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सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ते अंतरराष्ट्रीय सपने और महावीर अखाड़े की अनसुनी दास्तां

काशीपुर। देवभूमि उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिले में स्थित काशीपुर की धरती हमेशा से ही प्रतिभावान खिलाड़ियों की जननी रही है, लेकिन यहाँ के प्राचीन और ऐतिहासिक महावीर अखाड़े की वर्तमान स्थिति व्यवस्थाओं की पोल खोलती नजर आ रही है। दशकों पुराने इस अखाड़े ने न केवल शहर बल्कि देश का मान बढ़ाने वाले अनगिनत पहलवान तैयार किए हैं, जो आज भी अपनी मिट्टी की खुशबू को अंतरराष्ट्रीय पटल पर बिखेरने का माद्दा रखते हैं। स्थानीय युवाओं के लिए यह अखाड़ा केवल एक अभ्यास स्थल नहीं, बल्कि एक मंदिर के समान है, जहाँ वे पसीना बहाकर अपने भविष्य की इबारत लिखने का प्रयास करते हैं। हालांकि, विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर शहर का नाम रोशन करने वाले इन युवाओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। यहाँ प्रशिक्षण ले रहे पहलवानों के हौसले तो फौलादी हैं, लेकिन संसाधनों की कमी उनके पैरों की बेड़ियाँ बनती जा रही हैं, जिससे खेल जगत में एक बड़ी चिंता पैदा हो गई है।

अखाड़े के संघर्षशील माहौल के बीच जब हमारी टीम ने राष्ट्रीय खेलों में अपनी छाप छोड़ने वाले प्रतिभावान पहलवान अवतार सिंह से बात की, तो उनकी आंखों में जीत की चमक के साथ-साथ व्यवस्था के प्रति एक गहरी कसक भी दिखाई दी। अवतार सिंह ने इसी साल राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग किया और सीनियर नेशनल के साथ-साथ गाजियाबाद में आयोजित फेडरेशन कप में चौथा स्थान प्राप्त कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने बड़े ही भावुक मन से बताया कि जब वे राष्ट्रीय स्तर पर खेलने जाते हैं, तो वहां का परिवेश यहाँ के मिट्टी वाले अखाड़े से बिल्कुल अलग होता है। मिट्टी में दांव-पेंच सीखने के कारण गद्दों (मैट) पर उनका पैर सही ढंग से नहीं जम पाता, जिससे प्रदर्शन प्रभावित होता है। उनके अनुसार, यदि सरकार या प्रशासन यहाँ आधुनिक मैट और बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था कर दे, तो काशीपुर का हर दूसरा युवा देश के लिए मेडल लाने की क्षमता रखता है, लेकिन फिलहाल वे केवल अपनी हिम्मत के भरोसे ही मैदान में डटे हुए हैं।

सुविधाओं के नाम पर इस ऐतिहासिक स्थल की बदहाली का आलम यह है कि यहाँ के पहलवानों के पास न तो कोई स्थाई कोच है और न ही अभ्यास के लिए जरूरी आधुनिक उपकरण। अभ्यास कर रहे युवा पहलवान दलजीत और उनके साथियों ने बताया कि अखाड़े में मूलभूत सुविधाओं जैसे बाथरूम और जिम के सामान का भारी अभाव है। पहलवानों का आरोप है कि कुछ रसूखदार लोगों ने अखाड़े के विकास के नाम पर चंदा तो इकट्ठा किया, लेकिन वह पैसा खिलाड़ियों तक पहुँचने के बजाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। दलजीत के अनुसार, आज भी यह अखाड़ा केवल दीप्पू पहलवान, दलजीत पहलवान, लखन पहलवान और अवतार पहलवान जैसे सीनियर खिलाड़ियों के आपसी सहयोग से जीवित है। इन खिलाड़ियों का कहना है कि दिवंगत पहलवान ओम प्रकाश शर्मा जी ने अपने समय में इस अखाड़े की छत और बुनियादी ढांचे के लिए काफी प्रयास किए थे, लेकिन उनके जाने के बाद से यह अखाड़ा अब किसी मसीहा की राह देख रहा है ताकि यहाँ के बच्चों को दर-दर न भटकना पड़े।

अखाड़े में प्रशिक्षण की बागडोर फिलहाल भारतीय सेना में कार्यरत कोच लोकेंद्र सिंह ने संभाली हुई है, जो अपनी छुट्टियों के दौरान यहाँ के बच्चों को रेसलिंग के गुर सिखाते हैं। लोकेंद्र सिंह का मानना है कि काशीपुर के इन युवाओं में अद्भुत क्षमता (कैपेबिलिटी) है और वे एसएससीबी जैसी बड़ी टीमों को टक्कर दे सकते हैं, बशर्ते उन्हें सही दिशा और विशेषज्ञ कोच मिले। उन्होंने समाज में बढ़ते नशे के चलन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि खेल ही वह एकमात्र जरिया है जिससे युवा पीढ़ी को नशे की गर्त से बाहर निकाला जा सकता है। उनके अनुसार, जिम जाने वाले युवाओं को यह समझना होगा कि कुश्ती जैसे खेलों में कार्डियो, स्ट्रेंथिंग और तकनीक का तालमेल जरूरी है, न कि केवल शरीर बनाना। लोकेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार इन खिलाड़ियों को थोड़ा सा भी सहयोग दे, तो ये युवा न केवल खुद को नशे से दूर रखेंगे, बल्कि अपने परिवार और समाज के लिए एक प्रेरणा पुंज बनकर उभरेंगे।

वर्तमान में लगभग 20 से अधिक स्थानीय और बाहरी युवा इस अखाड़े में दिन-रात पसीना बहा रहे हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। इन खिलाड़ियों के अनुसार, शासन-प्रशासन और स्थानीय नेताओं को इस 60-70 साल पुराने प्राचीन महावीर अखाड़े की सुध लेनी चाहिए ताकि यहाँ की मिट्टी से निकले पहलवान फिर से देश का परचम लहरा सकें। खिलाड़ियों का दर्द यह है कि वे बिना किसी सरकारी सहायता के भी उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर रिप्रेजेंट कर रहे हैं, फिर भी उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। यदि समय रहते इन उभरते हुए सितारों को मैट, जिम उपकरण और एक स्थाई कोच की सुविधा मुहैया नहीं कराई गई, तो काशीपुर की यह खेल विरासत धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में दब जाएगी। अब देखना यह होगा कि खेल मंत्री और स्थानीय जनप्रतिनिधि इन पहलवानों की पुकार सुनकर कब इस ऐतिहासिक अखाड़े के कायाकल्प की दिशा में कदम बढ़ाते हैं।

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