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उत्तराखंड के डिप्लोमा इंजीनियरों कि महाक्रांति 18वें दिन भी जारी

प्रदेशभर में तकनीकी तंत्र ठप होने की कगार पर है, जहां हजारों डिप्लोमा इंजीनियर अपनी 27 सूत्रीय मांगों को लेकर सड़कों पर डटे हैं और शासन की चुप्पी अब बड़े प्रशासनिक संकट को जन्म दे रही है।

काशीपुर। उत्तराखंड के विकास की धुरी माने जाने वाले तकनीकी तंत्र की नींव आज बुरी तरह से हिल उठी है क्योंकि प्रदेश के डिप्लोमा इंजीनियरों ने अपनी जायज मांगों को लेकर शासन के विरुद्ध एक निर्णायक युद्ध का बिगुल फूंक दिया है। काशीपुर जनपद उधम सिंह नगर की धरती से उठी यह विरोध की ज्वाला अब पूरे प्रदेश के सरकारी महकमों को अपनी चपेट में ले चुकी है, जहाँ उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ के बैनर तले हजारों अभियंता अनिश्चितकालीन हड़ताल पर डटे हुए हैं। आज इस आंदोलन के 18वें दिन सिंचाई विभाग काशीपुर के परिसर में महासंघ के सदस्यों ने प्रदेशव्यापी कार्य बहिष्कार को और अधिक तीव्र करते हुए शासन को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी 27 सूत्रीय समस्याओं का तत्काल समाधान नहीं किया गया, तो प्रदेश में चल रहे तमाम विकास कार्य पूरी तरह से ठप्प हो जाएंगे। इस आंदोलन की अध्यक्षता ईं० शेर मोहम्मद द्वारा की गई, जबकि मंच का कुशल संचालन ईं० भूपेन्द्र कुमार रवि ने किया, जिन्होंने अपने ओजस्वी संबोधन से अभियंताओं में नया जोश भर दिया। हड़ताल के इस 18वें पड़ाव ने शासन की नींद उड़ा दी है, क्योंकि तकनीकी विशेषज्ञों की इस नाराजगी का सीधा असर राज्य की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और आम जनमानस की सुविधाओं पर पड़ना शुरू हो गया है।

हड़ताल के 18वें दिन की गूंज केवल काशीपुर तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसका प्रभाव गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के समस्त 32 जनपदों और शाखाओं में समान रूप से देखने को मिल रहा है, जहाँ महासंघ के सदस्य अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। शाखा अध्यक्ष ईं० राजेश भट्ट ने मीडिया को अवगत कराते हुए बताया कि यह आंदोलन अचानक नहीं हुआ है, बल्कि शासन स्तर पर लंबे समय से लंबित उन 27 जायज मांगों की अनदेखी का परिणाम है, जिसके लिए महासंघ ने प्रथम और द्वितीय चरण के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए थे। बावजूद इसके, शासन की उदासीनता और संवादहीनता ने अभियंताओं को अनिश्चितकालीन हड़ताल जैसा कठोर निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया है, जिससे आज समूचे इंजीनियरिंग महकमे में भारी रोष व्याप्त है। राजेश भट्ट ने जोर देकर कहा कि जब तक शासन स्तर से मांगों पर ठोस लिखित समझौता नहीं होता और शासनादेश जारी नहीं किए जाते, तक तक महासंघ का कोई भी सदस्य काम पर वापस नहीं लौटेगा, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही लंबी लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े। अभियंताओं का यह अडिग संकल्प शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

महासंघ की प्रमुख मांगों के पिटारे में सबसे ज्वलंत मुद्दा कनिष्ठ अभियंताओं के वेतन विसंगति का है, जो पिछले कई वर्षों से शासन की फाइलों में धूल फांक रहा है। डिप्लोमा इंजीनियरों की मांग है कि विभागों में कार्यरत कनिष्ठ अभियंताओं को प्रारंभिक ग्रेड वेतन 4600 का लाभ दिनांक 01.01.2006 से नोशनली अनुमन्य किया जाए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके और उन्हें उनके परिश्रम का उचित मूल्य मिल सके। इसके साथ ही, अभियंताओं ने पूर्व की भांति 10, 16 और 26 वर्ष की सेवा अवधि पर एसीपी (ACP) लाभों को बहाल करने की मांग की है, जो उनके करियर की प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है। 01 जनवरी 2014 के पश्चात विभागों में नियुक्त हुए कनिष्ठ अभियंताओं के लिए भी प्रथम एमएसीपी (MACP) के रूप में 10 वर्षों की सेवा पूर्ण होने पर पूर्व की भांति ग्रेड-पे 5400 (Level-10) दिए जाने की मांग प्रमुखता से उठाई गई है। इन वित्तीय मांगों को लेकर अभियंताओं का तर्क है कि जब कार्य का बोझ और जिम्मेदारी लगातार बढ़ रही है, तो उनके वेतनमान में कटौती करना या उन्हें पदोन्नति के लाभों से वंचित रखना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अनैतिक है।

