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महंत बनाम मुख्यमंत्री की जंग में हिंदुत्व, सत्ता और शंकराचार्य की चुनौती से घिरी योगी राजनीति

धर्म, सत्ता और विचारधारा की त्रिकोणीय लड़ाई में शंकराचार्य के सवालों से योगी आदित्यनाथ की भूमिका, संघ की चुप्पी और दिल्ली–लखनऊ के टकराव ने भारतीय राजनीति की जमीन को असहज कर दिया है।

उत्तराप्रदेश। भारत की राजनीति में इस समय जो सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है, वह केवल सत्ता का नहीं बल्कि पहचान, विचारधारा और नैतिकता का भी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर उठी बहस अब केवल प्रशासनिक या चुनावी दायरे में सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह सीधे धर्म और संविधान के टकराव की जमीन पर आ खड़ी हुई है। एक ओर योगी आदित्यनाथ स्वयं को गोरखनाथ मठ के महंत के रूप में स्थापित करते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने संविधान और धर्मनिरपेक्षता की शपथ ली है। यही द्वंद्व वह बिंदु है, जहां से शंकराचार्य की तीखी टिप्पणी ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य में भूचाल ला दिया है। शंकराचार्य ने जिस स्पष्टता के साथ यह सवाल खड़ा किया कि एक व्यक्ति एक साथ महंत और संवैधानिक पदाधिकारी कैसे हो सकता है, उसने न केवल योगी आदित्यनाथ की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाया बल्कि उस पूरी राजनीति को कटघरे में खड़ा कर दिया, जो धर्म के सहारे सत्ता तक पहुंचने की रणनीति पर वर्षों से काम कर रही थी।

दरअसल, शंकराचार्य की यह टिप्पणी किसी साधारण धार्मिक वक्तव्य के रूप में नहीं देखी जा रही, बल्कि इसे सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक नींव पर प्रहार माना जा रहा है। शंकराचार्य ने यह कहकर कि सत्ता के लिए धर्म का उपयोग किया गया, उस दावे को चुनौती दी जिस पर हिंदुत्व की राजनीति खड़ी की गई थी। यह वही हिंदुत्व है, जिसे कभी विचारधारा कहा गया, कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और कभी राजनीतिक हथियार। लेकिन आज जब वही हिंदुत्व एक शंकराचार्य के सवालों के सामने असहज दिखाई देता है, तो संघ परिवार की चुप्पी अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है। न दिल्ली से कोई तीखा जवाब आया, न नागपुर से कोई वैचारिक प्रतिवाद। यह खामोशी इसलिए और भारी हो जाती है क्योंकि सवाल किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि सनातन परंपरा के शीर्ष धर्माचार्य ने उठाए हैं।

असल में, यह पूरा विवाद केवल योगी आदित्यनाथ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार सीधे दिल्ली और लखनऊ के सत्ता समीकरणों से जुड़े हुए हैं। लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि दिल्ली की राजनीति विकास, पूंजी और कॉर्पाेरेट संतुलन पर चलती है, जबकि लखनऊ की सत्ता धार्मिक पहचान, भगवा राजनीति और भावनात्मक अपील पर टिके होने का दावा करती रही है। लेकिन अब जब शंकराचार्य स्वयं इस धार्मिक राजनीति को दिखावटी बता रहे हैं, तो यह संतुलन डगमगाता नजर आ रहा है। यही कारण है कि शंकराचार्य द्वारा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का नाम सार्वजनिक तौर पर लिया जाना महज संयोग नहीं माना जा रहा। यह एक संकेत है कि सत्ता की कुर्सी को लेकर अंदरखाने बहुत कुछ चल रहा है और धर्म की आड़ में राजनीति साधने की रणनीति अब उसी धर्म के भीतर से चुनौती पा रही है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि शंकराचार्य ने राम मंदिर निर्माण को लेकर भारतीय जनता पार्टी के श्रेय के दावों पर सीधा सवाल उठाया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मंदिर किसी सरकार ने नहीं, बल्कि न्यायालय में केस लड़ने वाले वकीलों और पक्षकारों ने बनवाया। यह बयान उस पूरे नैरेटिव को झकझोर देता है, जिसके सहारे बीजेपी वर्षों से अयोध्या आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है। शंकराचार्य का यह कहना कि योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर आंदोलन में कानूनी रूप से कोई भूमिका नहीं निभाई, सीधे तौर पर उस छवि को कमजोर करता है जिसे एक कट्टर हिंदुत्ववादी नेता के रूप में गढ़ा गया था। यही वजह है कि इस बयान के बाद योगी आदित्यनाथ केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं।

