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दहेज नहीं शिक्षा और आत्मनिर्भरता से सुरक्षित होगा बेटियों का भविष्य:उर्वशी दत्त बाली

समाज सेवा में सक्रिय उर्वशी दत्त बाली ने दहेज प्रथा और दिखावटी शादियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि बेटियों की असली विदाई संस्कार, आत्मविश्वास, आर्थिक सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से ही होनी चाहिए।

काशीपुर। सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर लगातार मुखर रहने वाली डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने एक बार फिर दहेज प्रथा और दिखावटी शादियों पर तीखा प्रहार करते हुए समाज को सोच बदलने का आईना दिखाया है। उनका स्पष्ट कहना है कि बेटियों की विदाई दहेज के बोझ से नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव पर होनी चाहिए। उर्वशी दत्त बाली मानती हैं कि आधुनिक युग में भी यदि बेटी की विदाई को धन, गहनों और खर्चीली शादियों से जोड़ा जा रहा है, तो यह समाज की सोच पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है। उनका कहना है कि दहेज न तो बेटी को सम्मान देता है और न ही उसका भविष्य सुरक्षित करता है, बल्कि कई बार यही दिखावा बाद में उसके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक बोझ बन जाता है। समाज को यह समझना होगा कि बेटी का वास्तविक सम्मान उसकी योग्यता, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से जुड़ा होता है, न कि विवाह में खर्च की गई रकम से।

अपने विचारों में उर्वशी दत्त बाली बार-बार इस बात पर ज़ोर देती हैं कि बेटियों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने का सबसे बड़ा साधन है। शिक्षित बेटी अपने अधिकारों को समझती है, अपने निर्णय स्वयं ले सकती है और विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ी रह सकती है। वे कहती हैं कि माता-पिता की ज़िम्मेदारी सिर्फ बेटी की शादी कर देना नहीं है, बल्कि उसे इस काबिल बनाना है कि वह किसी भी रिश्ते में सम्मान और बराबरी के साथ खड़ी हो सके। शिक्षा के साथ दिए गए अच्छे संस्कार ही उसे यह सिखाते हैं कि परिवार और समाज में कैसे संतुलन बनाकर जिया जाए। जब बेटी के पास ज्ञान, समझ और आत्मविश्वास होता है, तब वह किसी भी तरह के अन्याय या दबाव के आगे झुकती नहीं है।

उर्वशी दत्त बाली का यह भी कहना है कि बेटियों को ससुराल को डर या दबाव की जगह मानने के बजाय अपने जीवन के नए अध्याय के रूप में देखना सिखाया जाना चाहिए। वे कहती हैं कि विवाह का अर्थ एक घर से दूसरे घर में डर के साथ जाना नहीं, बल्कि एक परिवार से निकलकर एक और बड़े परिवार से जुड़ना है। बेटी को यह भावनात्मक शक्ति मिलनी चाहिए कि वह आत्मसम्मान के साथ नए रिश्ते निभा सके। उनका मानना है कि जब बेटी को यह विश्वास होता है कि उसके माता-पिता हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े हैं, तब वह ससुराल में भी आत्मविश्वास और संतुलन के साथ जीवन जी पाती है। डर, दबाव और असुरक्षा के साथ किया गया कोई भी रिश्ता लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता, जबकि समझदारी और आत्मसम्मान से निभाए गए रिश्ते ही मजबूत और टिकाऊ होते हैं।

दहेज और भव्य शादियों पर होने वाले भारी खर्च को लेकर भी उर्वशी दत्त बाली ने समाज को गंभीरता से सोचने की सलाह दी है। उनका कहना है कि माता-पिता यदि शादी में लाखों रुपये खर्च करने के बजाय उसी धन से बेटी के नाम संपत्ति या सुरक्षित निवेश करें, तो यह उसके लिए कहीं अधिक उपयोगी और सम्मानजनक होगा। घर, दुकान, ज़मीन या फिक्स्ड डिपॉज़िट जैसी आर्थिक सुरक्षा बेटी को किसी पर निर्भर नहीं रहने देती। ऐसी व्यवस्था न केवल उसकी आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करती है, बल्कि उसे आत्मबल और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने की ताक़त भी देती है। वे मानती हैं कि आर्थिक रूप से सशक्त बेटी अपने फैसले खुद ले सकती है और किसी भी रिश्ते में अपनी पहचान बनाए रख सकती है।

समाज में बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता पर भी उर्वशी दत्त बाली ने कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि बेटियां किसी भी समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती हैं। यदि उन्हें सही अवसर, शिक्षा और अधिकार दिए जाएं, तो वे परिवार ही नहीं, पूरे समाज को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। वे कहती हैं कि उपहारों और दिखावे से कहीं अधिक ज़रूरी है बेटियों को ज्ञान, अधिकार और आत्मनिर्भरता का रास्ता देना। दहेज जैसी कुप्रथा को समाप्त करने का यही सबसे प्रभावी तरीका है कि समाज बेटियों को बराबरी का दर्जा दे और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का पूरा अवसर प्रदान करे।

उर्वशी दत्त बाली का मानना है कि शिक्षित और आत्मनिर्भर बेटी ही सशक्त समाज की नींव रख सकती है। जब बेटी अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझती है, तब वह न केवल अपने जीवन को बेहतर बनाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। उन्होंने समाज से अपील की कि बेटियों की विदाई को दहेज की रस्म से मुक्त किया जाए और उन्हें शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा उपहार दिया जाए। उनका यह संदेश केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में वास्तविक बदलाव की दिशा में एक ठोस विचार है, जो यदि अपनाया जाए तो निश्चय ही बेटियां सुरक्षित, सम्मानित और आत्मविश्वास से भरा जीवन जी सकेंगी और समाज सच मायनों में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेगा।

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