कों पर अब वन अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी तेज हो गई है। गुस्साए लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उस आदमखोर बाघ को चिन्हित कर उसे खत्म नहीं किया गया या पकड़कर दूर नहीं भेजा गया, तो वे वन विभाग के कार्यालय का घेराव करेंगे और उग्र प्रदर्शन की राह अपनाएंगे। यह अविश्वास की खाई अब इतनी गहरी हो गई है कि लोग विभाग की किसी भी कार्रवाई पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि मौतों का आंकड़ा कम होने के बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और बुद्धिजीवियों ने लोगों से अत्यधिक सचेत रहने की अपील की है, विशेषकर माताएं, बहनें और बुजुर्ग जो अक्सर घास और लकड़ी के लिए जंगल जाते हैं, उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी गई है। वर्तमान संकट काल में यह अनिवार्य हो गया है कि ग्रामीण कम से कम पांच-छह लोगों के समूह में ही बाहर निकलें और जंगल की गहराई में जाने से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि आदमखोर बाघ अब घात लगाकर हमला करने में माहिर हो चुका है। हालांकि सामूहिक रूप से बाहर निकलना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, फिर भी यह अकेले जाने की तुलना में जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ हाल ही में हमले हुए हैं। जोोली गांव के इस भीषण हादसे के बाद अब यह जिम्मेदारी न केवल सरकार की है बल्कि समाज की भी है कि वे एक-दूसरे की रक्षा के लिए सजग रहें और सतर्कता को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाएं। श्रीमती हेमा पांडे की शहादत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक पहाड़ की महिलाएं अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालती रहेंगी और कब तक यह संघर्ष इसी तरह चलता रहेगा।
भीमताल ब्लॉक के निवासियों का धैर्य अब जवाब दे चुका है क्योंकि उन्होंने पिछले तीन महीनों में अपने कई अपनों को इन जंगली जानवरों के हमलों में खोया है, जो कि किसी भी सभ्य समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है। बाघ और गुलदार के आतंक ने न केवल जनजीवन प्रभावित किया है बल्कि स्थानीय पर्यटन और खेती-बाड़ी पर भी बहुत बुरा असर डाला है, जिससे लोग अब अपने पुश्तैनी गांवों को छोड़ने पर विचार करने लगे हैं। सरकार को चाहिए कि वह इस मामले में विशेषज्ञ हंटर और ट्रैकिंग टीमों को तैनात करे ताकि उस विशिष्ट आदमखोर की पहचान की जा सके जो बार-बार इंसानों को अपना शिकार बना रहा है, वरना यह जनाक्रोश जल्द ही एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा। नैनीताल जिले के इस संवेदनशील हिस्से में सुरक्षा के नाम पर केवल आश्वासन नहीं बल्कि अब ठोस कार्यवाही की दरकार है, जिससे जोोली गांव जैसे अन्य गांवों के लोग फिर से बिना किसी डर के चैन की सांस ले सकें। न्यूज़ पेज नैनीताल की यह विस्तृत रिपोर्ट प्रशासन को जगाने की एक कोशिश है ताकि श्रीमती हेमा पांडे जैसी किसी और निर्दोष महिला को अपनी जान न गंवानी पड़े और जंगल के राजा का खौफ इंसानी बस्तियों से दूर हो सके।
अतंतः, यह संपूर्ण प्रकरण इंसानी बस्तियों के विस्तार और वन्यजीवों के घटते प्राकृतिक आवास के बीच के उस जटिल संघर्ष को भी दर्शाता है, जिसका खामियाजा पहाड़ की भोली-भाली जनता को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है। श्रीमती हेमा पांडे की यह दुखद मौत प्रशासन के लिए एक अंतिम चेतावनी की तरह है कि वे अपनी कार्यशैली में सुधार लाएं और आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रोन और थर्मल कैमरों का उपयोग कर उस आदमखोर को जल्द से जल्द काबू में करें। ग्रामीणों की नाराजगी जायज है क्योंकि पिंजरे में कैद किए गए पिछले जानवर बेगुनाह साबित हुए हैं, जबकि असली मौत का सौदागर अभी भी भीमताल की पहाड़ियों में दहाड़ रहा है और अगले शिकार की ताक में है। अब समय आ गया है कि सरकार इस ओर त्वरित ध्यान दे और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा देने के साथ-साथ इलाके की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करे ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी अनहोनी को टाला जा सके। जोोली गांव की यह घटना सदैव एक काले अध्याय के रूप में याद रखी जाएगी, जब एक आदमखोर बाघ ने एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को हमेशा-हमेशा के लिए उजाड़ दिया।





