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अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश की पैरवी से सर्वेश कुमार पॉक्सो मामले में दोषमुक्त

पांच साल पुराने मुकदमे में अंतिम बहस के बाद अदालत ने माना आरोप संदेह से परे साबित नहीं, 7 अगस्त 2026 को भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो अधिनियम के आरोपों से मिली राहत।

काशीपुर। वर्ष 2021 में दर्ज हुई एक गंभीर आपराधिक शिकायत से शुरू हुई करीब पांच वर्ष लंबी न्यायिक प्रक्रिया का अंत 7 अगस्त 2026 को काशीपुर की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत के महत्वपूर्ण फैसले के साथ हुआ। अदालत ने सर्वेश कुमार को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 354, 452, 504 और 506 के साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 7/8 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। मामला पहले रुद्रपुर की फास्ट ट्रैक अदालत में विचाराधीन था। बाद में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत के काशीपुर में स्थापित होने के बाद यह प्रकरण भी इसी न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत आगे बढ़ा। उपलब्ध न्यायालयीन विवरण के मुताबिक, काशीपुर की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत से निस्तारित हुए मामलों में यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत सामग्री, गवाहियों, दस्तावेजों तथा अंतिम बहस के दौरान रखे गए तर्कों का समग्र परीक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को आपराधिक मुकदमे में आवश्यक कानूनी कसौटी यानी यथोचित संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा। इसी आधार पर अदालत ने सर्वेश कुमार को सभी संबंधित आरोपों से बरी कर दिया। मामले में बचाव पक्ष की ओर से काशीपुर के अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश ने पैरवी की। अंतिम बहस 4 अगस्त 2026 को हुई, जबकि निर्णय 7 अगस्त को सुनाया गया।

दरअसल इस प्रकरण की शुरुआत 14 जून 2021 को हुई थी, जब खड़कपुर देवीपुरा, थाना आईटीआई, जिला ऊधम सिंह नगर निवासी पीड़िता/मुकदमा वादिनी की ओर से सर्वेश कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। प्राथमिकी संख्या 156/2021 में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 354, 452, 504 और 506 के साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 7/8 के अंतर्गत मामला दर्ज किया था। न्यायालयीन रिकॉर्ड में दर्ज अभियोजन कथानक के अनुसार शिकायत में कहा गया था कि घटना के समय पीड़िता अपने घर में अकेली थी और आरोपित सर्वेश कुमार कथित रूप से उसके घर में प्रवेश कर गया। शिकायत में उसके साथ जबरन छेड़छाड़ किए जाने तथा विरोध करने पर मारपीट और गाली-गलौच करने का आरोप लगाया गया था। यह भी आरोप लगाया गया था कि शोर मचाने के बाद जान से मारने की धमकी दी गई। अभियोजन के अनुसार घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 वर्ष बताई गई थी। इन्हीं आरोपों को आधार बनाकर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने के बाद विवेचना प्रारंभ की। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच प्रक्रिया आगे बढ़ी और संबंधित दस्तावेज, बयान तथा अन्य उपलब्ध सामग्री जुटाई गई। इसके बाद जांच अधिकारी ने विवेचना पूरी करते हुए सर्वेश कुमार के खिलाफ आरोप पत्र तैयार किया और उसे सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत किया। इस तरह एक प्राथमिकी से शुरू हुआ मामला जांच, गिरफ्तारी, जमानत, आरोप पत्र, न्यायालयीय संज्ञान, साक्ष्य और बहस जैसे कई कानूनी चरणों से गुजरता हुआ आखिरकार वर्ष 2026 में अंतिम निर्णय तक पहुंचा।

पुलिस कार्रवाई के शुरुआती चरण में सर्वेश कुमार की गिरफ्तारी 15 जून 2021 को की गई थी, यानी प्राथमिकी दर्ज होने के अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें 31 जुलाई 2021 को जमानत पर रिहा किया गया। हालांकि जमानत मिलने के बाद मुकदमे की कार्यवाही समाप्त नहीं हुई और प्रकरण अपनी निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे चलता रहा। विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस की ओर से आरोप पत्र अदालत के समक्ष दाखिल किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार 18 सितंबर 2021 को न्यायालय ने आरोप पत्र का संज्ञान लिया। इसके बाद मुकदमा विचारण के चरण में पहुंचा, जहां अभियोजन और बचाव पक्ष को अपना-अपना पक्ष रखने तथा उपलब्ध साक्ष्यों पर बहस करने का अवसर मिला। यह मामला विशेष सत्र विचारण संख्या 432/2021 के रूप में भी न्यायालयीन रिकॉर्ड में दर्ज रहा। मुकदमे के दौरान अदालत ने मामले से जुड़े आरोपों, दस्तावेजों, साक्ष्यों और पक्षकारों की दलीलों को क्रमशः परखा। करीब पांच वर्षों तक चली इस प्रक्रिया में विभिन्न न्यायिक चरण पूरे हुए। प्राथमिकी से लेकर अंतिम फैसले तक का यह सफर बताता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायालय किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उपलब्ध सामग्री का विस्तार से परीक्षण करता है। आरोप लगाए जाने मात्र से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता और दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को कानून के निर्धारित मानक पर आरोप साबित करने होते हैं। इसी कसौटी पर इस मामले में भी अदालत ने अंतिम निर्णय दिया।

