- वैज्ञानिक खेती से गन्ना उत्पादन बढ़ाने की पहल किसानों को मिला आधुनिक प्रशिक्षण
- गन्ना खेती में वैज्ञानिक बदलाव किसानों को मिला आधुनिक तकनीक का भरोसेमंद मार्गदर्शन
काशीपुर। क्षेत्र में गन्ना खेती को अधिक लाभकारी, वैज्ञानिक और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत गन्ना किसान संस्थान एवं प्रशिक्षण केंद्र काशीपुर द्वारा गन्ना विकास परिषद काशीपुर परिक्षेत्र के ग्राम बसई में एकदिवसीय कृषक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गन्ना कृषकों की सहभागिता देखने को मिली, जो इस बात का संकेत है कि किसान अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर उन्नत तकनीकों को अपनाने के प्रति जागरूक हो रहे हैं। गोष्ठी का उद्देश्य किसानों को गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और फसल को रोगों व कीटों से सुरक्षित रखने के लिए नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना रहा। खेत से जुड़े हर पहलू पर चर्चा करते हुए अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने किसानों को यह समझाने का प्रयास किया कि सही तकनीक, समयबद्ध तैयारी और वैज्ञानिक सलाह से गन्ना खेती को कहीं अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। इस आयोजन ने किसानों और विभाग के बीच संवाद को भी मजबूत किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गन्ना विभाग के प्रचार एवं जनसंपर्क अधिकारी श्री नीलेश कुमार ने आगामी बसंत कालीन गन्ना बुवाई को लेकर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने किसानों को बताया कि बसंत कालीन गन्ना बुवाई का समय अब नजदीक है, ऐसे में किसानों को अभी से अपने खेतों की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। नीलेश कुमार ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि गन्ने की खेती में बुवाई की गहराई और पौधों के बीच की दूरी का अत्यंत महत्व है। उन्होंने कहा कि यदि किसान गन्ने की बुवाई सही गहराई पर गुल खोलकर और निर्धारित दूरी का पालन करते हुए करेंगे, तो पौधों को फैलाव के लिए पर्याप्त स्थान मिलेगा, जिससे उनकी बढ़वार बेहतर होगी और अंततः उत्पादन में वृद्धि संभव होगी।
गोष्ठी के दौरान यह भी बताया गया कि खेत की अच्छी तैयारी गन्ने की सफल फसल की पहली शर्त है। किसानों को सलाह दी गई कि वे बुवाई से पहले भूमि की अच्छी तरह जुताई कर खेत को भुरभुरा बनाएं, ताकि बीज जमाव बेहतर हो सके। जिन किसानों को बसंत कालीन गन्ना की बुवाई करनी है, उन्हें उत्तम और प्रमाणित बीज का चयन करना चाहिए। श्री नीलेश कुमार ने कहा कि कमजोर या रोगग्रस्त बीज से बुवाई करने पर पूरी फसल प्रभावित हो सकती है, इसलिए बीज चयन में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे विभाग द्वारा सुझाई गई उन्नतशील प्रजातियों का ही प्रयोग करें और अस्वीकृत या पुरानी किस्मों से बचें।
कृषकों को फसल सुरक्षा के प्रति जागरूक करते हुए अधिकारियों ने कहा कि प्रत्येक गन्ना किसान को अपने खेत का नियमित निरीक्षण करना चाहिए। यदि खेत में किसी भी प्रकार की बीमारी या कीट के लक्षण दिखाई दें, तो उसका फोटो लेकर तुरंत गन्ना शोध केंद्र के वैज्ञानिकों को भेजें। इससे वैज्ञानिक फोन पर ही तत्काल सलाह देकर समस्या का समाधान सुझा सकते हैं। इस तरह समय रहते रोगों की पहचान और नियंत्रण संभव हो सकेगा, जिससे फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। गोष्ठी में यह भी स्पष्ट किया गया कि आधुनिक तकनीक के इस दौर में मोबाइल और डिजिटल साधनों का उपयोग कर किसान आसानी से विशेषज्ञों से जुड़ सकते हैं।

कार्यक्रम में नवीनतम तकनीक के आधार पर गन्ना खेती करने की आवश्यकता पर भी विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि अब समय आ गया है जब परंपरागत तरीकों के साथ-साथ वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त तकनीकों को अपनाया जाए। किसानों को अपनी भूमि की नियमित जांच करानी चाहिए, क्योंकि भूमि में लगभग 16 प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। भूमि परीक्षण कराने से यह स्पष्ट हो जाता है कि खेत में किन तत्वों की कमी है और किनकी अधिकता है। उसी के अनुसार उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करने से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि भूमि की सेहत भी लंबे समय तक बनी रहती है।
गोष्ठी का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों को गन्ने की उन्नत प्रजातियों, फसल में लगने वाली विभिन्न बीमारियों और उनके उपचार की जानकारी देना भी रहा। वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने बताया कि यदि किसान वैज्ञानिक विधि से खेती करें, तो प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। इस दौरान गन्ना विभाग की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी भी किसानों को दी गई, ताकि वे सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकें। किसानों को यह भी बताया गया कि विभाग समय-समय पर प्रशिक्षण, अनुदान और तकनीकी सहायता प्रदान करता है, जिसका सही उपयोग कर वे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं।
इस बैठक में गन्ना अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक अधिकारियों ने वर्तमान में उपलब्ध उन्नतशील प्रजातियों पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 15023, 13235 और 14201 जैसी प्रजातियां वर्तमान समय में बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं और किसानों को इन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी कि 0238 प्रजाति रेड रोड की चपेट में आ चुकी है, जिससे फसल को भारी नुकसान होने की आशंका रहती है। इसलिए कृषक बंधुओं से स्पष्ट रूप से आग्रह किया गया कि वे इस प्रजाति की बुवाई बिल्कुल न करें और इसका शीघ्र रिप्लेसमेंट करें, ताकि भविष्य में नुकसान से बचा जा सके।
कीट एवं रोग प्रबंधन के विषय में भी गोष्ठी के दौरान विस्तार से जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि समय पर उचित दवाओं का प्रयोग और सही कृषि क्रियाएं अपनाकर गन्ने की फसल को कीटों और रोगों से सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने किसानों को यह भी समझाया कि बिना आवश्यकता के दवाओं का अत्यधिक प्रयोग न केवल खर्च बढ़ाता है, बल्कि फसल और भूमि दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से रोग प्रबंधन अपनाने से लागत कम होती है और उपज की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। इस एकदिवसीय कृषक गोष्ठी में गन्ना अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक, गन्ना विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में प्रगतिशील गन्ना कृषक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में किसानों ने अधिकारियों और वैज्ञानिकों से सीधे सवाल पूछे और अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त किया। इस प्रकार की गोष्ठियां न केवल किसानों को नवीन जानकारी से जोड़ती हैं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और जागरूक बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।





