नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश में पिछले दस वर्षों से चली आ रही आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों ने नागरिकों के सामने अनगिनत सवाल खड़े कर दिए हैं। छोटे वादों के साथ शुरू हुई आशाएँ, जैसे काला धन देश लौट आएगा, किसानों की आय बढ़ेगी, बेरोजगारी कम होगी और महिलाओं को मुख्यधारा में प्रवेश मिलेगा, आज नजर आती वास्तविकताओं से काफी दूर हैं। आदिवासी समुदाय अब भी अपनी जीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं और दलित उत्पीड़न पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में डिग्रीधारियों के लिए अवसर सीमित रहे हैं और भारत की यूनिवर्सिटीज़ अंतरराष्ट्रीय मानकों में कहीं पिछड़ती नजर आती हैं। बीते दशक में जनता ने आर्थिक सुधार और सामाजिक न्याय के लिए अपेक्षित बदलाव का अनुभव नहीं किया, जबकि स्विस बैंक के आंकड़े बताते हैं कि काले धन की राशि में 2012-13 के बाद लगभग 75% वृद्धि हुई है। इस अवधि में किसानों की वास्तविक आय में कमी आई है, कर्ज और मुद्रा संकट बढ़ा है और वित्तीय संस्थानों की हालत नाजुक होती चली गई।
बाजार की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थिरता पर किसी ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। शेयर बाजार केवल संपन्न वर्ग के लिए लाभ का साधन बन गया। देश की औद्योगिक उत्पादन क्षमता घटती गई और कोर सेक्टर संकट की ओर बढ़ा। बैंकों की लिक्विडिटी और उनके विलय से लाखों नौकरियां प्रभावित हुईं। सरकारी नौकरियां रिक्त रहीं और सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर हुआ। जबकि राजनीतिक संवाद जाति और धर्म आधारित राजनीति पर केंद्रित था, जनता के वास्तविक आर्थिक और सामाजिक मुद्दे अनदेखे रह गए। विकास की परिभाषा केवल सत्ता और कॉरपोरेट लाभ तक सीमित होती दिखी, जिससे आम नागरिक की अपेक्षाएँ निराशा में बदल गईं।
इस दौरान धार्मिक और जातीय राजनीति ने सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला। मुस्लिम मतदाता और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवहेलना जैसी घटनाओं ने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल खड़ा किया। चीन पर निर्भरता बढ़ी और व्यापार घाटा 125 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। ऊर्जा संसाधनों जैसे रूस से सस्ते तेल का लाभ सीधे जनता तक नहीं पहुंचा, बल्कि इसका लाभ सरकार और सत्ता संरचनाओं को मिला। इसी क्रम में स्वर्ण समाज और उद्योगपतियों का असंतोष बढ़ा, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि सत्ता उनके पक्ष में रहेगी, परंतु वास्तविकता इसके विपरीत रही।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में सनातन परंपरा और धार्मिक आश्रय का प्रभाव भी राजनीति में नजर आने लगा। शंकराचार्य ने सत्ता पर सवाल उठाए, जबकि मंडल और कमंडल की राजनीति का असर सामाजिक स्तर पर गहरा दिखाई देने लगा। ओबीसी प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने भी राजनीतिक संतुलन को चुनौती दी। सत्ता और समाज के बीच खाई बढ़ी, जिससे जनता की भावनाओं में कटाव बढ़ा। नीति, प्रशासन और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया, और जनता को महसूस होने लगा कि राजनीति अब केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन गई है, जबकि समाज की आवश्यकताएँ और अपेक्षाएँ उपेक्षित रह गई हैं।
आर्थिक दृष्टि से किसान और मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए। बीज, खाद, उपकरण, परिवहन और श्रम खर्च में वृद्धि ने कृषि आय को कम कर दिया। 2013-14 की तुलना में किसानों की आय में 3% की गिरावट दर्ज की गई। दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों की संख्या बढ़ी, लेकिन उनकी आय में वृद्धि सीमित रही। जीवनयापन की लागत में वृद्धि ने उनकी बचत को लगभग 22% तक घटा दिया। रोजगार के अवसर भी घटे और सरकारी नौकरियां कॉन्ट्रैक्ट वर्कर के रूप में परिवर्तित हो गईं। इस स्थिति में यूरोपीय यूनियन के साथ नए व्यापार समझौतों से कुछ उत्पादों पर कर घटाया गया, जिससे कुछ वस्तुओं की कीमतों में कमी आई, परंतु वास्तविक लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचा। शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा। जीते हुए स्नातक और उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं में केवल 37% को रोजगार मिल पा रहा है, जबकि 63% बेरोजगार हैं। सोशल सिक्योरिटी तंत्र में कटौती ने स्थायी नौकरियों की सुरक्षा को कमजोर कर दिया। सरकारी कर्मचारियों का लगभग 69% हिस्सा अब कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहा है। इसके साथ ही शहरी और ग्रामीण रोजगार में असमानता बढ़ी, जिससे समाज में असंतोष और नाराजगी फैल गई।