पेंशन और भविष्य की सुरक्षा का मुद्दा भी इस आंदोलन के केंद्र में है, जहाँ अभियंता पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रदेश के अभियंताओं के लिए 01 अक्टूबर 2005 से लागू की गई अंशदायी पेंशन योजना (NPS) और अब 01 अप्रैल 2025 से लागू होने वाली एकीकृत पेंशन योजना (UPS) के स्थान पर पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू करने की मांग ने आंदोलन को एक नया आयाम दे दिया है। इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड पेयजल निगम और उत्तराखंड जल संस्थान के राजकीयकरण एवं एकीकरण की मांग भी वर्षों से लंबित है, जिसे लेकर महासंघ ने इस बार कड़ा रुख अपनाया है। आवास विभाग में नवनियुक्त डिप्लोमा इंजीनियर्स को भी अंशदायी योजना का लाभ देने और आवास विभाग में आईएफएमएस (IFMS) पोर्टल तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है, ताकि पारदर्शी कार्यप्रणाली और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित किया जा सके। अभियंताओं का मानना है कि बुढ़ापे की लाठी यानी पेंशन के हक को छीनकर सरकार उनके साथ छल कर रही है, जिसे अब और अधिक सहन नहीं किया जाएगा।

पदोन्नति और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर भी डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ ने शासन के समक्ष अपनी मांगों की स्पष्ट सूची रखी है, जिसमें सहायक अभियंता के उच्चतर पदों पर पदोन्नति हेतु समान्तर गैलरी के सृजन की मांग की गई है। विभिन्न इंजीनियरिंग विभागों में लंबे समय से प्रभारी सहायक अभियंता के रूप में कार्यरत कनिष्ठ अभियंताओं को सेवानिवृत्ति से पूर्व अधिसंख्य पदों के सापेक्ष ‘वन टाइम’ पदोन्नति का लाभ देने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है, ताकि अनुभवी अभियंताओं को उनके सम्मान का हक मिल सके। इसके साथ ही, विभिन्न विभागों में कार्यरत सहायक अभियंताओं के वित्तीय अधिकार बढ़ाने की मांग भी की गई है, ताकि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाई जा सके और प्रशासनिक विलंब को कम किया जा सके। इन मांगों के माध्यम से महासंघ ने विभाग की कार्यक्षमता और अभियंताओं के स्वाभिमान, दोनों को सुरक्षित करने का प्रयास किया है। ईं० शेर मोहम्मद और ईं० भूपेन्द्र कुमार रवि ने संयुक्त रूप से कहा कि पदोन्नति के अवसरों की कमी के कारण कनिष्ठ अभियंताओं में हताशा व्याप्त है, जिसका समाधान विभाग के हित में अनिवार्य है।

आंदोलन के अंत में शाखा अध्यक्ष, काशीपुर द्वारा सभी उपस्थित सदस्यों से आह्वान किया गया कि वे अपनी एकजुटता को और अधिक सुदृढ़ बनाएं और किसी भी बहकावे में आए बिना आंदोलन को सफल बनाने के लिए सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें। उन्होंने शासन को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि आगामी चरणों में उनकी मांगों पर संज्ञान नहीं लिया गया, तो हड़ताल और कार्य बहिष्कार का यह स्वरूप और भी उग्र होगा, जिससे जनपद और पूरे प्रदेश में चल रहे समस्त विकास कार्य पूर्णतः प्रभावित होंगे। इस चेतावनी ने प्रशासन के गलियारों में खलबली मचा दी है, क्योंकि निर्माण कार्यों के रुकने से न केवल सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा, बल्कि प्रदेश की प्रगति की रफ्तार भी थम जाएगी। ईं० राजेश भट्ट ने अपने समापन संबोधन में कहा कि हम निर्माण करने वाले लोग हैं, विनाश नहीं चाहते, लेकिन जब आत्मसम्मान और हक की बात आएगी, तो हम पीछे हटने वाले नहीं हैं। अब गेंद शासन के पाले में है कि वह वार्ता के माध्यम से इस गतिरोध को समाप्त करता है या फिर प्रदेश को एक बड़े तकनीकी संकट की ओर धकेलता है। आगामी दिनों में यह आंदोलन उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाला है।

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