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खूंखार शिकारियों का गढ़ बने उत्तराखंड के ये इलाके मची चीख-पुकार और दहशत के साये में जीने को मजबूर पहाड़

उत्तराखंड में खूनी संघर्ष के ये डरावने आंकड़े कर रहे हैं तस्दीक कि टाइगर और गुलदार की बढ़ती धमक से अब देवभूमि के गांव श्मशान में तब्दील होने लगे हैं—"सहर प्रजातंत्र" की यह विशेष रिपोर्ट।

रामनगर(सुनील कोठारी)।उत्तराखंड की देवभूमि के शांत पर्वतीय अंचलों में अब भय का साम्राज्य स्थापित होता जा रहा है और प्रकृति की गोद में बसे गांव किसी खौफनाक शिकारगाह में तब्दील होते जा रहे हैं। राज्य के मैदानी जिलों से लेकर सुदूर पहाड़ी कस्बों और वीरान गांवों तक, इंसानों पर घात लगाकर जानलेवा हमला करने वाले खूंखार शिकारियों की पैठ अब एक भयावह हकीकत बन चुकी है। विशेष रूप से राज्य के पर्वतीय जनपदों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई है, जहां पलायन के कारण खाली पड़े खंडहरनुमा मकान और सुनसान गलियां इन हिंसक वन्यजीवों के लिए सुरक्षित शरणस्थली और शिकार का केंद्र बन गए हैं। खंडहरों की ओट में छिपे ये शिकारी जीव कब किस राहगीर या ग्रामीण पर टूट पड़ें, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन हो गया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि सूरज ढलते ही पहाड़ों के आंगन में सन्नाटा पसर जाता है और लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं, क्योंकि बाहर अंधेरे में मौत का साया मंडरा रहा है।

पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थिति और मानव बस्तियों के उजड़ने के कारण जंगली जानवरों ने अब इंसानी इलाकों को अपना नया ठिकाना बना लिया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे आंकड़े इस बात की चीख-चीख कर तस्दीक करते हैं कि टाइगर और गुलदार जैसे शिकारी जीवों ने सुनसान इलाकों और वीरान पड़े घरों को खुद को छिपाने और घात लगाकर हमला करने के लिए ‘मुफीद’ मान लिया है। वन विभाग के नवीनतम आंकड़ों ने राज्य में गहराते इस संकट पर मुहर लगा दी है, जिससे ग्रामीणों के बीच दहशत का माहौल चरम पर है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब इन हिंसक पशुओं का डर केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामीण जीवन की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है, जहां खौफ के कारण लोग शाम के वक्त घर से बाहर कदम रखने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते हैं।

वर्ष 2026 के ताजा और डरावने आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल अब तक वन्यजीवों के घातक हमलों में कुल 20 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जो शासन और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। इन कुल मौतों में से 18 शिकार अकेले दो सबसे खतरनाक शिकारी जीवों यानी टाइगर और गुलदार के हमलों का परिणाम हैं, जो यह दर्शाता है कि इंसानी बस्तियों में इनका दखल किस कदर बढ़ गया है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि गुलदार के हमलों में अब तक आठ मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा चुकी हैं, जबकि टाइगर के हमलों ने 10 लोगों को अपना निवाला बनाया है। ये संख्याएं महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की तबाही की दास्तां हैं जिन्होंने वन्यजीव संघर्ष की इस भीषण आग में अपनों को खो दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि उत्तराखंड के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में इन शिकारी जानवरों का दबदबा बढ़ता जा रहा है और सुरक्षा के तमाम दावे जमीन पर विफल साबित हो रहे हैं।

