भारत(सुनील कोठारी)। भारत का युवा वर्ग इस समय व्यवस्था से बेहद नाराज दिखाई दे रहा है और उसकी तरफ से यह मांग पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है कि देश के असली मुद्दों पर खुलकर बात की जानी चाहिए। युवाओं की नजर में देश की अर्थव्यवस्था और आर्थिक मोर्चे पर बने हालात ही इस समय सबसे गंभीर विषय हैं, जिनसे उनकी आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। इस बीच राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा धड़ा यह तर्क दे रहा है कि भारतीय जनता पार्टी भले ही एक के बाद एक चुनाव जीत रही हो, लेकिन वित्तीय प्रबंधन के मोर्चे पर उसे लगातार नाकामी का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ताकत का जो प्रदर्शन किया था, उसे पार्टी का अब तक का सबसे ऊंचा राजनीतिक शिखर माना जा रहा है, लेकिन इसके ठीक विपरीत देश का आर्थिक ढांचा लगातार कमजोर होता जा रहा है। जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के हालिया विश्लेषण के अनुसार, भारत की इस मौजूदा बदहाली के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े जिम्मेदार किरदार काम कर रहे हैं, जिनकी नीतियों और हरकतों ने देश को संकट के इस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
इस पूरी आर्थिक गिरावट की पटकथा में सबसे पहला और मुख्य किरदार खुद केंद्र सरकार है, जिसका आंतरिक थिंक टैंक इस कड़वी हकीकत से पूरी तरह वाकिफ है कि देश की अर्थव्यवस्था के भीतर बुनियादी और बहुत गहरी समस्याएं घर कर चुकी हैं। इसके बावजूद शासन की सबसे बड़ी कमजोरी यह सामने आई है कि वह इन गंभीर चुनौतियों का कोई ठोस और व्यावहारिक समाधान खोजने के बजाय अपनी सारी नाकामियों का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने में मसरूफ है। दूसरा बड़ा किरदार देश के दिग्गज कॉर्पोरेट घराने और नामचीन उद्योगपति हैं, जिन पर हुकूमत अक्सर यह इल्जाम लगाती रहती है कि वे घरेलू बाजार में नया निवेश करने से लगातार कतरा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि सरकार की अपनी नीतियां ही इतनी लचर, ढुलमुल और अनिश्चित हैं कि कोई भी बिजनेसमैन देश के भीतर अपनी बड़ी पूंजी दांव पर लगाने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। इस त्रिकोणीय संकट में तीसरा अहम किरदार मुख्य विपक्षी दल यानी कांग्रेस पार्टी है, जो सुरजीत भल्ला के मुताबिक गांधी परिवार के नेतृत्व में बेहद सुस्त, लाचार और पंगु हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी की इसी सांगठनिक और राजनीतिक शिथिलता ने देश के भीतर भारतीय जनता पार्टी के लिए ‘वन पार्टी डेमोक्रेटिक रूल’ यानी एकतरफा लोकतांत्रिक शासन का रास्ता पूरी तरह से साफ कर दिया है। विपक्ष के इस कदर कमजोर और प्रभावहीन होने की वजह से सत्तापक्ष आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से लापरवाह और निरंकुश हो चुका है, क्योंकि उसे किसी भी मोर्चे पर जवाबदेही का कोई डर नहीं रह गया है। इस पूरे परिदृश्य का चौथा और सबसे रहस्यमयी किरदार ‘डीप स्टेट’ है, जो पर्दे के पीछे से बाकी के तीनों किरदारों को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है और देश की व्यवस्था को अपनी मर्जी के मुताबिक प्रभावित कर रहा है।

