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कपिल सिब्बल ने प्रधानमंत्री मोदी को घेरा महिला आरक्षण पर भाजपा की मंशा को बताया बड़ा झूठ

इतिहास के पन्नों से लेकर वर्तमान की सियासत तक कपिल सिब्बल ने खोली पोल क्योंकि जनगणना और परिसीमन की शर्तों ने महिला आरक्षण को बनाया चुनावी जुमला और भाजपा के पुराने विरोधों ने उजागर किया दोहरा चरित्र।

नई दिल्ली।भारतीय राजनीति के फलक पर एक बार फिर महिला आरक्षण का मुद्दा किसी शांत ज्वालामुखी के अचानक फटने जैसा प्रतीत हो रहा है, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता और अनुभवी राजनेता कपिल सिब्बल ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पर बेहद तीखे और कड़वे सवाल दागे हैं। कपिल सिब्बल ने बहुत ही बेबाकी के साथ सत्ता पक्ष को आईना दिखाते हुए कहा है कि सरकार ने इस बिल को केवल एक राजनैतिक ढाल की तरह इस्तेमाल किया है, जबकि उनका वास्तविक इरादा कभी इसे कानून की शक्ल देने का था ही नहीं। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए पूछा कि जब भाजपा को भली-भांति ज्ञात था कि लोकसभा में उनके पास 240 सांसद हैं और सहयोगियों के साथ यह संख्या 293 तक पहुँचती है, तो फिर इस बिल को ऐसी स्थिति में क्यों लाया गया जहाँ इसके गिरने की पूरी संभावना थी? कपिल सिब्बल का आरोप है कि यह पूरी कवायद केवल एक भव्य भाषण तैयार करने और जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए की गई थी ताकि लोग उनके ‘सत्य’ पर विश्वास करने लगें, जबकि वास्तविकता के धरातल पर मंशा शून्य थी।

इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कपिल सिब्बल ने यह सनसनीखेज दावा किया कि महिला आरक्षण की राह में भाजपा हमेशा से ही सबसे बड़ा रोड़ा रही है। उन्होंने याद दिलाया कि साल 1996 में जब पहली बार यह ऐतिहासिक विधेयक सदन के पटल पर रखा गया था, तब भाजपा ने ही इसका पुरजोर विरोध किया था, जिसके कारण यह पारित नहीं हो सका। इसके बाद 1998 और 2004 के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय वह खुद राज्यसभा के सदस्य थे और उन्होंने सदन में खड़े होकर तत्कालीन सरकार को यह भरोसा दिलाया था कि उन्हें छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के दबाव में आने की जरूरत नहीं है क्योंकि मुख्य विपक्ष उनके साथ खड़ा है। कपिल सिब्बल के अनुसार, भाजपा उस समय भी पूर्ण शक्ति में थी और बिल पास करा सकती थी, लेकिन उन्होंने समाजवादी पार्टी द्वारा मांगे गए कोटे का बहाना बनाकर इस महत्वपूर्ण बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जो उनकी दोहरी राजनीति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

विवादों की इस फेहरिस्त को आगे बढ़ाते हुए कपिल सिब्बल ने 2008 और 2010 के घटनाक्रमों पर भी रोशनी डाली, जब यूपीए शासनकाल के दौरान राज्यसभा में तो बिल पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में भाजपा के अड़ियल रुख के कारण इसे कानूनी रूप नहीं मिल सका। उन्होंने बहुत ही तल्ख लहजे में सवाल किया कि झूठ कौन बोल रहा है और सच कौन, यह देश की महिलाओं को अब साफ-साफ दिखने लगा है क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस ने प्रयास किया, भाजपा ने विरोध किया। कपिल सिब्बल ने 2023 के संविधान संशोधन का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री से पूछा कि सर्वसम्मति से बिल पास होने के बाद जनगणना और परिसीमन की शर्त क्यों थोपी गई? उनका सीधा आरोप है कि सरकार जनगणना इसलिए नहीं करना चाहती क्योंकि इससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति-जनजाति की सही संख्या का खुलासा हो जाएगा, जिसके बाद उन्हें आरक्षण में कोटा देना पड़ेगा, और भाजपा का मूल चरित्र हमेशा से इन वर्गों के अधिकारों के खिलाफ रहा है।

रिफॉर्म यानी सुधारों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा विपक्ष पर लगाए गए आरोपों का खंडन करते हुए कपिल सिब्बल ने चुनौती भरे लहजे में कहा कि प्रधानमंत्री किसी एक भी ऐसे सुधार का उदाहरण दें जिसका उन्होंने विरोध किया हो। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि देश में निजीकरण, टेलीकॉम और माइनिंग सेक्टर को खोलने की जो क्रांति आई, वह कांग्रेस की ही देन थी। आज जिस मोबाइल क्रांति का श्रेय लेने की होड़ मची है, उसकी नींव दशकों पहले रखी जा चुकी थी। कपिल सिब्बल ने कड़े शब्दों में कहा कि वह प्रधानमंत्री का पद के नाते सम्मान करते हैं, इसलिए ‘झूठ’ जैसे शब्द का प्रयोग करना उन्हें अच्छा नहीं लगता, लेकिन वास्तविकता यह है कि 2004 के बाद शिक्षा और निवेश के क्षेत्र में लाए गए हर बड़े रिफॉर्म का भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए विरोध किया था, जबकि कांग्रेस ने हमेशा राष्ट्रहित में सरकार का साथ दिया है।

महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के दावों को खोखला बताते हुए कपिल सिब्बल ने मणिपुर की भयावह हिंसा और वहां महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों पर प्रधानमंत्री की लंबी चुप्पी को एक बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने सवाल किया कि जब देश का सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप कर रहा था और सरकार से जवाब मांग रहा था, तब प्रधानमंत्री मौन क्यों थे? उन्होंने केवल दो लाइनों की औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सदन में जाने को नाकाफी बताया। इतना ही नहीं, उन्होंने कठुआ की घटना और विभिन्न भाजपा नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों का जिक्र करते हुए पूछा कि उस वक्त पार्टी की नैतिकता कहाँ थी? उन्होंने बिलकिस बानो केस में दोषियों की रिहाई का मुद्दा भी उठाया और कहा कि एक तरफ सरकार नारी शक्ति का नारा देती है और दूसरी तरफ ऐसे फैसलों पर खामोश रहती है, जो महिलाओं के आत्मविश्वास को पूरी तरह तोड़ देते हैं।

अपने संबोधन के अंत में कपिल सिब्बल ने सत्ता पक्ष को एक बड़ी चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे वास्तव में महिलाओं का सम्मान करते हैं, तो उन्हें आरक्षण के नाम पर भ्रम फैलाना बंद कर देना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी में किसी महिला को अध्यक्ष बनाना चाहिए या देश को एक महिला प्रधानमंत्री देने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि टिकट वितरण में महिलाओं की संख्या बढ़ाकर और महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने वाले नेताओं को तुरंत पद से हटाकर ही वास्तविक सम्मान सुनिश्चित किया जा सकता है। कपिल सिब्बल ने मांग की कि प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय टेलीविजन पर यह ऐलान करना चाहिए कि महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार के अत्याचार या अपमान को सहन नहीं किया जाएगा और दोषी चाहे कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो, उसे तुरंत बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, तभी देश की जनता आपके शब्दों पर भरोसा करेगी।

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