यदि हम पिछले वर्ष यानी 2025 के तुलनात्मक आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो स्थिति और भी अधिक भयावह और विचलित करने वाली नजर आती है, क्योंकि उस दौरान कुल 68 लोगों ने वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गंवाई थी। साल 2025 में हुए इन जानलेवा हमलों में अकेले गुलदार ने 18 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था, जबकि टाइगर के हमलों में 12 लोगों की जान गई थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि कुल 68 मौतों में से लगभग आधे यानी 30 मामले सिर्फ इन दो विशिष्ट शिकारी प्रजातियों के कारण हुए थे, जो राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करते हैं। इन ऐतिहासिक आंकड़ों की निरंतरता यह सिद्ध करती है कि उत्तराखंड में मानव-वन्यजीवों के बीच का टकराव कम होने के बजाय और अधिक हिंसक होता जा रहा है, जिसमें टाइगर और गुलदार सबसे बड़ी चुनौती और मौत के पर्याय बनकर उभरे हैं।

पौड़ी गढ़वाल जिला वर्तमान में इस संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र और संवेदनशील इलाका बनकर उभरा है, जहां गुलदार की सक्रियता ने पूरे तंत्र को हिलाकर रख दिया है। वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, गुलदार के हमलों में हुई कुल आठ मौतों में से तीन अकेली मौतें सिर्फ पौड़ी जनपद में दर्ज की गई हैं, जो इस जिले को सबसे अधिक असुरक्षित घोषित करती हैं। पौड़ी की विषम भौगोलिक परिस्थितियां और वहां का निर्जन क्षेत्र गुलदारों के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान कर रहा है, जिसके कारण वहां की जनता निरंतर खतरे के साये में जी रही है। साल 2025 में भी गुलदार के हमलों का सबसे विनाशकारी प्रभाव इसी जनपद में देखा गया था, जहां 18 मौतों में से पांच मौतें पौड़ी में हुई थीं, जो यह स्पष्ट करता है कि यह क्षेत्र लंबे समय से गुलदार के आतंक का एपिक सेंटर बना हुआ है।

टाइगर के हमलों की संवेदनशीलता की बात करें तो कुमाऊं क्षेत्र के कुछ विशिष्ट हिस्से अब बाघों के सबसे खतरनाक शिकारगाहों में तब्दील हो चुके हैं। साल 2026 में टाइगर के हमलों में हुई 10 मौतों का विश्लेषण करें तो इनमें से तीन मौतें रामनगर डिवीजन में दर्ज की गई हैं, जबकि नैनीताल और तराई ईस्ट डिवीजन में भी दो-दो लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। यह आंकड़े यह साफ कर देते हैं कि रामनगर और नैनीताल जैसे पर्यटन हब के आसपास के जंगल अब बाघों के कारण बेहद असुरक्षित हो गए हैं। पिछले साल 2025 में भी यही रुझान देखने को मिला था, जब कुल 12 मौतों में से सर्वाधिक तीन मौतें तराई ईस्ट क्षेत्र में हुई थीं और रामनगर तथा देहरादून डिवीजन में भी दो-दो मौतें दर्ज की गई थीं। इससे यह प्रमाणित होता है कि तराई और घने जंगलों से लगे मैदानी इलाके बाघों के हमलों के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं।

विगत वर्षों के आंकड़ों की गहराई से पड़ताल करने पर यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि रुद्रप्रयाग, चंपावत और नैनीताल जैसे जिलों में भी गुलदार का कहर कम नहीं है। साल 2025 में रुद्रप्रयाग में चार लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई थी, जबकि नैनीताल में तीन और चंपावत डिवीजन में दो लोगों ने इस हिंसक संघर्ष में अपनी जान गंवाई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि वन्यजीवों का यह आतंक किसी एक जिले तक सीमित न रहकर पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी भूगोल में फैल चुका है। तराई के मैदानों से लेकर केदारघाटी के पहाड़ों तक, टाइगर और गुलदार का यह खूनी खेल अनवरत जारी है, जिससे न केवल जनहानि हो रही है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका गहराती जा रही है।

