काशीपुर। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण को लेकर एक बार फिर नया विवाद सामने आ गया है। काशीपुर तहसील क्षेत्र के सक्रिय राज्य निर्माण आंदोलनकारियों ने खटीमा में राज्य आंदोलनकारी घोषित किए गए लोगों के चिन्हीकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाते हुए गृह सचिव, उत्तराखंड सरकार के नाम एक विस्तृत ज्ञापन उपजिलाधिकारी काशीपुर के माध्यम से सौंपा। ज्ञापन में आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि खटीमा क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को राज्य आंदोलनकारी घोषित कर दिया गया है, जो निर्धारित मानकों के अनुरूप पात्र नहीं हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तो पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि जिन लोगों को राज्य आंदोलनकारी घोषित किया गया है, उन्हें सरकार की ओर से पेंशन, आरक्षण, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा, गेस्ट हाउस सहित अन्य सुविधाओं का लाभ मिल रहा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि पात्रता के मानकों की अनदेखी कर किसी को लाभ दिया गया है तो इससे वास्तविक राज्य आंदोलनकारियों के साथ अन्याय हो रहा है। इसी कारण उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने और पात्र लोगों को ही सरकारी सुविधाओं का लाभ सुनिश्चित करने की मांग शासन से की है।
ज्ञापन में राज्य निर्माण सक्रिय आन्दोलनकारी समिति उत्तराखंड एवं काशीपुर क्षेत्र के आंदोलनकारियों ने दावा किया कि उन्हें विभिन्न स्रोतों से यह जानकारी प्राप्त हुई है कि खटीमा में राज्य आंदोलनकारी के रूप में चिन्हित किए गए अनेक लोगों के संबंध में गंभीर आपत्तियां सामने आ रही हैं। आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में आरोप लगाया कि चिन्हीकरण की सूची में ऐसे लोगों के नाम भी शामिल हैं जो कथित रूप से आंदोलन के समय नाबालिग थे, कुछ ऐसे लोग भी बताए गए हैं जिनका संबंध रक्षा ईकाई (उत्तराखंड आंदोलन विरोधी संगठन) से रहा है, जबकि कुछ ऐसे व्यक्तियों के नाम भी होने का आरोप लगाया गया है जो राज्य गठन के बाद वर्ष 2000 के पश्चात खटीमा में आकर बसे। ज्ञापन में इन सभी दावों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा गया कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का मामला नहीं होगा, बल्कि उन वास्तविक आंदोलनकारियों के साथ भी अन्याय होगा जिन्होंने उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। आंदोलनकारियों ने कहा कि सरकार को इस पूरे प्रकरण को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए तथ्यों की गहन जांच करानी चाहिए ताकि राज्य आंदोलनकारी सम्मान की गरिमा और विश्वसनीयता बनी रह सके।
आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में काशीपुर क्षेत्र की उपेक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उनका कहना है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान काशीपुर क्षेत्र में लगातार छह वर्षों तक व्यापक आंदोलन चला था और बड़ी संख्या में लोगों ने विभिन्न स्तरों पर सक्रिय भागीदारी निभाई थी। ज्ञापन में कहा गया कि आंदोलन के दौरान धरने, प्रदर्शन, जनसभाएं और विभिन्न लोकतांत्रिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें अनेक लोगों ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि काशीपुर तहसील स्तर पर उनका चिन्हीकरण पहले ही किया जा चुका है, इसके बावजूद अंतिम स्तर पर उनकी फाइलों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चिन्हीकरण समिति द्वारा उनके मामलों की लगातार उपेक्षा की जा रही है, जिसके कारण वर्षों से वास्तविक आंदोलनकारी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ज्ञापन में कहा गया कि यदि पात्र लोगों को उनका अधिकार समय पर नहीं मिलेगा और दूसरी ओर पात्रता पर सवाल उठने वाले लोगों को सुविधाएं मिलती रहेंगी, तो इससे राज्य आंदोलनकारियों के बीच असंतोष और अधिक बढ़ेगा।
ज्ञापन में शासन से मांग की गई कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा जिन मामलों में किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका है, उनकी निष्पक्ष पड़ताल कर सत्य स्थिति सार्वजनिक की जाए। आंदोलनकारियों ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को नियमों के विपरीत राज्य आंदोलनकारी घोषित किया गया है तो ऐसे मामलों की समीक्षा कर आवश्यक निर्णय लिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि काशीपुर क्षेत्र के उन आंदोलनकारियों के मामलों का भी शीघ्र निस्तारण किया जाए, जिनका चिन्हीकरण वर्षों पहले हो चुका है लेकिन आज तक उन्हें राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं मिल सका। ज्ञापन में कहा गया कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि हजारों लोगों के त्याग, समर्पण और लंबे जनआंदोलन का परिणाम था। इसलिए इस सम्मान से जुड़ी प्रत्येक प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता, निष्पक्षता और निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।
ज्ञापन के अंत में आंदोलनकारियों ने शासन को स्पष्ट चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि यदि उनकी न्यायोचित मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हुई तो उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। आंदोलनकारियों ने कहा कि ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर उसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं, बल्कि वास्तविक राज्य आंदोलनकारियों को न्याय दिलाना और राज्य आंदोलनकारी सम्मान की गरिमा को बनाए रखना है। आंदोलनकारियों ने सरकार से अपेक्षा जताई कि वह इस संवेदनशील विषय को गंभीरता से लेते हुए सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच कराएगी तथा पात्र और अपात्र के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करेगी। ज्ञापन में कहा गया कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े लोगों की भावनाएं इस विषय से जुड़ी हुई हैं और किसी भी प्रकार की लापरवाही भविष्य में बड़े विवाद का कारण बन सकती है। समाचार लिखे जाने तक इस ज्ञापन में लगाए गए आरोपों पर शासन या संबंधित विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
गृह सचिव के नाम प्रेषित इस ज्ञापन को उपजिलाधिकारी काशीपुर के माध्यम से सौंपने के दौरान राज्य निर्माण सक्रिय आन्दोलनकारी समिति उत्तराखंड के अनेक सदस्य मौजूद रहे। ज्ञापन सौंपने वालों में नीरज ठाकुर, विनय कुमार विश्नोई, प्रदीप कुमार, अनुराग सारस्वत, रामसिंह सैनी, वीरेन्द्र, एडवोकेट उमेश जोशी, एडवोकेट विवेक मिश्रा, सुरेन्द्र गौड, मो रिजावन, मीनू लता गुप्ता, भूपेंद्र सहित बड़ी संख्या में राज्य निर्माण आंदोलनकारी उपस्थित रहे। आंदोलनकारियों ने एक स्वर में कहा कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के वास्तविक प्रतिभागियों को उनका सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए तथा यदि कहीं भी चिन्हीकरण प्रक्रिया को लेकर किसी प्रकार का विवाद या संदेह है तो उसकी पारदर्शी जांच कर सच्चाई जनता के सामने लाई जानी चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि शासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष कार्रवाई करेगा और वास्तविक आंदोलनकारियों के साथ न्याय सुनिश्चित करेगा।