धार्मिक पर्यटन और मंदिरों के प्रबंधन ने नई चुनौतियाँ पेश कीं। महाकाल मंदिर और बनारस के कैरिडोर जैसे परियोजनाओं में प्रशासनिक नियंत्रण और आरएसएस, व्यापारियों की भागीदारी ने इस प्रक्रिया को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया। जनता, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा और मजदूर वर्ग आर्थिक असमानताओं और रोजगार संकट के बावजूद इस राजनीतिक संरचना के प्रभाव में बने रहे। सत्ता ने जनता की भावनाओं और धार्मिक आस्थाओं का लाभ उठाया, जबकि वास्तविक विकास स्थिर नहीं हुआ। राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बिगड़ने का कारण केवल आर्थिक नीतियाँ नहीं बल्कि सत्ता और समाज के बीच विश्वास की कमी भी है। सत्ता ने जातीय और धार्मिक पहचान को अपनी रणनीति में शामिल किया, जिससे नफरत और टकराव समाज में घुल गई। शिक्षा और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किए गए। शंकराचार्य जैसे धार्मिक नेता अब सीधे राजनीतिक बयान दे रहे हैं, क्योंकि संविधान और समाज के संरक्षण के लिए आवाज उठाना आवश्यक हो गया।
लोकतंत्र और प्रशासन के बीच वैक्यूम भी चिंता का विषय बना। अधिकारी और नौकरशाह सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़े हो गए। बरेली के मैजिस्ट्रेट और अयोध्या के डिप्टी जीएसटी कमिश्नर के पत्र इस असंतुलन को उजागर करते हैं। धार्मिक स्थलों तक पहुंच, प्रशासनिक नियंत्रण और धार्मिक पर्यटन ने आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से जनता को सीमित कर दिया। परिणामस्वरूप, सत्ता और समाज के बीच दूरी बढ़ी और आम नागरिक की समस्याएँ अनसुलझी रहीं। इस दौरान सत्ता ने जनता की भावनाओं और आर्थिक आवश्यकताओं पर ध्यान दिए बिना अपने प्रचार और प्रशासनिक नेटवर्क को सुदृढ़ किया। शेयर बाजार और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव का लाभ केवल सरकार और कॉरपोरेट नेटवर्क को मिला। जनता की वास्तविक आय और बचत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। परिणामस्वरूप, सामाजिक असमानता और बेरोजगारी लगातार बढ़ी। राजनीतिक और आर्थिक संरचना ने जनता को केवल निरीक्षक बना दिया, जबकि वास्तविक विकास अनदेखा रहा।
देश में सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के मुद्दे भी अनदेखे रहे। दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास अपूर्ण रहे। उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की प्रक्रिया धीमी रही और कॉरपोरेट लाभ के लिए संसाधनों का प्रयोग हुआ। सरकार और उद्योगपतियों के नेक्सेस ने जनता के अधिकारों और संसाधनों को प्रभावित किया। इस स्थिति ने समाज में विश्वास की कमी और असंतोष बढ़ाया। राजनीतिक सत्ताधारियों ने धर्म और जाति की राजनीति के माध्यम से सत्ता बनाए रखी, जबकि जनता की आर्थिक और सामाजिक समस्याएँ लगातार बढ़ती रहीं। शिक्षा, रोजगार, कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचा। जनता ने केवल नफरत और टकराव के साए में अपनी समस्याओं का सामना किया। सत्ता और समाज के बीच यह खाई लोकतंत्र की मजबूती और समाज की समरसता के लिए खतरा बन गई।
सत्ता ने जनता की भावनाओं और धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक लाभ उठाया, जबकि वास्तविक विकास, रोजगार और सामाजिक न्याय पर ध्यान नहीं दिया। सरकारी नीतियाँ केवल कॉरपोरेट और राजनीतिक लाभ तक सीमित रहीं। जनता की अपेक्षाएँ निराशा में बदल गईं और समाज में असंतोष बढ़ा। राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना ने लोकतंत्र के मूल्यों और समाज की भलाई को प्रभावित किया। देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे में बदलाव आवश्यक है। किसानों और मजदूरों की आय बढ़ाना, बेरोजगारी कम करना, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना, सामाजिक न्याय और आरक्षण के उचित कार्यान्वयन को प्राथमिकता देना, लोकतंत्र और प्रशासन में पारदर्शिता लाना इस समय सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है। सत्ता और जनता के बीच विश्वास बहाल करना और समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना अब अनिवार्य है।
राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार, आर्थिक नीतियों में पारदर्शिता और सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की मांग है। जनता को केवल राजनीतिक खेल का हिस्सा नहीं बल्कि लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार के रूप में मान्यता देना आवश्यक है। सत्ता और समाज के बीच संतुलन स्थापित करना, धार्मिक और जातीय असंतुलन को समाप्त करना, और आर्थिक विकास की दिशा में कदम बढ़ाना ही इस दशक की सबसे बड़ी चुनौती है। देश की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच जटिलता बढ़ रही है। सत्ता ने अपने लाभ के लिए समाज की असमानताओं का उपयोग किया। जनता के भीतर असंतोष और नाराजगी बढ़ी, जबकि प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थाएं केवल अपनी स्थिरता और सत्ता बनाए रखने में व्यस्त रही। लोकतंत्र के मूल्य और जनता की भलाई अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सत्ता और समाज के बीच विश्वास बहाल करना अनिवार्य है। राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि लोकतंत्र और समाज केवल सत्ता तक सीमित नहीं हैं। जनता की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना ही राष्ट्र के स्थायी विकास का मार्ग है। देश के भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि सत्ता और समाज के बीच समन्वय स्थापित किया जाए। जनता की भलाई, सामाजिक न्याय, आर्थिक स्थिरता और लोकतंत्र के मूल्यों को संरक्षित करना सर्वोच्च प्राथमिकता हो। सत्ता के पास संसाधन हैं, लेकिन जनता की सहभागिता और विश्वास के बिना विकास असंभव है। यह दशक जनता, सत्ता और समाज के लिए निर्णायक साबित होगा।





