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आधुनिकता के दावों के बीच लालच की वेदी पर दम तोड़ती बेटियों की सिसकियां

काशीपुर(तनुजा कश्यप)। आधुनिकता के इस चमचमाते दौर में जहां हम अंतरिक्ष को फतह करने और डिजिटल क्रांति के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं हमारे अंतर्मन में छिपा एक सामाजिक दानव आज भी हमारी बेटियों की सांसों का सौदा कर रहा है। कानून की किताबों में जिस कुप्रथा को एक संगीन जुर्म करार देकर सलाखों के पीछे भेजने का प्रावधान किया गया है, उसे हमारा यह संवेदनहीन समाज आज भी श्रीति-रिवाजश् और श्प्रतिष्ठाश् का झूठा मुलम्मा चढ़ाकर अपने घरों में बड़े गर्व से पाल-पोस रहा है। आज देश की बेटियां पढ़-लिखकर आसमान की बुलंदियों को छू रही हैं, कॉर्पाेरेट जगत से लेकर देश की सीमाओं तक अपनी योग्यता का परचम लहरा रही हैं और अपने माता-पिता के सपनों को पंख दे रही हैं। मगर विडंबना देखिए कि जैसे ही ये आत्मनिर्भर बेटियां विवाह के पवित्र बंधन में बंधकर किसी नए घर की दहलीज पर कदम रखती हैं, वैसे ही वे लालच की अंतहीन वेदी पर मानसिक यातना और शारीरिक प्रताड़ना की मूक शिकार बन जाती हैं। हालिया दिनों में सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर जिस तरह से एक के बाद एक दिल दहला देने वाले मामले सामने आए हैं, उसने पूरे देश की सोई हुई अंतरात्मा को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। यह किसी एक परिवार या एक संकीर्ण मानसिकता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गहरे सामाजिक पतन का इशारा है जहां रिश्तों की पवित्रता को चंद सिक्कों और भौतिक सुखों के तराजू में तौला जा रहा है।

सड़क से लेकर संसद तक और वर्चुअल दुनिया से लेकर वास्तविक जीवन तक आज एक ही खौफनाक मंजर दिखाई दे रहा है, जहां कहीं किसी नवविवाहिता की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो जाती है, तो कहीं उसे जिंदा जलाकर मार डालने के रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोप सरेआम लगते हैं। कई मामलों में तो स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि ससुराल पक्ष की लगातार बढ़ती जा रही पैसों की भूख और अमानवीय व्यवहार से तंग आकर बेटियां खुद मौत को गले लगाने जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर हो रही हैं। यह पूरी स्थिति वास्तव में किसी एक छिटपुट वारदात या मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बीमार और सड़ी-गली सोच पर एक बहुत बड़ा तमाचा है जो आज भी किसी की लाडली बहू को एक जीता-जागता इंसान मानने के बजाय केवल एक श्एटीएम मशीनश् के रूप में देखती है। भारत के संविधान और न्याय प्रणाली में इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए दशकों पहले बेहद सख्त नियम-कायदे बनाए गए, सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर न जाने कितने बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए गए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। इन तमाम कानूनी बंदिशों और सामाजिक दावों के बावजूद घरेलू हिंसा, प्रताड़ना और नवविवाहिताओं की मौतों का यह अंतहीन सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, जो हमारी पूरी प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है।

इस पूरे डरावने परिदृश्य का सबसे दुखद और खोखला पहलू यह है कि जब भी किसी बेकसूर बेटी को इस लालच की आग में झोंक दिया जाता है, तो हमारा यह समाज और विशेषकर सोशल मीडिया की भीड़ कुछ दिनों के लिए एक कृत्रिम गुस्सा दिखाती है। इंटरनेट पर तरह-तरह के आक्रोशित संदेश तैरने लगते हैं, इंसाफ की गुहार लगाने वाले हैशटैग बड़ी तेजी से ट्रेंड करने लगते हैं और ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो अब कोई बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है। परंतु इतिहास गवाह है कि यह डिजिटल आक्रोश बहुत ही क्षणभंगुर होता है, क्योंकि चंद दिनों की हो-हल्ला और खोखली सहानुभूति के बाद सब कुछ फिर से शांत हो जाता है और लोग अपने-अपने ढर्रे पर लौट आते हैं। इसी सन्नाटे और सामाजिक उदासीनता का फायदा उठाकर पृष्ठभूमि में एक और नया मामला तैयार हो रहा होता है, जहां किसी और मासूम जिंदगी को कुर्बान करने की पटकथा लिखी जा रही होती है। सबसे ज्यादा हैरान और विचलित करने वाली बात तो यह है कि इस घृणित अपराध में केवल अनपढ़ या पिछड़े लोग ही शामिल नहीं हैं, बल्कि समाज के तथाकथित पढ़े-लिखे, उच्च शिक्षित और रसूखदार परिवार भी इस दरिंदगी के मामले में सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं।

