भारत(सुनील कोठारी)। भविष्य को दांव पर लगाकर तत्कालिक चुनावी लाभ हासिल करने की होड़ ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर वैचारिक और आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। आज के राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव आदर्शों, नीतियों या विकास के ठोस मुद्दों पर नहीं, बल्कि लोकलुभावन उपहारों और नकद स्थानांतरण के बड़े-बड़े वादों पर लड़े जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के बीच इस बात की होड़ मची है कि कौन मतदाताओं को अधिक नकद राशि, मुफ्त बिजली, मुफ्त यात्रा या घरेलू सामान उपलब्ध करा सकता है। वर्तमान समय में देश के भीतर चल रही इस प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन राजनीति ने नागरिकों को अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के बजाय केवल ‘लाभार्थी’ के रूप में तब्दील कर दिया है, जिससे लोकतांत्रिक चेतना लगातार कमजोर हो रही है। यदि इस व्यवस्था को गहराई से न समझा गया, तो यह हमारे पूरे आर्थिक ढांचे और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को पूरी तरह से खोखला कर देगी।
इस गंभीर स्थिति की पुष्टि भारत सरकार के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और हालिया आधिकारिक दस्तावेजों से होती है, जो देश के भीतर चल रहे इस खतरनाक विरोधाभास को पूरी तरह उजागर करते हैं। पहली रिपोर्ट केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आर्थिक समीक्षा 2025-26 है और दूसरा दस्तावेज नीति आयोग द्वारा जारी की गई देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था से संबंधित विशेष रिपोर्ट है। आर्थिक समीक्षा स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि विभिन्न राज्यों में बिना किसी शर्त के बांटी जा रही नकद राशि के कारण सरकारी खजाने पर लाखों-करोड़ों रुपयों का बोझ बढ़ रहा है और राज्यों की वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ चुकी है। इसके विपरीत, नीति आयोग की शिक्षा रिपोर्ट देश की जमीनी हकीकत का एक बेहद दर्दनाक और भयावह चेहरा प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश के हजारों सरकारी स्कूलों में आज भी बुनियादी बिजली कनेक्शन नहीं है, शिक्षकों के लाखों पद खाली पड़े हैं और छात्राओं के लिए शौचालयों तक की व्यवस्था नहीं है। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि राजनीतिक दलों के पास चुनाव जीतने के लिए तो पर्याप्त धन उपलब्ध है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य संवारने के लिए उनके पास बजट की भारी कमी है।
हाल ही में देश के पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों और वहां बनी सरकारों के गठन की प्रक्रिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक मजबूती से रेखांकित किया है। इन चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के बीच असली मुकाबला इस बात पर नहीं था कि वे विकास की क्या योजनाएं लाएंगे या रोजगार के कितने अवसर पैदा करेंगे, बल्कि पूरा ध्यान केवल ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त उपहारों पर केंद्रित रहा। कहीं महिलाओं को प्रति माह एक निश्चित राशि देने के लोकलुभावन वादे किए गए, तो कहीं दूसरी पार्टी ने उससे भी बड़ी रकम देने का ऐलान कर दिया। मतदाताओं को रिझाने के लिए मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, रियायती दरों पर या पूरी तरह मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर और यहां तक कि शादी-ब्याह के लिए सोना देने तक की घोषणाएं खुलेआम की गईं। इस पूरी प्रक्रिया को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे भेड़ों को यह भ्रम हो गया हो कि सरकार उनके कल्याण के लिए नया स्वेटर तैयार करवा रही है, जबकि वे इस कड़वी हकीकत से पूरी तरह अनजान हैं कि इस स्वेटर को बनाने के लिए ऊन किसी और के पास से नहीं, बल्कि स्वयं उन्हीं की खाल से उधेड़ा जा रहा है।

विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों द्वारा किए गए इन वादों की फेहरिस्त पर यदि गौर किया जाए, तो हर क्षेत्र में स्थिति एक जैसी ही नजर आती है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने से पहले महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को प्रति माह ₹3000 देने का बड़ा वादा किया था। इसके साथ ही महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और गर्भवती महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता सहित कई नकद योजनाओं की घोषणाएं की गईं। ऐसा नहीं है कि यह केवल एक दल की रणनीति थी; यदि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की चुनावी घोषणाओं को देखा जाए तो वे भी इसी तरह की योजनाओं के साथ मैदान में थे, जिसे प्रतिपक्ष ने केवल दोगुना करने का प्रयास किया। केरल में भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, कॉलेज जाने वाली छात्राओं को हर महीने ₹1000 देने और बुजुर्गों के लिए ₹3000 की अलग पेंशन देने जैसे बड़े ऐलान किए, साथ ही छोटे व्यापारियों के लिए बिना ब्याज के ऋण की घोषणा की गई। तमिलनाडु की राजनीति में कदम रखने वाले अभिनेता विजय ने भी इसी ढर्रे को अपनाते हुए महिलाओं के लिए ₹2500 प्रति माह, साल में छह मुफ्त गैस सिलेंडर और शादी के लिए 8 ग्राम सोना देने का बड़ा दांव खेला।
उत्तर और मध्य भारत के प्रमुख राज्यों की स्थिति भी इस वित्तीय बेलगाम प्रतिस्पर्धा से अछूती नहीं रही है। बिहार में पिछले वर्ष हुए चुनावों से ठीक पहले सरकार द्वारा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे ₹10,000 डालने की एक पूरी व्यवस्थित योजना लागू की गई ताकि तात्कालिक लाभ लिया जा सके। इसी प्रकार असम सरकार ने ₹9,000 का देश का एक सबसे बड़ा नकद हस्तांतरण कार्यक्रम चलाकर अपनी खूब पीठ थपथपाई। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी चुनावों से पहले इसी तरह की मुफ्त योजनाओं और नकद हस्तांतरण का व्यापक सहारा लिया गया। राजनीति का यह नया मॉडल अब जनता को अधिकार संपन्न बनाने के बजाय उन्हें सरकारी सुविधाओं का आदी बना रहा है। जब सरकारें युवाओं को स्थायी नौकरियां देने में विफल हो जाती हैं, तो वे बेरोजगारी भत्ता देने का आसान रास्ता चुन लेती हैं। जब वे नए कारखाने और उद्योग स्थापित करने में असमर्थ होती हैं, तो बिजली मुफ्त करने की घोषणा कर देती हैं, और जब स्कूलों की खस्ताहाल स्थिति को सुधारना उनके बस में नहीं होता, तो वे चुनावों से ऐन पहले सीधे खातों में पैसा जमा करा देती हैं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि देश का आम नागरिक और मतदाता भी अब पूरी तरह से इसी लोकलुभावन भाषा में सोचने और अपनी मांगें तय करने लगा है। यहीं से किसी भी मजबूत लोकतंत्र की नींव कमजोर होनी शुरू होती है, क्योंकि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल पांच वर्ष में एक बार मतदान केंद्र पर जाकर वोट डालना मात्र नहीं है। एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान उसकी जागरूक और सवाल पूछने वाली जनता से होती है जो अपनी चुनी हुई सरकार से पाई-पाई का हिसाब मांगे। जनता को सरकार से यह पूछना चाहिए कि टैक्स का पैसा बेहतर सड़कों, आधुनिक अस्पतालों, उत्कृष्ट स्कूलों और नए रोजगार के सृजन पर क्यों नहीं खर्च किया जा रहा है? परंतु आज की राजनीति ने देश के सम्मानित नागरिक को केवल एक आश्रित ‘लाभार्थी’ के रूप में सीमित कर दिया है और लोग भी बहुत आसानी से इस जाल में फंसते जा रहे हैं। यह स्थिति प्राचीन ग्रीक दार्शनिक प्लेटो की उस ऐतिहासिक चेतावनी की याद दिलाती है, जिन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विवेक और तर्क के स्थान पर भावनाओं और उत्तेजना के हावी होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। प्लेटो का मानना था कि जब नेता जनता की तार्किक सोच को खत्म कर उनकी कमजोरियों का फायदा उठाने लगें, तो लोकतंत्र पतन की ओर अग्रसर हो जाता है।

