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कांग्रेस में मची भयंकर रार और अपनों की घोर उपेक्षा ने बढ़ाया सियासी पारे का तापमान

महानगर जिला अध्यक्ष समेत तमाम दिग्गजों को दरकिनार कर चलाई जा रही समांतर कांग्रेस ने सुलगाया बगावत का बड़ा ज्वालामुखी, भाजपाई मंत्री की चाटुकारिता और अपनों के अपमान से वफादार कार्यकर्ताओं में फैला जबरदस्त जनाक्रोश।

काशीपुर। महानगर कि राजनीति में इन दिनों उबाल चरम पर है, जहाँ पुरानी वफादारियों और नई गुटबाजी के बीच कांग्रेस की अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सड़कों पर तमाशा बन गई है। हाल ही में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम ने शहर के सियासी गलियारों में उस समय खलबली मचा दी, जब महानगर जिला कांग्रेस कमेटी के कद्दावर स्तंभों और वरिष्ठ पदाधिकारियों को हाशिए पर धकेलते हुए उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इस उपेक्षा की फेहरिस्त में महानगर जिला अध्यक्ष अलका पाल, मनोज जोशी, उमेश जोशी, ब्रह्मपाल, सुभाष पाल, हरीश कुमार सिंह, सुरेश शर्मा, टीका सिंह सैनी, गोपाल सैनी, सुशील भटनागर, अनुपम शर्मा, मुशर्रफ हुसैन, जितेंद्र सरस्वती, सरदार इंदर सिंह, इंदर सेठी, सुशील गुड़िया, राजेश शर्मा, इकबाल आदिब, प्रदीप जोशी और शिवम शर्मा जैसे प्रमुख नामों को शामिल न करना किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दिग्गजों की अनुपस्थिति केवल एक भूल नहीं, बल्कि काशीपुर कांग्रेस के भीतर पनप रही एक समानांतर सत्ता का स्पष्ट प्रमाण है, जो पार्टी की जड़ों को खोखला करने पर उतारू है।

पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की बात करें तो महानगर जिला कांग्रेस कमेटी की हैसियत बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसके क्षेत्राधिकार में चारों ब्लॉक अध्यक्ष आते हैं और महानगर अध्यक्ष को पूरी विधानसभा का नेतृत्व करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के आलाकमान ने स्पष्ट रूप से महानगर अध्यक्ष को जिला इकाई का दर्जा प्रदान किया है, ताकि संगठन सुचारू रूप से कार्य कर सके, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में काशीपुर की धरती पर एक अजीबोगरीब मंजर दिखाई दे रहा है। यहाँ आधिकारिक संगठन को दरकिनार कर कुछ चुनिंदा लोग अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक ‘समानांतर कांग्रेस’ चला रहे हैं, जो सीधे तौर पर हाई कमान के आदेशों की अवहेलना है। आधिकारिक कार्यक्रम में महानगर जिला कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को आमंत्रित न करना न केवल उनका व्यक्तिगत अपमान है, बल्कि यह उस सांगठनिक मर्यादा का भी उल्लंघन है जिसके दम पर कांग्रेस दशकों से इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए थी।

एक तरफ जहाँ कांग्रेस अपने अपनों को अपनों से ही दूर करने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक मजबूती और उनके कार्यकर्ताओं का सम्मान शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में जब भाजपा के एक साधारण कार्यकर्ता को राज्य मंत्री के प्रतिष्ठित पद से नवाजा गया, तो काशीपुर की राजनीति में एक अलग ही नजारा देखने को मिला, जहाँ वही लोग जो खुद को कांग्रेसी कहते हैं और समानांतर गुट चलाते हैं, उनमें स्वागत करने की एक अंधी होड़ मच गई। यह दृश्य जनता के लिए काफी चौंकाने वाला था क्योंकि जो नेता कांग्रेस की विचारधारा का दम भरते हैं, वे विपक्षी दल के नेता के सम्मान में बिछे जा रहे थे, जबकि अपनी ही पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों और जनता से जुड़े मुद्दों पर वे हमेशा नदारद रहते हैं। इस घटनाक्रम ने उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है जो दिन-रात पार्टी के झंडे को बुलंद करने के लिए पसीना बहाते हैं।

विडंबना यह है कि जब भी जनता की समस्याओं, महंगाई, बेरोजगारी या स्थानीय मुद्दों पर महानगर जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा आंदोलन या विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, तब ये तथाकथित प्रभावशाली कांग्रेसी नेता दूरी बनाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इन नेताओं की अनुपस्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या इनका जुड़ाव कांग्रेस की विचारधारा से है या फिर यह केवल अपनी सुविधा की राजनीति कर रहे हैं। जनता के बीच यह संदेश जोर-शोर से जा रहा है कि एक तरफ जहाँ आधिकारिक महानगर कमेटी संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ये श्समानांतर कांग्रेसीश् केवल उत्सवों और भाजपा नेताओं की चाटुकारिता में ही अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जो गुट अपनी ही पार्टी के जिलाध्यक्ष और ब्लॉक अध्यक्षों को साथ लेकर नहीं चल सकता, वह अनुशासित भाजपा की चुनावी मशीनरी का मुकाबला आखिर कैसे करेगा।