डिग्रियों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त और समाज में बड़ी प्रतिष्ठा रखने वाले ये संभ्रांत लोग भी विवाह के बाजार में उतरते ही अपनी सारी नैतिकता को ताक पर रख देते हैं और उनकी मांगें किसी पेशेवर लुटेरे से कम नहीं होतीं। महंगी और लग्जरी गाड़ियों की चाहत, लाखों-करोड़ों का नकद लेन-देन, बेशकीमती संपत्तियों पर कब्जा और आलीशान जीवनशैली को मुफ्त में हासिल करने की यह बेलगाम हवस आज न जाने कितनी होनहार बेटियों की जिंदगी और उनके सुनहरे भविष्य पर भारी पड़ रही है। इस गहरे संकट की समीक्षा की जाए तो यह साफ हो जाता है कि यह कुप्रथा अब केवल धन-दौलत की एक सामान्य मांग नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बेहद खतरनाक और संक्रामक मानसिक बीमारी का रूप ले चुकी है। यह एक ऐसी विकृति है जो दो परिवारों और दो दिलों के बीच बनने वाले स्नेह के अटूट रिश्ते को एक ठंडे, निर्मम और व्यावसायिक सौदे में तब्दील कर देती है। जब विवाह जैसा पवित्र और अटूट गठबंधन आपसी सम्मान और संवेदनाओं के बजाय पूरी तरह से पैसों और मुनाफे के गणित पर टिक जाता है, तो वहां से प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का वजूद हमेशा के लिए मिट जाता है और केवल शुद्ध लालच का नग्न नाच बचता है।

आज के समय में यदि हम इस सामाजिक महामारी से पार पाना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि सिर्फ कड़े कानून बना देने या अदालतों के चक्कर काटने से इस सोच को नहीं बदला जा सकता। असली जरूरत हमारी उस बुनियादी परवरिश और संकीर्ण दृष्टिकोण को बदलने की है, जो जन्म से ही बेटे और बेटी में फर्क करना सिखाती है और बेटों को एक व्यापारिक संपत्ति की तरह देखती है। जब तक हमारे समाज के लोग अपने बेटों के विवाह को एक पवित्र संस्कार मानने के बजाय अपनी जीवनभर की श्कमाईश् या मुनाफा कमाने का एक जरिया समझते रहेंगे, तब तक मासूम बेटियां इसी तरह इस लालच की भट्ठी में जलती रहेंगी। पूरे समाज को सामूहिक रूप से इस कड़वी सच्चाई को अपने जहन में उतारना होगा कि इस घृणित कुप्रथा को बढ़ावा देने वाला या इसमें शामिल होने वाला हर व्यक्ति केवल देश के कानून की नजर में ही मुजरिम नहीं है, बल्कि वह मानवता के नाम पर भी एक बदनुमा दाग और अक्षम्य दोषी है। एक माता-पिता जब अपनी लाडली को भारी मन से विदा करते हैं, तो वे उस डोली में केवल कुछ घरेलू सामान या गाढ़ी कमाई का हिस्सा नहीं भेजते, बल्कि वे उस नए परिवार के हाथों में अपनी बेटी के अनगिनत सपने, अटूट भरोसा और उसका पूरा जीवन सौंप देते हैं।

विवाह के बाद उस बेकसूर को अपने नए आशियाने में किसी ऐशो-आराम या धन-दौलत की नहीं, बल्कि केवल सच्चे सम्मान, अपनत्व और सुरक्षा के एक मजबूत अहसास की जरूरत होती है, जो उसे एक नया जीवन जीने का संबल दे सके। लेकिन जब उसे सुरक्षा के बदले खौफ, सम्मान के बदले तिरस्कार और अपनत्व के बदले लालच और प्रताड़ना की बेड़ियां मिलती हैं, तो पूरी मानवता शर्मसार हो उठती है। अब समय आ गया है जब यह तीखा और असहनीय सवाल देश के प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक परिवार और पूरे तंत्र से सीधे तौर पर पूछा जाना चाहिए कि आखिर कब तक हम इस भयावह मानसिक गुलामी को ढोते रहेंगे। आखिर वह कौन सा दिन होगा जब हमारा यह समाज इस सड़ी-गली मानसिकता को हमेशा के लिए दफन कर देगा, जो इस कुप्रथा को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती है और हमारी सलोनी बेटियों की अनमोल जिंदगी को कौड़ियों के भाव समझकर उनके अस्तित्व को मिटाने पर तुली हुई है।

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