कुल हमलों की संख्या पर नजर डालें तो साल 2026 में अब तक रिकॉर्ड 117 हमले दर्ज किए जा चुके हैं, जो शासन की चिंता को कई गुना बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं। इन 117 हमलों के परिणामस्वरूप 20 लोगों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि 97 लोग गंभीर रूप से घायल होकर अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं या अपंगता का शिकार हो चुके हैं। मृत्यु के मामलों में नैनीताल, रामनगर और पौड़ी डिवीजन संयुक्त रूप से सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं, जहां प्रत्येक डिवीजन में तीन-तीन मौतें दर्ज की गईं। घायलों की संख्या के मामले में भी पौड़ी जिला शीर्ष पर है, जहां कुल 19 लोग इन हमलों में जख्मी हुए हैं। ये संख्याएं इस बात का प्रमाण हैं कि पौड़ी और नैनीताल जैसे जिले अब मानव-वन्यजीव संघर्ष की रणभूमि बन चुके हैं, जहां हर दिन एक नया संघर्ष देखने को मिल रहा है।

साल 2025 का लेखा-जोखा भी प्रशासनिक विफलता की कहानी बयां करता है, क्योंकि उस दौरान वन्यजीव हमलों में कुल 494 लोग घायल हुए थे, जो एक चौंकाने वाली संख्या है। इसमें अकेले पौड़ी डिवीजन से 111 लोग घायल हुए थे, जो पूरे राज्य में घायलों की सर्वाधिक संख्या थी और यह जिला मानव-वन्यजीव संघर्ष से सबसे बुरी तरह प्रभावित घोषित किया गया था। तराई ईस्ट, तराई सेंटर और देहरादून जैसे क्षेत्रों में भी क्रमशः आठ, सात और छह मौतें दर्ज की गई थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वन्यजीवों का यह जानलेवा हमला पूरे प्रदेश के लिए एक व्यापक संकट बन चुका है। पौड़ी में साल 2025 में छह और 2026 में अब तक तीन लोगों की गुलदार के हाथों हुई मौत ने स्थानीय निवासियों के धैर्य का बांध तोड़ दिया है।

पहाड़ी जनपदों में रहने वाले ग्रामीणों की व्यथा अत्यंत मर्मांतक है, क्योंकि उनके लिए ये वन्य जीव अब केवल सुरक्षा का खतरा ही नहीं, बल्कि पलायन का एक बड़ा कारण भी बन गए हैं। सेना से सेवामुक्त होने के बाद अपने पुश्तैनी गांव में शांतिपूर्ण जीवन जीने और खेती-बाड़ी करने की उम्मीद लेकर लौटे पूर्व सैनिक कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में हिंसक वन्यजीवों की ऐसी भयावह स्थिति पहले कभी नहीं देखी थी। उनका आरोप है कि शासन और वन विभाग केवल शहरी चमक-धमक और कागजी कार्यवाही तक सीमित है, जबकि सुदूर गांवों में रहने वाले लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। अन्य स्थानीय निवासी भी दुखी मन से कहते हैं कि वन्यजीवों के डर से खेती पूरी तरह चौपट हो गई है और अब लोग अपनी जान बचाने के लिए गांव खाली करने को मजबूर हैं, क्योंकि सुरक्षित भविष्य की कोई किरण नजर नहीं आती।

इस गंभीर स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने स्वीकार किया है कि पौड़ी जैसे कुछ विशिष्ट इलाके अब खूंखार वन्यजीवों के लिए ‘एपिक सेंटर’ बन चुके हैं, जो सरकार के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार इन अति-संवेदनशील क्षेत्रों के लिए एक विशेष टास्क फोर्स या विशेष दल गठित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है, जो इन शिकारी जीवों की गतिविधियों पर अंकुश लगा सके और जनता को सुरक्षा प्रदान कर सके। विशेषज्ञों का भी यही मत है कि केवल प्रतिक्रियात्मक कदम उठाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करना, जंगलों में उनके लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना और ग्रामीणों को बचाव के आधुनिक तरीकों के प्रति जागरूक करना अनिवार्य हो गया है। उत्तराखंड के अस्तित्व और वहां की आबादी को बचाने के लिए अब एक ठोस और सार्थक पहल की आवश्यकता है, ताकि देवभूमि के जंगलों में फिर से शांति लौट सके और इंसान व वन्यजीवों का सह-अस्तित्व सुरक्षित बना रहे।

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