मुकदमे के अंतिम और सबसे निर्णायक चरण में 4 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों की अंतिम बहस सुनी गई। विशेष सत्र विचारण संख्या 432/2021 में हुई इस सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने मामले के समर्थन में उपलब्ध सामग्री और पूर्व में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर अपनी दलीलें रखीं, जबकि बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश ने सर्वेश कुमार की ओर से प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने उन बिंदुओं को अदालत के सामने रखा, जिनके आधार पर अभियोजन के आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की विश्वसनीयता तथा कानूनी पर्याप्तता का परीक्षण किया जाना जरूरी था। अंतिम बहस पूरी होने के बाद न्यायालय ने पूरे मुकदमे में प्रस्तुत सामग्री का समग्र रूप से आकलन किया। न्यायालयीन प्रक्रिया में अंतिम फैसला किसी आरोप की गंभीरता या केवल शिकायत के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए प्रमाणों की वैधानिक मजबूती और उनकी विश्वसनीयता को कसौटी पर कसने के बाद निर्णय लिया जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और मुकदमे में उपलब्ध समस्त सामग्री पर विचार किया। बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत तर्कों के साथ-साथ अभियोजन के साक्ष्यों का भी न्यायिक परीक्षण हुआ। इसके बाद अदालत ने पाया कि आरोपों को दोषसिद्धि के लिए आवश्यक स्तर तक प्रमाणित नहीं किया जा सका। यही निष्कर्ष आगे चलकर 7 अगस्त को सुनाए गए अंतिम निर्णय का आधार बना।

अदालत के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अभियोजन पक्ष सर्वेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को यथोचित संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका। आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक पर प्रमाणित करे। उपलब्ध न्यायालयीन विवरण के मुताबिक इस मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन की ओर से पेश सामग्री दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं थी। परिणामस्वरूप 7 अगस्त 2026 को सर्वेश कुमार को भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 354, 452, 504 और 506 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 7/8 के तहत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया। इस फैसले के साथ वर्ष 2021 में दर्ज हुई प्राथमिकी से प्रारंभ हुई लंबी विचारण प्रक्रिया अपने निर्णायक मुकाम पर पहुंची। अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय दिया और यह स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के लिए आरोपों का कानूनी रूप से प्रमाणित होना अनिवार्य है। मामले में आरोपों की प्रकृति गंभीर थी, लेकिन न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता के बजाय उनके समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्यों की कानूनी स्थिति और प्रमाणिकता को निर्णय का आधार बनाया। इस प्रकार अंतिम आदेश में सर्वेश कुमार को सभी संबंधित आरोपों से दोषमुक्त घोषित किया गया।

इस पूरे प्रकरण में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश की पैरवी भी महत्वपूर्ण रही। 4 अगस्त को हुई अंतिम बहस में दोनों अधिवक्ताओं ने अभियुक्त की ओर से न्यायालय के सामने अपने तर्क रखे और मामले में उपलब्ध साक्ष्यों तथा परिस्थितियों के आधार पर बचाव पक्ष का पक्ष प्रस्तुत किया। बचाव पक्ष की दलीलों का केंद्र यह था कि अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोपों को दोषसिद्धि के लिए आवश्यक कानूनी स्तर पर परखा जाए और उपलब्ध प्रमाणों की वास्तविक स्थिति के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए। अंतिम बहस पूरी होने के बाद न्यायालय ने अभियोजन तथा बचाव पक्ष दोनों की प्रस्तुतियों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया। अदालत ने किसी एक पक्ष की दलील को मात्र उसके प्रस्तुत किए जाने के आधार पर स्वीकार नहीं किया, बल्कि मुकदमे की पूरी सामग्री को कानूनी कसौटी पर परखा। न्यायालयीन अभिलेख के अनुसार, इसी परीक्षण के बाद यह निष्कर्ष सामने आया कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल नहीं हुआ। इसके बाद सर्वेश कुमार को दोषमुक्त किए जाने का आदेश पारित हुआ। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं द्वारा अंतिम चरण में रखे गए तर्कों को मामले की पैरवी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया, हालांकि अंतिम निर्णय न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर ही दिया। इस प्रकार लगभग पांच वर्ष से लंबित मुकदमे का अंत बचाव पक्ष के पक्ष में आए फैसले के साथ हुआ।

