- कुमाऊँ नगर निगमों में कानून बेबस पार्षद मौन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठप
- कुमाऊँ में शहरी लोकतंत्र सवालों के घेरे में नगर निगम नियमों से कोसों दूर
- कुमाऊँ के नगर निगमों में अधिनियम निष्क्रिय मेयर केंद्रित सत्ता हावी
- कुमाऊँ में नगर निगम बने शोपीस लोकतंत्र फाइलों में कैद जनता बेखबर
- कुमाऊँ नगर निगमों की बैठकें नदारद आरटीआई ने उजागर की लोकतंत्र की अनदेखी
- कुमाऊँ में शहरी स्वशासन बेपटरी कानून की अनदेखी से लोकतंत्र कमजोर
- कुमाऊँ के नगर निगमों में नियम ध्वस्त पार्षद हाशिये पर लोकतंत्र खतरे में
काशीपुर। कुमाऊँ अंचल के पाँचों नगर निगमकृकाशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी-काठगोदाम, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़कृइन दिनों शहरी लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा से भटके हुए दिखाई दे रहे हैं। नगर निगम अधिनियम में स्पष्ट रूप से निर्धारित प्रावधानों के बावजूद इन निकायों में न तो नियमित अंतराल पर बोर्ड बैठकें आयोजित की जा रही हैं और न ही निर्वाचित पार्षदों को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन का समुचित अवसर दिया जा रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक शिथिलता तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर जनता के प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जिस व्यवस्था में पार्षदों को विकास, बजट, जनसमस्याओं और नीतिगत मुद्दों पर चर्चा का मंच ही न मिले, वहां स्थानीय स्वशासन की कल्पना बेमानी प्रतीत होती है। लोकतंत्र की यह कमजोर तस्वीर किसी आरोप या राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार के तहत सामने आई आधिकारिक जानकारी से उजागर हुई है, जिसने कुमाऊँ के शहरी प्रशासन की वास्तविकता को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
यह गंभीर तथ्य सूचना अधिकार कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता नदीम उद्दीन द्वारा दायर आरटीआई आवेदन से सामने आया है। उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत 01 जनवरी 2025 से लेकर सूचना उपलब्ध कराने की तिथि तक नगर निगमों और नगर बोर्डों में आयोजित बैठकों की संख्या, तिथियां और उनके कार्यवृत्त मांगे थे। इस आरटीआई के जवाब में कुमाऊँ क्षेत्र के सभी नगर निगमों के लोक सूचना अधिकारियों ने अपने-अपने निगमों से संबंधित बैठक विवरण उपलब्ध कराए। इन दस्तावेज़ों के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि अधिकांश नगर निगमों में कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम बैठकों की शर्त पूरी ही नहीं की गई। कहीं बैठकों की संख्या बेहद कम रही, तो कहीं बैठकों का दावा तो किया गया लेकिन उनके कार्यवृत्त अधूरे या अनुपलब्ध पाए गए। इस तरह आरटीआई से प्राप्त आधिकारिक जवाबों ने नगर निगमों की कार्यप्रणाली की परतें खोल दीं और यह दिखा दिया कि कागज़ी प्रावधानों और जमीनी हकीकत के बीच कितनी गहरी खाई मौजूद है।
काशीपुर नगर निगम की स्थिति सबसे अधिक चौंकाने वाली मानी जा रही है। नगर निगम काशीपुर के लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक नगर आयुक्त द्वारा पत्रांक 945 दिनांक 22-11-2025 के माध्यम से दी गई जानकारी के अनुसार पूरे वर्ष 2025 में महज दो बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं। पहली बैठक 05 फरवरी 2025 को नगर प्रमुख दीपक बाली की अध्यक्षता में हुई, जिसमें कुल 40 पार्षदों की उपस्थिति दर्ज की गई और केवल तीन प्रस्ताव पारित किए गए। दूसरी बैठक 03 मार्च 2025 को आयोजित की गई, जिसमें 39 पार्षद मौजूद रहे और 24 प्रस्तावों पर मुहर लगी। इसके बाद वर्ष भर कोई भी बोर्ड बैठक नहीं बुलाई गई। नगर निगम अधिनियम के अनुसार नियमित बैठकों का आयोजन अनिवार्य है, ऐसे में पूरे साल महज दो बैठकें होना न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि यह दर्शाता है कि पार्षदों को विकास कार्यों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का अवसर ही नहीं दिया गया।
रुद्रपुर नगर निगम के मामले में स्थिति कुछ अलग होते हुए भी उतनी ही गंभीर नजर आती है। नगर निगम रुद्रपुर के लोक सूचना अधिकारी ने पत्रांक 779 दिनांक 04-12-2025 के माध्यम से बताया कि बोर्ड की कुल तीन बैठकें आयोजित की गईं, लेकिन आरटीआई के जवाब में केवल दो बैठकों के कार्यवृत्त ही उपलब्ध कराए गए। 07 फरवरी 2025 को मेयर विकास शर्मा की अध्यक्षता में हुई बैठक में विधायक शिव अरोरा, विधायक तिलक राज बेहड़ तथा 40 पार्षद मौजूद थे, जिसमें केवल एक प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद 18 फरवरी 2025 को आयोजित बैठक में मेयर, दोनों विधायक और 39 पार्षदों की उपस्थिति में एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया। तीसरी बैठक के संबंध में न तो उसका कार्यवृत्त दिया गया और न ही उसके एजेंडे या निर्णयों का कोई स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराया गया। यह स्थिति पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करती है।