शहर के प्रबुद्ध नागरिक और कांग्रेस की विचारधारा से गहरा ताल्लुक रखने वाले पुराने कार्यकर्ता आज बेहद आहत और क्रोधित हैं, वे खुलेआम यह पूछ रहे हैं कि आखिर यह कैसी राजनीति है जहाँ अपनों को काटा जा रहा है और बेगानों को पूजा जा रहा है। कांग्रेस के निष्ठावान खेमे में इस बात को लेकर भारी रोष है कि जब अलका पाल, मनोज जोशी, उमेश जोशी और ब्रह्मपाल जैसे समर्पित चेहरों को ही किनारे कर दिया जाएगा, तो पार्टी की एकजुटता का क्या होगा। सुभाष पाल, हरीश कुमार सिंह, सुरेश शर्मा, टीका सिंह सैनी और गोपाल सैनी जैसे जमीन से जुड़े नेताओं को न बुलाकर आयोजनकर्ताओं ने यह साफ कर दिया है कि उन्हें पार्टी की मजबूती से ज्यादा अपने व्यक्तिगत प्रभाव को दिखाने में दिलचस्पी है। सुशील भटनागर, अनुपम शर्मा, मुशर्रफ हुसैन, जितेंद्र सरस्वती, सरदार इंदर सिंह, पदकंत सेठी, सुशील गुड़िया, राजेश शर्मा, इकबाल आदिब, प्रदीप जोशी और शिवम शर्मा के बिना किसी भी कांग्रेसी कार्यक्रम की कल्पना करना ही बेमानी है, लेकिन यहाँ तो गुटबाजी का जहर रगों में इस कदर भर चुका है कि संगठन की मर्यादा को सरेआम तार-तार कर दिया गया।

काशीपुर की गलियों में अब यही चर्चा आम है कि क्या कांग्रेस का आलाकमान इस अराजकता पर संज्ञान लेगा या फिर इसी तरह समानांतर सत्ता चलाने वालों को खुली छूट मिलती रहेगी। लोग कह रहे हैं कि अगर यही हाल रहा तो आगामी चुनावों में कांग्रेस को भाजपा से लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि उसके अपने ही लोग उसे भीतर से खत्म करने के लिए काफी हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं को मिलने वाले सम्मान और कांग्रेस में होने वाली इस खींचतान ने आम मतदाता के मन में भी संशय पैदा कर दिया है। यह गंभीर चिंतन का विषय है कि जो नेता जनहित के मुद्दों पर महानगर जिला कांग्रेस कमेटी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में शर्म महसूस करते हैं, वे आखिर किस हैसियत से खुद को कांग्रेस का भविष्य बताते हैं। काशीपुर की जनता अब इन दोहरे मापदंडों को समझ चुकी है और आने वाले समय में इसका जवाब मिलना तय माना जा रहा है, क्योंकि विचारधारा की लड़ाई वफादारी से लड़ी जाती है, चालाकी से नहीं।

यह कड़वा सच सबके सामने है कि काशीपुर कांग्रेस आज दो फाड़ हो चुकी है, जहाँ एक तरफ नियम-कायदों से चलने वाली आधिकारिक कमेटी है और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो केवल अवसरवादिता की राजनीति कर रहे हैं। अलका पाल और उनके सहयोगियों की अनदेखी करके आयोजनकर्ताओं ने आत्मघाती कदम उठाया है, जिसने भाजपा को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा थमा दिया है। यदि समय रहते संगठन के भीतर की इस श्समानांतर सरकारश् पर नकेल नहीं कसी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस का अस्तित्व यहाँ केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगा। सच्चे कांग्रेसियों का मानना है कि पार्टी के झंडे के नीचे सबको समाहित करने की शक्ति होनी चाहिए, न कि किसी को बाहर का रास्ता दिखाने की संकीर्ण मानसिकता। अब देखना होगा कि इस राजनीतिक बवंडर के बाद हाई कमान क्या कदम उठाता है और कैसे काशीपुर में कांग्रेस की बिखरी हुई कड़ियों को दोबारा जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

काशीपुर में कांग्रेस की वर्तमान दशा ‘एक घर, कई चूल्हे’ वाली हो चुकी है, जहाँ अनुशासन नाम की कोई चीज शेष नहीं रह गई है। अलका पाल, मनोज जोशी, उमेश जोशी, ब्रह्मपाल और सुभाष पाल जैसे जमीनी नेताओं की उपेक्षा पार्टी के पतन की कहानी खुद लिख रही है। यदि कांग्रेस हाईकमान ने तुरंत हस्तक्षेप कर इस ‘समानांतर कांग्रेस’ की दुकान को बंद नहीं कराया और आधिकारिक महानगर जिला कांग्रेस कमेटी को उसका उचित सम्मान नहीं दिलाया, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। काशीपुर की जनता के मन में यह सवाल गहरे तक बैठ गया है कि जो लोग खुद को नहीं संभाल पा रहे, वे शहर की समस्याओं का समाधान क्या करेंगे? भाजपा की बढ़ती ताकत और कांग्रेस का यह आंतरिक खोखलापन आने वाले चुनाव में पार्टी के लिए करारी शिकस्त का संदेश दे रहा है, जिसका जिम्मेदार केवल और केवल वह समानांतर गुट होगा जो निजी स्वार्थ के लिए संगठन की बलि दे रहा है।

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