प्रसिद्ध विशेषज्ञ सुरजीत भल्ला ने देश की हुकूमत के दावों पर कड़े सवाल खड़े करते हुए पूछा है कि क्या भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था कहकर महज कागजी आंकड़ों से संतुष्ट हुआ जा सकता है? उन्होंने इस सवाल का जवाब खुद ही बेहद बेबाकी के साथ दिया है कि अगर हम अपनी तुलना केवल दुनिया की चुनिंदा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से करेंगे, तो वैश्विक मंदी के बीच भारत की स्थिति थोड़ी बेहतर और चमकदार दिखाई दे सकती है। लेकिन साल 2014 के बाद से अगर पूरी दुनिया के विकास दर के आंकड़ों को एक बड़े और निष्पक्ष चश्मे से देखा जाए, तो जमीनी हकीकत की पूरी कहानी ही पूरी तरह बदल जाती है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2014 के बाद से सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी ग्रोथ के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान खिसककर नौवें नंबर पर आ चुका है। वहीं अगर प्रति व्यक्ति जीडीपी विकास दर की बात की जाए, तो इस कसौटी पर भारत दुनिया के तमाम देशों के बीच आठवें पायदान पर खड़ा नजर आता है। अमेरिकी डॉलर के वैश्विक पैमाने पर देश की तरक्की को मापा जाए, तो भारत की विकास दर की रैंकिंग दुनिया में बेहद चिंताजनक रूप से 16वें स्थान पर पहुंच जाती है। डॉलर के इसी अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसके तहत 8.3 प्रतिशत की शानदार विकास दर के साथ पड़ोसी देश बांग्लादेश पूरी दुनिया में नंबर एक पायदान पर काबिज है। इसके बाद 7.2 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर के साथ इथियोपिया जैसा देश दूसरे नंबर पर मजबूती से बना हुआ है, जबकि भारत महज 4.7 प्रतिशत की कछुआ चाल वाली तरक्की के साथ इस सूची में 16वें नंबर पर हांफ रहा है।
आर्थिक विश्लेषक सुरजीत भल्ला ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि सरकारी तंत्र आंकड़ों को किसी भी तरह से घुमा-फिराकर या तोड़-मरोड़कर पेश क्यों न कर ले, लेकिन सच को ज्यादा दिनों तक छुपाया नहीं जा सकता है। अब वह समय पूरी तरह आ चुका है जब भारत के माथे से ‘सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था’ का यह भ्रामक और झूठा तमंगा पूरी तरह से हटा दिया जाना चाहिए। उनकी इस तीखी दलील का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत की इकॉनमी आगे नहीं बढ़ रही है या देश में पूरी तरह से ठहराव आ गया है। अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से आगे की तरफ कदम बढ़ा रही है, लेकिन उसकी रफ्तार और गुणवत्ता उतनी कतई नहीं है जिसके दम पर कोई बड़ा राजनीतिक नैरेटिव या चुनावी भाषण तैयार किया जा सके। अपने इसी विस्तृत लेख में उन्होंने भारतीय मुद्रा यानी रुपए की लगातार होती बदहाली और अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरती साख पर बेहद गंभीर चिंता जाहिर की है। वे लिखते हैं कि भारतीय रुपया पिछले महज एक साल के भीतर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 12 फीसदी तक टूट चुका है और करेंसी की गिरावट का यह सिलसिला लगातार सातवें साल भी बदस्तूर जारी है। वर्ष 2025 के वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रुपए को पूरे एशिया की सबसे कमजोर और खस्ताहाल मुद्राओं की श्रेणी में गिना गया है, जो देश के आर्थिक गौरव के लिए एक बड़ा झटका है। यहां पर एक बहुत बड़ा आर्थिक विरोधाभास भी देखने को मिल रहा है, क्योंकि सरकारी दावों के मुताबिक अगर देश के भीतर महंगाई पूरी तरह से काबू में है, चालू खाता घाटा भी नियंत्रण के भीतर है, विकास दर स्थिर बनी हुई है और देश में मजबूत राजनीतिक स्थिरता मौजूद है, तो इन आदर्श परिस्थितियों में तो विदेशी निवेशकों और वैश्विक बाजार का भरोसा भारतीय करेंसी पर बहुत ज्यादा बढ़ना चाहिए था। इन मजबूत मैक्रो इंडिकेटर्स के आधार पर रुपए को डॉलर के मुकाबले मजबूत होना चाहिए था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है और रुपया लगातार रसातल की तरफ जा रहा है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर देश के भीतर विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय पूंजी का इतना बड़ा संकट क्यों खड़ा हो गया है? सुरजीत भल्ला के मुताबिक, सरकार देश की इस गंभीर आर्थिक