भारत(सुनील कोठारी)।भारतीय लोकतंत्र के गलियारों में इन दिनों महिला आरक्षण और परिसीमन के घालमेल ने एक ऐसा सियासी बवंडर खड़ा कर दिया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। सरकार द्वारा पेश किए गए परिसीमन बिल के पीछे की मंशा को लेकर अब राजनैतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, जिसमें सबसे प्रमुख तर्क यह उभर कर सामने आ रहा है कि सत्ताधारी दल ने इस विवादित बिल को महिला सशक्तिकरण के लिफाफे में लपेटकर विपक्ष के सामने एक ऐसी चुनौती पेश की थी, जिसे निगलना या उगलना दोनों ही उनके लिए घातक साबित हो सकता था। बीजेपी के रणनीतिकारों को शायद यह पक्का भरोसा था कि उनका राजनैतिक प्रबंधन इतना अभेद्य है कि वे सदन के भीतर विपक्षी सांसदों को इस बिल के पक्ष में मतदान करने के लिए ‘राजी’ कर लेंगे, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। इस पूरी कवायद का एक सिरा जहाँ महिला हितों से जुड़ा दिखता है, वहीं दूसरा सिरा परिसीमन के उस पेचीदा दांव से जुड़ा है, जिसके जरिए भविष्य की राजनैतिक बिसात बिछाने की कोशिश की गई है।
इस विवादित घटनाक्रम का दूसरा और अधिक सनसनीखेज पहलू वह संभावित रणनीति है, जिसके तहत सरकार को पहले से ही अपनी जीत का अटूट विश्वास था या फिर उसने विपक्ष को एक ऐसे चक्रव्यूह में ‘फंसाने’ की योजना बनाई थी जहाँ से निकलना नामुमकिन हो। रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि इस बिल को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाना टेढ़ी खीर है, फिर भी इसे सदन पटल पर रखा गया ताकि अगर बिल गिर भी जाए, तो जनता के बीच यह संदेश फैलाया जा सके कि विपक्ष महिला आरक्षण का विरोधी है। और ठीक वैसा ही हुआ, जैसे ही बिल गिरा, सरकार समर्थित मीडिया घरानों और न्यूज़ चैनलों ने उस विवादित परिसीमन वाले हिस्से को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया, जिसकी वजह से असल में बिल धराशायी हुआ था। इसके बजाय, एक स्वर में इसे केवल “महिला बिल” का नाम देकर विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया गया कि उन्होंने नारी शक्ति के खिलाफ वोट किया है, जिससे सत्ता की चालाकी साफ झलकती है।
यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को, जिस पर सरकार ने पिछले 12 वर्षों तक पूरी तरह चुप्पी साधे रखी थी, अचानक एक विवादित बिल के साथ जोड़कर लाना बीजेपी की असली प्रतिबद्धता पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर चुनाव के ठीक मुहाने पर ही यह सब क्यों किया गया? क्या यह केवल विपक्ष को ‘फंसाने’ का एक चुनावी हथियार था? अगर सरकार की नीयत साफ थी, तो इसे विधानसभा चुनावों या बंगाल चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मौकों पर क्यों नहीं भुनाया गया? लोकसभा चुनाव के इतने करीब आने तक का इंतजार करना यह संकेत देता है कि यह महिला उत्थान से ज्यादा एक प्रतीकात्मक चुनावी नैरेटिव सेट करने की कोशिश थी, जिसे प्रधानमंत्री मोदी अपने प्रचार अभियान का मुख्य आधार बनाना चाहते थे। दो दशकों से लटके इस मुद्दे पर अचानक आई यह तेजी राजनैतिक हितों की गंध देती है, जिसमें महिलाओं की वास्तविक उन्नति से ज्यादा वोटों के ध्रुवीकरण की झलक मिलती है।
राजनैतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा शायद उन बुजुर्ग पुरुष राजनेताओं की बातों पर भरोसा न करे, जो एक दशक से सत्ता का सुख भोगने के बाद अब उनके मसीहा बनने का दावा कर रहे हैं। यहाँ मुकाबला केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि चेहरों का भी है; यदि एक तरफ प्रियंका गांधी जैसी नेता महिलाओं के हक के लिए हुंकार भरती हैं और दूसरी तरफ बीजेपी के वरिष्ठ पुरुष नेताओं का जमावड़ा होता है, तो आधी आबादी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि उनका असली हितैषी कौन है। हकीकत तो यह है कि आज की आम महिला खुद को इन हाई-प्रोफाइल सीटों और संसद की चकाचौंध से इतना दूर पाती है कि उसे यह विश्वास ही नहीं होता कि महिला आरक्षण उसके जीवन में कोई क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। राजनेताओं के प्रति बढ़ता अविश्वास इस समस्या को और जटिल बना देता है, जहाँ आम जनता को लगता है कि यह सब केवल कुर्सियों के बंटवारे का खेल है।
इस पूरे विवाद की जड़ वह परिसीमन हिस्सा है, जिसे विपक्ष ने देश के संघीय ढांचे के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखा। विपक्ष का तर्क था कि इस बिल के जरिए हिंदी पट्टी के राज्यों, जहाँ बीजेपी की पकड़ बेहद मजबूत है, वहां सांसदों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो जाएगी, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रभाव कम हो जाएगा। हालांकि सरकार ने मौखिक तौर पर यह आश्वासन दिया कि नए संसद भवन में हर राज्य का प्रतिनिधित्व अनुपात वही रहेगा, लेकिन लिखित गारंटी के अभाव में विपक्ष ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बिल की सबसे बड़ी विसंगति यह थी कि इसमें मान लिया गया कि भारत की जनता को और अधिक सांसदों की जरूरत है, जबकि हकीकत इसके उलट है। करोड़ों टैक्सपेयर्स का पैसा नए नेताओं की सुख-सुविधाओं और दिल्ली में उनके आलीशान बंगलों पर खर्च करने के तर्क को आम जनता के गले उतारना लगभग नामुमकिन है।
आज के दौर में हर लोकसभा सीट पर होने वाला चुनाव करीब 100 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च मांगता है, जो अक्सर उद्योगपतियों और दबाव समूहों से अवैध तरीके से जुटाया जाता है। ऐसे में अगर 200 से ज्यादा नई सीटें जुड़ती हैं, तो यह भ्रष्टाचार के एक नए और बड़े चक्र को जन्म देगा, जिसका बोझ अंततः जनता की जेब पर ही पड़ेगा। लोगों का मानना है कि सांसद अब केवल रबर स्टैम्प बनकर रह गए हैं, जो ऊपर से मिलने वाले आदेशों पर सिर्फ बटन दबाने का काम करते हैं, न कि जनता की आवाज़ बुलंद करने का। अगर सरकार सचमुच देश का भला चाहती है, तो उसे नए सांसदों की फौज खड़ी करने के बजाय जजों की संख्या बढ़ानी चाहिए, पुलिस को आधुनिक बनाना चाहिए और जर्जर हो चुकी नौकरशाही को दुरुस्त करना चाहिए। अंततः, परिसीमन के पीछे चाहे जो भी राजनैतिक तर्क दिए जाएं, लेकिन संसद की गिरती साख और नेताओं की खुदगर्जी ने इस पूरे विजन को कमजोर कर दिया है।