हल्द्वानी-काठगोदाम नगर निगम की तस्वीर और भी चिंताजनक दिखाई देती है। यहां पूरे वर्ष 2025 में केवल एक ही बोर्ड बैठक आयोजित होने की जानकारी सामने आई है। नगर निगम हल्द्वानी-काठगोदाम के लोक सूचना अधिकारी द्वारा पत्रांक 1909 दिनांक 17-12-2025 से दी गई सूचना के अनुसार 26 मार्च 2025 को महापौर गजराज बिष्ट की अध्यक्षता में एकमात्र बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में 56 पार्षद उपस्थित रहे और 11 विशेष प्रस्ताव पारित किए गए। इसके बाद पूरे साल कोई भी बोर्ड बैठक नहीं हुई। इतने बड़े नगर निगम में वर्ष भर में केवल एक बैठक होना इस बात का संकेत है कि शहरी शासन की निर्णय प्रक्रिया लगभग ठप रही। पार्षदों के प्रश्न, सुझाव और जनता की समस्याएं औपचारिक रूप से सदन में रखी ही नहीं जा सकीं।
अल्मोड़ा नगर निगम में बैठकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही, लेकिन यहां भी कानून के प्रावधान पूरे नहीं हुए। नगर निगम अल्मोड़ा के लोक सूचना अधिकारी दीपक चन्द्र जोशी ने पत्रांक 39 दिनांक 03-01-2026 के माध्यम से वर्ष 2025 में आयोजित तीन बोर्ड बैठकों के कार्यवृत्त उपलब्ध कराए। 07 फरवरी 2025 को 40 पार्षदों की उपस्थिति में 44 प्रस्ताव पारित किए गए। इसके बाद 29 अप्रैल 2025 को 37 पार्षदों की मौजूदगी में 63 प्रस्तावों पर चर्चा और निर्णय हुआ। तीसरी बैठक 05 अगस्त 2025 को आयोजित हुई, जिसमें 36 पार्षद उपस्थित थे और 43 प्रस्ताव पारित किए गए। प्रस्तावों की संख्या भले ही अधिक रही हो, लेकिन नगर निगम अधिनियम में निर्धारित न्यूनतम छह बैठकों की शर्त यहां भी पूरी नहीं की गई, जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
पिथौरागढ़ नगर निगम की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर कही जा सकती है, फिर भी यह कानून की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। नगर निगम पिथौरागढ़ के लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक नगर आयुक्त ने पत्रांक 1259 दिनांक 29-11-2025 के माध्यम से पांच बोर्ड बैठकों के कार्यवृत्त उपलब्ध कराए। 06 फरवरी 2025 को 37 पार्षदों की उपस्थिति में पांच प्रस्ताव पारित हुए। 22 फरवरी 2025 को 36 पार्षदों की मौजूदगी में तीन प्रस्तावों पर निर्णय लिया गया। 10 मार्च 2025 को 38 पार्षदों के साथ 17 प्रस्ताव पारित किए गए। इसके बाद 21 अप्रैल 2025 को 34 पार्षदों की उपस्थिति में नौ प्रस्ताव और 03 सितम्बर 2025 को 30 सदस्यों की मौजूदगी में नौ प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इसके बावजूद आवश्यक छह बैठकों का नियम पूरा नहीं हो सका।
नदीम उद्दीन के अनुसार नगर निगम अधिनियम की कई महत्वपूर्ण धाराओं की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। अधिनियम की धारा 88 में स्पष्ट प्रावधान है कि वर्ष में कम से कम छह अधिवेशन अनिवार्य हैं और दो बैठकों के बीच दो माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। धारा 91 के तहत बैठक की सूचना कम से कम 96 घंटे पूर्व दी जानी चाहिए। धारा 92 बहुमत के आधार पर निर्णय की व्यवस्था सुनिश्चित करती है, जबकि धारा 98 पार्षदों को प्रश्न पूछने और चर्चा में भाग लेने का अधिकार देती है। कुमाऊँ के अधिकांश नगर निगमों में इन धाराओं का पालन न होना यह दर्शाता है कि स्थानीय लोकतंत्र केवल कागज़ों तक सीमित होकर रह गया है।
नगर निगमों में बैठकों का न होना केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि यह जनता और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों का सीधा हनन है। जब पार्षदों को नियमित रूप से बैठने, प्रश्न पूछने और नीतिगत निर्णयों में भागीदारी का अवसर नहीं मिलता, तो सत्ता कुछ गिने-चुने पदों तक सिमट जाती है। इससे मेयर-केंद्रित व्यवस्था मजबूत होती है और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया कमजोर पड़ती है। आरटीआई से सामने आए इन तथ्यों ने शासन और सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस अलोकतांत्रिक रवैये पर कोई ठोस कार्रवाई होगी या फिर कुमाऊँ के नगर निगम इसी तरह नियमों की अनदेखी करते रहेंगे। फिलहाल, उजागर हुआ यह सच कुमाऊँ के शहरी लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करता है।