बीमारी का कोई बड़ा और कड़ा परमानेंट इलाज यानी सर्जरी करने के बजाय केवल सतही तौर पर बैंड-एड लगाने का काम कर रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग घरेलू उद्योगपतियों से लगातार देश के भीतर भारी-भरकम पूंजी निवेश करने की भावनात्मक और राष्ट्रवादी अपील कर रहे हैं। परंतु कोई भी निवेशक महज खोखली अपीलों, राजनीतिक वादों और राष्ट्रवाद के जोशीले भाषणों के भरोसे अपनी अरबों रुपए की गाढ़ी कमाई और पूंजी को जोखिम भरे बाजार में दांव पर नहीं लगा सकता। निवेशकों को देश की मौजूदा आर्थिक नीतियों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रह गया है, क्योंकि नीतियां बार-बार बदल दी जाती हैं। सुरजीत भल्ला के अनुसार, वर्तमान समय में देश के भीतर जो आर्थिक और विनियामक माहौल बना हुआ है, वह वैश्विक निवेशकों को केवल एक ही नकारात्मक संदेश दे रहा है कि या तो भारत के बाजार से अपनी पूंजी समेटकर बाहर निकल जाओ या फिर भारत में नया कदम रखने की भूल ही मत करो। उन्होंने अपने लेख में बहुत ही कड़े शब्दों में लिखा है कि साल 2015 के बाद से मौजूदा सरकार के भीतर एक अजीब तरह का नीतिगत घमंड और ओवरकॉन्फिडेंस आ गया है। सत्ता में बैठे लोगों को यह मुगालता हो गया है कि भारत का घरेलू उपभोक्ता बाजार इतना विशाल है कि दुनिया भर के निवेशक यहां आने के लिए मरे जा रहे हैं और भारत को किसी की जरूरत नहीं है।
सरकार का यह अति-आत्मविश्वास और घमंड जमीनी हकीकत से कोसों दूर है, जिसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत यह है कि साल 2025 में भी पूरे भारत देश की कुल जीडीपी अमेरिका के महज एक अकेले राज्य कैलिफोर्निया की अर्थव्यवस्था से भी छोटी रही। यहीं से अर्थशास्त्री भारत की द्विपक्षीय निवेश संधि यानी ‘बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी’ (बीआटी) फ्रेमवर्क से जुड़ी सबसे बड़ी नीतिगत समस्या की परतों को उघाड़ते हैं। साल 2015 में इस संधि के नियमों के भीतर सरकार द्वारा एक नया और बेहद विवादित प्रावधान जबरन जोड़ दिया गया था। इस नए नियम के मुताबिक, अगर कोई भी विदेशी निवेशक भारत में अपने किसी प्रोजेक्ट या निवेश को लेकर कानूनी विवाद में फंसता है, या वह भारत से अपना पूरा बिजनेस समेटकर वापस बाहर निकलना चाहता है, तो वह सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता। नए कानून के तहत उस विदेशी कंपनी को सबसे पहले पूरे 5 साल तक भारत की स्थानीय और निचली अदालतों के चक्कर काटने होंगे और वहां के लंबे कानूनी मुकदमों को झेलना होगा। इस नीति पर वह सीधा और बेहद तीखा सवाल दागते हैं कि जब भारत के खुद के नागरिक, आम व्यापारी और घरेलू फर्में किसी भी व्यापारिक शिकायत को लेकर भारतीय अदालतों की अंतहीन देरी और तारीख-पर-तारीख के रवैये के कारण वहां जाने से कतराते हैं, तो कोई विदेशी निवेशक अपनी अरबों डॉलर की भारी-भरकम पूंजी को यहां फंसाकर 5 साल तक भारतीय जजों के सामने चक्कर क्यों काटेगा? लेख के बिल्कुल आखिरी हिस्से में सुरजीत भल्ला सरकार को कड़े लहजे में सचेत करते हैं कि किसी भी अभूतपूर्व राजनीतिक और चुनावी सफलता का सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि नेतृत्व पूरी तरह से ओवरकॉन्फिडेंस यानी अति-आत्मविश्वास के दलदल में धंस जाता है। ऐसी स्थिति में सरकारें यह मान बैठती हैं कि उनके द्वारा बनाई गई सभी आर्थिक नीतियां बेहद शानदार और अचूक हैं, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट और डरावनी होती है। अभी भी चीजों को सुधारने और नीतिगत बदलाव करने का थोड़ा वक्त बचा हुआ है, क्योंकि चुनाव आपको केवल सत्ता, गद्दी और राजनीतिक ताकत दे सकते हैं, लेकिन देश को वास्तविक समृद्धि और युवाओं को रोजगार सिर्फ और सिर्फ सही आर्थिक नीतियां ही दिला सकती हैं।





