भारत। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर सदियों से चली आ रही बहस आज भी नए संदर्भों के साथ सामने आती रहती है। सवाल यह नहीं है कि किसी प्राचीन ग्रंथ में सीधे तौर पर महिलाओं को पढ़ने, काम करने या आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई एक स्पष्ट आदेश दर्ज था या नहीं, बल्कि असली मुद्दा उस सामाजिक व्यवस्था का है जिसमें स्त्री की स्वतंत्र पहचान और निर्णय लेने की क्षमता को किस तरह देखा गया। ऐतिहासिक संदर्भों में माना जाता है कि समय के साथ सामाजिक ढांचा अधिक पितृसत्तात्मक होता गया और स्त्री का जीवन परिवार तथा पुरुष संरक्षण की व्यवस्था के आसपास केंद्रित किया जाने लगा। बाल विवाह जैसी प्रथाओं के मजबूत होने से लड़कियों के लिए शिक्षा और स्वतंत्र जीवन के अवसर भी सीमित हुए। कई इतिहासकारों के अनुसार वैदिक काल की तुलना में उत्तरवैदिक और बाद के दौर में महिलाओं की सामाजिक स्वतंत्रता में कमी आई। इसी व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि में मनुस्मृति को समझना जरूरी है। इसे केवल आधुनिक अर्थों में महिलाओं की शिक्षा पर रोक लगाने वाली किताब मान लेना तस्वीर का एक हिस्सा होगा, लेकिन इसमें स्त्री की स्वतंत्रता को पुरुष संरक्षण से जोड़ने वाली धारणाओं को नजरअंदाज करना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। यही अंतर इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बनता है। एक बात शिक्षा पर सीधी पाबंदी की है और दूसरी बात स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में निर्णय लेने की क्षमता पर सामाजिक नियंत्रण की। मनुस्मृति पर बहस में यही दूसरा पहलू अधिक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
इतिहास के पन्नों को ध्यान से देखने पर यह भी सामने आता है कि मनुस्मृति की चर्चा केवल महिला अधिकारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जाति और सामाजिक असमानता से जुड़े सवालों के कारण भी यह लंबे समय से विवाद के केंद्र में रही है। इसी संदर्भ में डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन को सामाजिक न्याय के संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस ग्रंथ में मौजूद जातिगत और स्त्री संबंधी असमानताओं को लेकर गंभीर आपत्ति जताई थी। हालांकि आज की बहस में अक्सर अलग-अलग पक्ष अपनी सुविधा के अनुसार ग्रंथ के चुनिंदा अंश सामने रखते हैं। एक पक्ष उन प्रावधानों को रेखांकित करता है जिन्हें स्त्री की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना जाता है, जबकि दूसरा पक्ष उन श्लोकों और व्यवस्थाओं का उल्लेख करता है जिनमें नारी सम्मान, स्त्रीधन, कन्या और परिवार से जुड़े अधिकारों का उल्लेख मिलता है। इसी कारण पूरे ग्रंथ को केवल एक ही रंग में देखना ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से अधूरा निष्कर्ष हो सकता है। विवाद का मूल यह है कि व्यवहारिक समाज ने किन विचारों को ज्यादा महत्व दिया और किन बातों को केवल धार्मिक या वैचारिक उद्धरणों तक सीमित रखा। यदि किसी व्यवस्था में कुछ सम्मानजनक अधिकार लिखे हों, लेकिन सामाजिक जीवन में महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित बनी रहे, तो केवल लिखित प्रावधानों के आधार पर उस व्यवस्था को समानतावादी घोषित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि मनुस्मृति को लेकर बहस भावनात्मक होने के बजाय ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक व्यवहार दोनों को साथ रखकर की जानी चाहिए।
महिलाओं की शिक्षा और निर्णय क्षमता के संदर्भ में भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं दिखाई देती। प्राचीन भारतीय परंपरा में ऐसे संदर्भ मिलते हैं जहां कन्या के ब्रह्मचर्य, विद्या प्राप्त करने और जीवनसाथी के चयन जैसी अवधारणाओं का उल्लेख किया गया है। इसलिए यह कहना कि प्राचीन भारतीय परंपरा में हर स्तर पर महिलाओं की शिक्षा को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था, एक अतिसरलीकरण होगा। लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समय बीतने के साथ सामाजिक व्यवहार और संस्थागत व्यवस्था किस दिशा में विकसित हुई। यदि किसी महिला को अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों के लिए लगातार पुरुष संरक्षण पर निर्भर रहने की सामाजिक अपेक्षा हो, तो यह उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने वाली व्यवस्था मानी जाएगी, भले ही किसी ग्रंथ में शिक्षा या सम्मान से जुड़े कुछ सकारात्मक उल्लेख मौजूद हों। इसी विरोधाभास के कारण मनुस्मृति को लेकर आज भी तीखी बहस होती है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति की पहचान परिवार के पुरुष सदस्य से निर्धारित नहीं होती। महिला स्वयं एक स्वतंत्र नागरिक है, जिसके पास शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, विवाह, तलाक, राजनीतिक भागीदारी और व्यक्तिगत निर्णयों से जुड़े अधिकार हैं। इसलिए किसी प्राचीन ग्रंथ की व्याख्या करते समय उसके समय, सामाजिक परिस्थितियों और वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के बीच अंतर करना जरूरी है। अतीत को समझने के लिए इतिहास की भाषा चाहिए, जबकि वर्तमान अधिकारों को तय करने के लिए संविधान सर्वोच्च आधार है।
आज के भारत में महिलाओं के अधिकारों की अंतिम कसौटी कोई प्राचीन सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और उसके आधार पर बनाए गए कानून हैं। स्वतंत्र भारत ने धीरे-धीरे ऐसे कानूनी प्रावधान विकसित किए जिनका उद्देश्य महिलाओं को समान नागरिक अधिकार और कानूनी सुरक्षा प्रदान करना रहा है। हिंदू कोड से जुड़े सुधारों से लेकर संपत्ति में अधिकार, विवाह और तलाक संबंधी कानून, रोजगार के अवसर, राजनीतिक भागीदारी, घरेलू हिंसा से सुरक्षा तथा महिला आरक्षण तक की यात्रा ने भारतीय महिलाओं की कानूनी स्थिति को व्यापक रूप से बदला है। अब अदालतों में किसी महिला के अधिकार का निर्धारण मनुस्मृति के आधार पर नहीं होता, बल्कि संविधान, संसद द्वारा बनाए गए कानून और न्यायिक व्याख्याओं के आधार पर होता है। यही लोकतांत्रिक भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसलिए बहस का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि राहुल गांधी ने मनुस्मृति की कौन सी पंक्ति का उल्लेख किया या उनके राजनीतिक विरोधियों ने उसके जवाब में कौन सा दूसरा उदाहरण पेश किया। वास्तविक प्रश्न इससे कहीं बड़ा है कि क्या आज की भारतीय लड़की का भविष्य किसी प्राचीन ग्रंथ से चुने गए श्लोक के आधार पर तय किया जाना चाहिए। आधुनिक भारत में इसका उत्तर स्पष्ट है। किसी नागरिक की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा का आधार संविधान है। महिलाओं ने मतदान के अधिकार से लेकर शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, सेना, विज्ञान, उद्योग और न्यायपालिका तक अपनी जगह बनाई है। इसलिए वर्तमान अधिकारों को अतीत के सामाजिक नियमों से नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखना ही उचित होगा।
पूरी तस्वीर सामने रखने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि मनुस्मृति को लेकर न तो अंधी सफाई की जरूरत है और न ही आधे उद्धरणों के आधार पर पूरी ऐतिहासिक व्यवस्था को समझ लेने की। यह प्राचीन ग्रंथ जिस सामाजिक कालखंड का हिस्सा था, वह आधुनिक लोकतांत्रिक भारत से पूरी तरह अलग था। उस दौर की सामाजिक संरचना में पितृसत्तात्मक तत्व मजबूत थे और महिलाओं की स्वतंत्रता को परिवार तथा पुरुष संरक्षण से जोड़ने वाली धारणाएं मौजूद थीं। यही कारण है कि आधुनिक नजरिए से इसके कई प्रावधान महिलाओं की स्वायत्तता और समानता के सिद्धांतों से टकराते हुए दिखाई देते हैं। साथ ही, इसमें मौजूद उन अंशों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनमें नारी सम्मान, स्त्रीधन और कुछ अधिकारों का उल्लेख मिलता है। लेकिन किसी ग्रंथ में मौजूद सकारात्मक पंक्तियां अपने आप यह साबित नहीं करतीं कि उस समय का पूरा समाज महिलाओं को समान नागरिक मानता था। इतिहास का मूल्यांकन लिखित विचारों और वास्तविक सामाजिक व्यवहार दोनों से होता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन इसी व्यापक सामाजिक असमानता के विरोध का प्रतीक बना। आज की भारतीय महिला के लिए सबसे निर्णायक बदलाव यह है कि उसके अधिकार अब किसी धार्मिक या प्राचीन सामाजिक ग्रंथ की स्वीकृति पर निर्भर नहीं हैं। वह संविधान की समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की गारंटी के आधार पर अपने अधिकार मांग सकती है। इसलिए असली बहस मनुस्मृति बनाम किसी राजनीतिक नेता की टिप्पणी नहीं, बल्कि अतीत और वर्तमान के बीच फर्क समझने की है। इतिहास को इतिहास की तरह पढ़ना और वर्तमान को संविधान के आधार पर चलाना ही आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक दिशा है।





