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गणतंत्र दिवस पर उर्वशी दत्त बाली का संदेश दिखावे नहीं मेहनत और सादगी से बनती है असली पहचान

उर्वशी दत्त बाली ने बच्चों और युवाओं को समझाया कि ब्रांडेड दिखावा केवल क्षणिक, मेहनत ईमानदारी और सोच पर काम करना ही असली पहचान बनाता है और जीवन भर सम्मान दिलाता है।

काशीपुर। शहर में गणतंत्र दिवस के अवसर और पति महापौर दीपक बाली के 52वें जन्मदिन के विशेष संयोग पर डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर एवं समाजसेवी उर्वशी दत्त बाली का संदेश चर्चा का विषय बना रहा। इस मौके पर उन्होंने वर्तमान समय में बच्चों और युवाओं के बीच तेजी से बढ़ रही दिखावे की संस्कृति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए समाज के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया। उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आज की पीढ़ी ब्रांड, फैशन और बाहरी चमक-दमक को ही सफलता का पैमाना मानने लगी है, जबकि इतिहास गवाह है कि देश और समाज को दिशा देने वाले महान व्यक्तित्वों ने कभी भी आडंबरपूर्ण जीवन नहीं जिया। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारत माता के अमर सपूत पंडित लाल बहादुर शास्त्री, मिसाइल मैन के रूप में विख्यात एपीजे अब्दुल कलाम और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने हमेशा सादगी को अपनाया और उसी सादगी से असाधारण काम किए। उनका कहना था कि आज हालात इसके उलट हो गए हैं, जहां साधारण वेशभूषा को कमजोरी समझा जाता है और महंगे कपड़ों को सामाजिक हैसियत से जोड़ा जाने लगा है।

समाजसेवी उर्वशी दत्त बाली ने अपने संदेश में कहा कि बच्चों और युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि ब्रांडेड कपड़े, महंगे मोबाइल और फैशनेबल जीवनशैली केवल क्षणिक आकर्षण पैदा करते हैं। लोग दो-चार दिन तक ही इन्हें देखते और चर्चा करते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके व्यक्तित्व, उसकी सोच और उसके परिश्रम से बनती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कपड़ों के टैग, मोबाइल का मॉडल और बदलता फैशन इंसान की असल पहचान नहीं बन सकते। असली पहचान वही होती है जो व्यक्ति अपने कर्म, मेहनत और व्यवहार से गढ़ता है। उर्वशी दत्त बाली ने युवाओं को यह भी समझाया कि यदि कोई व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर काम करता है और लगातार खुद को बेहतर बनाता है, तो उसे बाहरी दिखावे की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ऐसी पहचान समाज में लंबे समय तक कायम रहती है, जबकि दिखावे की चमक बहुत जल्दी फीकी पड़ जाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि पैसा कमाना कोई गलत बात नहीं है और न ही समृद्ध जीवन जीने में कोई बुराई है, लेकिन असली समझदारी इस बात में है कि धन का उपयोग कहां और किस उद्देश्य के लिए किया जाए। उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, यदि किसी के पास संसाधन हैं, तो उसे कम से कम दस प्रतिशत निवेश स्वयं के विकास पर करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह निवेश कपड़ों के महंगे टैग पर नहीं, बल्कि किताबों, शिक्षा, नई स्किल सीखने, स्वास्थ्य और सकारात्मक सोच पर होना चाहिए। उनका मानना है कि थोड़ी-सी पूंजी भी यदि सही दिशा में लगाई जाए, तो व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को इतना मजबूत बना सकता है कि फिर उसे किसी ब्रांड का सहारा लेने की जरूरत ही नहीं रहती। इस तरह का निवेश न केवल व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि समाज में भी उसे सम्मान दिलाता है।

उर्वशी दत्त बाली ने आज के दौर की सोशल मीडिया संस्कृति पर भी खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज का युवा वर्ग दिखने में व्यस्त है, कुछ बनने में नहीं। रील, फोटो और आभासी दुनिया के आकर्षण ने युवाओं को इस कदर घेर लिया है कि वास्तविक जीवन की मेहनत और संघर्ष पीछे छूटते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक और फॉलोअर्स अस्थायी होते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में सम्मान केवल ईमानदारी, परिश्रम और काबिलियत से प्राप्त होता है। जो लोग खुद पर लगातार काम करते हैं, उन्हें अपनी उपलब्धियां दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उनका काम ही उनकी पहचान बन जाता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे आभासी दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन में अपने लक्ष्य तय करें और उन्हें पाने के लिए निरंतर प्रयास करें।

अपने पति महापौर दीपक बाली के 52वें जन्मदिन के अवसर पर उर्वशी दत्त बाली ने उनके जीवन से जुड़ा प्रेरणादायक उदाहरण भी साझा किया। उन्होंने कहा कि दीपक बाली ने हमेशा अपने जीवन में मेहनत और ईमानदारी को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी और दिखावे को कभी महत्व नहीं दिया। उन्होंने बताया कि पिछले पच्चीस वर्षों से उन्होंने दीपक बाली को बेहद करीब से देखा है और इस दौरान कभी उन्हें थकान से हार मानते नहीं देखा। उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है और वे लगातार काम में जुटे रहते हैं। उन्होंने कहा कि दीपक बाली ने इतनी मेहनत की है कि यदि पर्वत उठाने जैसा कठिन कार्य भी सामने आ जाए, तो वे उससे घबराने वाले नहीं हैं। यही जज्बा आज उन्हें समाज में एक अलग पहचान दिलाता है।

उन्होंने आगे कहा कि दीपक बाली ने कभी किसी ब्रांड के सहारे खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपने काम, अपने व्यवहार और जनता के प्रति समर्पण से खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया। उनका मानना है कि ब्रांड केवल पैसे की बर्बादी और कुछ दिनों का झूठा दिखावा होता है, जबकि असली ब्रांड जी-तोड़ मेहनत, ईमानदारी और लोगों के प्रति समर्पण से बनता है। उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आज शहर का हर नागरिक और खासकर युवा वर्ग दीपक बाली की कड़ी मेहनत को अपनी आंखों से देख रहा है और उसी से प्रेरणा भी ले रहा है। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि सच्ची पहचान दिखावे से नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम से बनती है।

अपने संदेश के अंत में उर्वशी दत्त बाली ने बच्चों और युवाओं को समय की कीमत समझाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बचपन और युवावस्था का समय बेहद कीमती होता है और यह रोज-रोज वापस नहीं आता। जो ऊर्जा, जो अवसर और जो समय आज उपलब्ध है, वह बार-बार नहीं मिलेगा। समय बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और हर दिन हमें आगे ले जा रहा है। यदि आज के बच्चे और युवा इस समय में खुद को नहीं पहचानते और अपने विकास पर काम नहीं करते, तो आने वाले कल में दुनिया उन्हें केवल भीड़ का हिस्सा मान लेगी। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अंत में सच्चाई यही है कि कपड़ों का ब्रांड बदल जाता है, मोबाइल का मॉडल बदल जाता है, लेकिन इंसान की पहचान वही रहती है जो उसने खुद बनाई होती है। इसलिए दिखावे की दौड़ छोड़कर खुद को मजबूत बनाइए और खुद को ही ब्रांड बनाइए, क्योंकि असली ब्रांड वही होता है जो पूरी जिंदगी लोगों को दिखाई देता है, सिर्फ दो दिन नहीं।

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