यदि हम मध्य प्रदेश की बहुचर्चित नकद हस्तांतरण योजना ‘लाडली बहना योजना’ के वित्तीय गणित को समझें, तो इसके खतरनाक आर्थिक प्रभाव पूरी तरह साफ हो जाते हैं। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार ने वर्ष 2023 के जून महीने में इस योजना की शुरुआत की थी, जिसके तहत पात्र महिलाओं को हर महीने ₹1000 की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया था। सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण और आर्थिक स्वावलंबन का एक बड़ा कदम बताया, लेकिन इसके राजनीतिक नतीजों ने पूरे देश की चुनावी गणित को बदल कर रख दिया। इस योजना के सफल राजनीतिक परिणाम आने के बाद देश के हर राज्य में महिलाओं को नकद राशि बांटने की एक अनियंत्रित होड़ शुरू हो गई। वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में मध्य प्रदेश सरकार ने केवल इसी एक योजना के लिए ₹18,669 करोड़ की विशाल धनराशि आवंटित की है। इसके विपरीत, यदि हम पूरे देश के गौरव और अंतरिक्ष अनुसंधान की शीर्ष संस्था इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के कुल सालाना बजट को देखें, तो वह लगभग 13,705 करोड़ रुपये है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जो संस्था चंद्रयान जैसे जटिल मिशनों को अंजाम देती है और अंतरिक्ष में भारत का अपना स्टेशन बनाने का सपना देख रही है, उसका पूरे देश का बजट एक राज्य की केवल एक नकद हस्तांतरण योजना से भी काफी कम है।
यही स्थिति देश के सबसे बड़े औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र में भी देखने को मिल रही है, जहां सरकार द्वारा ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना’ का संचालन किया जा रहा है। इस योजना के दायरे में आने वाली लगभग ढाई करोड़ महिलाओं को हर महीने ₹1500 देने का वादा किया गया है और इसके लिए वर्ष 2026-27 के बजट में ₹26,500 करोड़ की भारी-भरकम राशि का प्रावधान किया गया है। इसकी तुलना यदि देश की रक्षा प्रणाली, मिसाइल विकास और सैन्य अनुसंधान का जिम्मा संभालने वाली सर्वोच्च संस्था डीआरडीओ के कुल बजट से की जाए, तो रक्षा अनुसंधान का यह बजट केवल ₹29,000 करोड़ के आसपास ठहरता है। देश में एक नए आईआईएम यानी भारतीय प्रबंधन संस्थान को स्थापित करने में लगभग 500 से 550 करोड़ रुपये की कुल पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, जैसा कि गुवाहाटी आईआईएम के निर्माण में देखा गया था। इसका तात्पर्य यह है कि यदि महाराष्ट्र की इस एक योजना को केवल एक वर्ष के लिए रोक दिया जाए, तो उस बचाए गए पैसे से देश के भीतर 30 से अधिक वैश्विक स्तर के नए आईआईएम खड़े किए जा सकते हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों के भविष्य का निर्माण करेंगे।
राजनीति की इस विसंगति ने देश के नीति-निर्धारकों और देश की सर्वोच्च अदालत को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। वर्ष 2022 में मुफ्त उपहारों की इस बढ़ती संस्कृति के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि लोक कल्याणकारी योजनाओं और देश की अर्थव्यवस्था के बीच एक मजबूत संतुलन बनाना बेहद अनिवार्य है। देश की सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि चुनावी फ्रीबीज अब केवल एक राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह देश के सामने एक बड़ा आर्थिक और लोकतांत्रिक संकट बन चुकी हैं। भारत सरकार की अपनी आर्थिक समीक्षा 2025-26 भी इस विषय पर अत्यंत गंभीर वित्तीय चेतावनी देती है। यह आधिकारिक दस्तावेज साफ-साफ शब्दों में स्वीकार करता है कि राज्यों में बिना किसी शर्त के नकद राशि बांटने की प्रवृत्तियों में विस्फोटक वृद्धि हुई है। वर्ष 2022-23 के बाद से इन लोकलुभावन योजनाओं पर होने वाला राज्यों का खर्च पांच गुना से भी अधिक बढ़ चुका है और वर्ष 2025-26 तक यह कुल वित्तीय आंकड़ा ₹1.7 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है।

यह खर्च इस समय कुछ राज्यों की कुल घरेलू जीडीपी के 1.2 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और कई राज्य अपने कुल बजटीय खर्च का 8 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल नकद राशि बांटने में ही गंवा रहे हैं। आर्थिक समीक्षा स्पष्ट करती है कि इन योजनाओं का सबसे बड़ा संकट राजकोषीय निरंतरता का पूरी तरह समाप्त होना है, क्योंकि राज्यों का राजकोषीय घाटा 2.6 प्रतिशत की सुरक्षित सीमा को पार करके अब 3.2 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। राजस्व घाटे में हो रही इस लगातार वृद्धि का सीधा मतलब यह है कि राज्य सरकारें अब अपने रोजमर्रा के प्रशासनिक खर्चों और वेतन-पेंशन को चुकाने के लिए भी बाजार से भारी कर्ज ले रही हैं। जब कोई भी सरकार उधार लिए गए पैसे का उपयोग दीर्घकालिक पूंजी निर्माण जैसे सड़क, रेलवे, अस्पताल या उद्योगों को लगाने में न करके केवल नकद बांटने में करने लगती है, तो देश का भविष्य गिरवी रख दिया जाता है। लोकलुभावन योजनाओं में अत्यधिक पैसा झोंकने के कारण बुनियादी सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बजट पूरी तरह सिकुड़ जाता है।