यदि पूरे मामले की न्यायिक समयरेखा पर नजर डालें तो 14 जून 2021 को प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर 7 अगस्त 2026 के फैसले तक कई महत्वपूर्ण पड़ाव सामने आते हैं। प्राथमिकी संख्या 156/2021 दर्ज होने के अगले दिन 15 जून 2021 को सर्वेश कुमार की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 31 जुलाई 2021 को उन्हें जमानत मिल गई। पुलिस विवेचना जारी रही और जांच पूरी होने के बाद आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। 18 सितंबर 2021 को अदालत ने आरोप पत्र का संज्ञान लिया और इसके बाद मुकदमे की विचारण प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। समय बीतने के साथ मामले में साक्ष्यों का परीक्षण हुआ, पक्षकारों की दलीलें सामने आईं और अंततः मुकदमा अंतिम बहस के चरण तक पहुंचा। 4 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों की अंतिम बहस सुनी गई और उसके तीन दिन बाद 7 अगस्त 2026 को फैसला सुनाया गया। इस तरह लगभग पांच वर्ष तक चली न्यायिक यात्रा का समापन हुआ। इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद किसी आपराधिक मुकदमे का अंतिम निष्कर्ष तत्काल नहीं निकलता। जांच, आरोप पत्र, संज्ञान, विचारण, साक्ष्य, जिरह, अंतिम बहस और निर्णय जैसे अनेक चरणों से गुजरने के बाद अदालत किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचती है। इस मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई और प्रत्येक उपलब्ध सामग्री के न्यायिक परीक्षण के बाद अंतिम आदेश पारित किया गया।

काशीपुर में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत की स्थापना और यहां इस मामले का अंतिम निर्णय सामने आना भी इस प्रकरण की न्यायिक यात्रा का एक उल्लेखनीय हिस्सा है। प्रारंभिक तौर पर मुकदमा रुद्रपुर की फास्ट ट्रैक अदालत में विचाराधीन था, लेकिन फास्ट ट्रैक न्यायालय की व्यवस्था काशीपुर में बनने के बाद प्रकरण यहां स्थानांतरित होकर आगे बढ़ा। उपलब्ध विवरण में इसे काशीपुर की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत से सामने आया महत्वपूर्ण निर्णय बताया गया है। अदालत ने मामले को केवल आरोपों के आधार पर नहीं देखा, बल्कि मुकदमे में उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की अंतिम दलीलों को आधार बनाकर निष्कर्ष निकाला। न्यायालय के समक्ष अभियोजन को अपने आरोपों को प्रमाणित करना था, जबकि बचाव पक्ष को अपने मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाने का अवसर मिला। अंतिम मूल्यांकन में अभियोजन पक्ष अपेक्षित स्तर पर आरोपों को सिद्ध नहीं कर पाया और इसका परिणाम दोषमुक्ति के रूप में सामने आया। 7 अगस्त 2026 का यह आदेश वर्ष 2021 में दर्ज प्राथमिकी के बाद चली लंबी प्रक्रिया का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष है। मामले में लगाए गए सभी संबंधित आरोपों से सर्वेश कुमार को राहत मिली। अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश की प्रभावी पैरवी के बाद अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए अपना फैसला सुनाया।

इस फैसले का मूल संदेश यही है कि आपराधिक मुकदमों में अंतिम निर्णय आरोपों की गंभीरता से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत प्रमाणों और उनके कानूनी परीक्षण से तय होता है। वर्ष 2021 में जिस प्राथमिकी ने एक गंभीर कानूनी विवाद को जन्म दिया था, वही मामला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के लंबे दौर के बाद अगस्त 2026 में अपने निष्कर्ष तक पहुंचा। अदालत ने अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों को सुनने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया और पाया कि सर्वेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोप उस कानूनी स्तर तक सिद्ध नहीं हुए, जो दोषसिद्धि के लिए आवश्यक है। इसी आधार पर 7 अगस्त को उन्हें भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 354, 452, 504, 506 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 7/8 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया। मामले की लंबी न्यायिक यात्रा में 14 जून 2021 की प्राथमिकी, 15 जून की गिरफ्तारी, 31 जुलाई की जमानत, 18 सितंबर 2021 को आरोप पत्र का संज्ञान, वर्षों तक चला विचारण, 4 अगस्त 2026 की अंतिम बहस और 7 अगस्त 2026 का फैसला प्रमुख पड़ाव रहे। इस प्रकार काशीपुर की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने उपलब्ध न्यायालयीन सामग्री और कानूनी कसौटी पर विचार करते हुए मामले का निस्तारण किया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश और अधिवक्ता सिंधु आकाश की पैरवी के बाद आया यह फैसला अब इस करीब पांच वर्ष पुराने प्रकरण की न्यायिक यात्रा का अंतिम अध्याय बन गया है।

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