इसी पूरे घटनाक्रम के बीच दिल्ली की राजनीति के संकेत भी बेहद स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। गृह मंत्री अमित शाह का लखनऊ दौरा और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान सामने आई तस्वीरों को केवल औपचारिक घटनाएं मानना राजनीतिक भूल होगी। इन तस्वीरों में जिस तरह बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन की उपस्थिति को महत्व मिलता दिखा, उसने यह संकेत दे दिया कि पार्टी के भीतर सत्ता संतुलन तेजी से बदला जा रहा है। यह भी संदेश साफ है कि पार्टी में जोड़ी केवल दो की होती है और कोई तीसरा कद बढ़ाने की कोशिश करता है, तो उसे सीमित कर दिया जाता है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता चाहे जितनी भी हो, पार्टी संगठन पर उनकी पकड़ सीमित दिखाई देने लगी है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के उभार ने दिल्ली को पहले ही सतर्क कर दिया है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में किसी एक नेता का अत्यधिक मजबूत हो जाना केंद्र की राजनीति के लिए जोखिम बन सकता है। यही कारण है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीति अभी से तैयार की जा रही है। यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है कि क्या योगी आदित्यनाथ ही उत्तर प्रदेश में बीजेपी का चेहरा रहेंगे या कोई नया नाम सामने लाया जाएगा। यहां तक कि जरूरत पड़ने पर सत्ता समीकरणों के लिए मायावती जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। यह राजनीति अब केवल विचारधारा की नहीं, बल्कि शुद्ध सत्ता प्रबंधन की बन चुकी है।

संघ परिवार की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक रहस्यमय बनी हुई है। एक समय था जब संघ को बीजेपी की वैचारिक रीढ़ माना जाता था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि संघ भी दिल्ली की रणनीति के सामने असहाय नजर आ रहा है। बीजेपी अध्यक्ष के चयन से लेकर मुख्यमंत्री पद के भविष्य तक, संघ की चुप्पी यह संकेत देती है कि वास्तविक निर्णय अब कहीं और लिए जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ की स्थिति इसलिए भी कमजोर मानी जा रही है क्योंकि उनके समर्थन में कोई संगठित राजनीतिक शक्ति खुलकर सामने नहीं आ रही है। पुलिस, प्रशासन और सत्ता के तमाम संसाधन होने के बावजूद राजनीतिक संरक्षण का अभाव उन्हें असहज स्थिति में डालता है।

शंकराचार्य की भूमिका यहां केवल धार्मिक नहीं रह जाती, बल्कि वह एक राजनीतिक चेतावनी के रूप में उभरती है। श्रृंगेरी मठ से उठी यह आवाज अब देश के अन्य हिस्सों में भी गूंजने लगी है। स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्यों के माध्यम से जिस सनातनी चेतना को नया स्वरूप मिल रहा है, वह संघ और बीजेपी दोनों के लिए चुनौती बनती जा रही है। शंकराचार्य द्वारा ‘धर्म युद्ध’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि यह संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, बल्कि धर्म की आत्मा को लेकर भी है। यही कारण है कि उनके बयानों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

आखिरकार, इस पूरी लड़ाई का निष्कर्ष अभी स्पष्ट नहीं है। यह तय नहीं है कि योगी आदित्यनाथ अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या दिल्ली अपनी रणनीति में सफल होगी। यह भी साफ नहीं है कि संघ परिवार अपनी खोती हुई वैचारिक भूमिका को दोबारा स्थापित कर पाएगा या नहीं। लेकिन इतना निश्चित है कि भारतीय राजनीति में यह दौर केवल चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्संरचना का है। जब धर्म और राजनीति आमने-सामने खड़े हों, तो टकराव अवश्यंभावी होता है। और जब यह टकराव अपनों के बीच हो, तो उसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है। इस बार शोर विपक्ष का नहीं, बल्कि उसी धारा के भीतर से उठ रहा है, जिसने वर्षों तक सत्ता की इमारत खड़ी की थी।

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