नीति आयोग की रिपोर्ट इस अनियंत्रित राजनीतिक होड़ की असली और बेहद डरावनी सामाजिक कीमत को विस्तार से बयां करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, आज भी भारत में 1 लाख से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक अकेले शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। देश के लगभग 1.19 लाख स्कूलों में बिजली का एक बल्ब तक नहीं जलता है और 14,505 स्कूलों में बच्चों के लिए पीने के साफ पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। करीब 60 हजार स्कूलों में बच्चों के हाथ धोने के लिए पानी और साबुन तक उपलब्ध नहीं है, और सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि 98,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए पृथक क्रियाशील शौचालय तक नहीं बने हैं। शिक्षकों की कमी का आलम यह है कि अकेले कर्नाटक में 38,000, बिहार में 2 लाख से अधिक, झारखंड में 1 लाख, मध्य प्रदेश में 52,000 और पश्चिम बंगाल में 77,000 शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं। सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में से केवल 51.7 प्रतिशत स्कूलों में ही विज्ञान की प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं, लेकिन देश के चुनावी मंचों से ये सभी जीवन-मरण से जुड़े मुद्दे पूरी तरह से गायब हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं वर्ष 2022 में इस प्रवृत्ति को ‘रेवड़ी कल्चर’ का नाम देकर देश के विकास के लिए एक बड़ा खतरा बताया था, परंतु आज की हकीकत यह है कि यह बीमारी किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रह गई है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जब दिल्ली और पंजाब में मुफ्त बिजली और पानी का मॉडल पेश किया था, तब उसकी भारी आलोचना हुई थी, लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी सहित तमाम बड़े दल उन्हीं से बड़े और व्यापक नकद हस्तांतरण के वादों के साथ हर राज्य के चुनाव में उतर रहे हैं। झारखंड के हालिया चुनावों में भी ‘मैया सम्मान योजना’ के तहत बांटी गई नकद राशि ने सत्ता पक्ष को दोबारा वापसी कराने में मुख्य भूमिका निभाई। आरबीआई की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है कि मुफ्त बिजली, पानी, कर्ज माफी और मुफ्त परिवहन जैसी योजनाएं देश के भीतर एक गलत क्रेडिट संस्कृति को जन्म देती हैं, जिससे निजी निवेश पूरी तरह ठप हो जाता है और श्रम शक्ति की उत्पादकता में भारी गिरावट आती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि देखा जाए तो दुनिया के कई विकासशील देशों ने इस नकद सहायता को पूरी तरह से देश के मानव विकास के साथ जोड़कर एक सकारात्मक और जवाबदेह मॉडल तैयार किया है। उदाहरण के लिए, ब्राजील में संचालित ‘बोल्सा फामिलिया’ योजना के तहत नकद राशि तभी दी जाती है जब परिवार अपने बच्चों की स्कूलों में नियमित उपस्थिति और उनका पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करते हैं। मेक्सिको में भी नकद सहायता को बच्चों की उच्च शिक्षा और नियमित स्वास्थ्य जांच के अनिवार्य नियमों से जोड़ा गया है, जबकि फिलीपींस में इन योजनाओं की समय-समय पर कड़ी समीक्षा की जाती है ताकि सक्षम हो चुके परिवारों को धीरे-धीरे इस सहायता सूची से बाहर निकाल कर उन्हें पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाया जा सके। इसके विपरीत, भारत में दी जा रही बिना शर्त नकद सहायता नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय पूरी तरह से सरकारी बैसाखियों पर निर्भर बना रही है, जो देश के दीर्घकालिक आर्थिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। देश के भीतर शिक्षित स्नातक युवाओं में बेरोजगारी की दर आज लगभग 13 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर है, लेकिन राजनीतिक मंचों पर स्थायी रोजगार के ठोस रोडमैप के बजाय केवल भत्तों और तात्कालिक लालच की चमक बिखेरी जा रही है, जिस पर देश के हर जागरूक नागरिक को अब बेहद गंभीरता से सोचने और सरकारों से कड़े सवाल पूछने की आवश्यकता है।





