भारत(सुनील कोठारी)। वैश्विक राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में हालिया घटनाक्रम ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां सत्ता और संविधान के बीच की रेखा एक बार फिर पूरी स्पष्टता से सामने आई है। अमेरिका के सर्वाेच्च न्यायालय ने केवल टेरिफ जैसे आर्थिक निर्णय को अवैध ठहराकर मामला समाप्त नहीं किया, बल्कि उसने यह संदेश भी दिया कि लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली पद पर बैठा व्यक्ति भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही राष्ट्रपति को कानूनी सीमाओं का अहसास कराते हुए दुनिया भर की अदालतों को यह संकेत दिया कि उनका असली कर्तव्य किसी नेता की ताकत के आगे झुकना नहीं, बल्कि संविधान की सर्वाेच्चता की रक्षा करना है। इस फैसले की गूंज केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी छाया भारत सहित उन तमाम देशों पर भी पड़ती दिखाई दे रही है, जहां न्यायिक संस्थाओं से साहसिक और समयबद्ध फैसलों की अपेक्षा की जाती है।
इस ऐतिहासिक निर्णय का सीधा संबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टेरिफ से है, जिसे अदालत ने अवैध करार दिया। अदालत ने साफ कहा कि 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह कांग्रेस की मंजूरी के बिना मनमाने तरीके से टेरिफ लगा सकें। नौ जजों की पीठ में से छह ने इस मत का समर्थन किया कि ट्रंप ने जिस कानून का सहारा लिया, उसका दायरा इस प्रकार की कराधान शक्ति प्रदान नहीं करता। इस फैसले ने ट्रंप की उस शैली पर भी रोक लगाई, जिसमें वे टेरिफ को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दबाव बनाने और दादागिरी के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। अदालत ने यह दिखा दिया कि राष्ट्रीय छवि या वैश्विक प्रभाव की चिंता से ऊपर संविधान की मर्यादा है।
इस फैसले का वैश्विक प्रभाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उन तमाम लोकतांत्रिक देशों के लिए एक आईना है, जहां अदालतों की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो भारत का सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की तुलना अब स्वाभाविक रूप से इस अमेरिकी निर्णय से की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या भारतीय न्यायपालिका भी उतनी ही तत्परता और साहस के साथ संविधान की सर्वाेच्चता को कायम कर पाई है। नोटबंदी से लेकर चुनावी फंडिंग जैसे अहम मुद्दों पर वर्षों तक चली सुनवाइयों ने यह धारणा बनाई कि फैसलों में देरी का लाभ सत्ताधारी दल को मिला। महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों के विभाजन और दलबदल जैसे मामलों में भी निर्णय आने में वर्षों लग गए, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिश्चितता बनी रही।
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा महज दस महीनों में फैसला सुनाना एक मजबूत उदाहरण के रूप में सामने आया है। यह तुलना इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत में इलेक्ट्रोरल बॉन्ड जैसे बड़े और संवेदनशील मामले में सात साल का समय लगा। 2017 में दायर याचिका पर सुनवाई 2023 में शुरू हुई और 2024 में जाकर फैसला आया। उस दौरान न केवल चुनाव हुए, बल्कि हजारों करोड़ रुपये का चंदा भी इसी व्यवस्था के तहत इकट्ठा किया गया। अमेरिकी अदालत के निर्णय के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या समय पर न्याय न मिलना भी एक तरह का अन्याय नहीं है।
अमेरिकी मामले में अदालत ने न केवल टेरिफ को अवैध ठहराया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि कराधान का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि आईईईपीए कानून में टेरिफ या ड्यूटी का कोई उल्लेख नहीं है। सरकार यह साबित करने में असफल रही कि कांग्रेस ने राष्ट्रपति को इस तरह की कर शक्ति सौंपी है। फैसले में यह भी रेखांकित किया गया कि कानून के कुछ शब्दों को संदर्भ से अलग कर राष्ट्रपति ने असाधारण शक्तियां अपने हाथ में लेने की कोशिश की, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। यह टिप्पणी अपने आप में उस संवैधानिक संतुलन को रेखांकित करती है, जिस पर अमेरिकी लोकतंत्र टिका है।
इस निर्णय के बाद ट्रंप के सामने विकल्प पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन उनके लिए रास्ता अब आसान नहीं रहा। अदालत ने यह नहीं कहा कि राष्ट्रपति किसी भी स्थिति में टेरिफ नहीं लगा सकते, बल्कि यह स्पष्ट किया कि जिस तरीके और जिस कानून का इस्तेमाल किया गया, वह गलत था। अब ट्रंप को ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 के सेक्शन 122 या 301 जैसे प्रावधानों का सहारा लेना होगा, जिनमें लंबी प्रक्रिया, नोटिस अवधि और कांग्रेस की भूमिका अनिवार्य है। इसका अर्थ यह है कि अब किसी सुबह अचानक टेरिफ लगाने की धमकी देकर दोपहर तक उसे लागू कर देने की राजनीति संभव नहीं रहेगी।
इस पूरे घटनाक्रम में एक नाम खास तौर पर उभरकर सामने आया है, जिसने अमेरिका की न्याय व्यवस्था की आत्मा को उजागर कर दिया। भारतीय मूल के वकील नील कात्याल ने छोटे व्यापारियों की ओर से अपने ही राष्ट्रपति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ा और उसे जीता। एक ऐसे समय में, जब इमीग्रेंट्स को लेकर सख्त बयानबाजी हो रही थी, एक प्रवासी परिवार का बेटा संविधान के भरोसे सबसे ताकतवर व्यक्ति के सामने खड़ा हुआ। नील कात्याल का कहना है कि यह जीत केवल उनकी नहीं, बल्कि उस न्यायिक व्यवस्था की है, जो किसी की ताकत देखकर नहीं, बल्कि कानून देखकर फैसला करती है।
नील कात्याल की कहानी इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वह अमेरिकी लोकतंत्र में भरोसे की मिसाल बन गई है। शिकागो में जन्मे, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ाने वाले और ओबामा प्रशासन में अहम भूमिका निभा चुके नील ने यह दिखाया कि अदालतें केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती हैं। उन्होंने फैसले के बाद कहा कि यह संदेश बेहद सीधा हैकृराष्ट्रपति शक्तिशाली हो सकते हैं, लेकिन संविधान उनसे भी ज्यादा ताकतवर है। यह कथन दुनिया भर के उन नागरिकों के लिए उम्मीद की किरण बन गया है, जो सत्ता के सामने खुद को असहाय महसूस करते हैं।
अमेरिकी फैसले का असर आर्थिक मोर्चे पर भी व्यापक रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन को सैकड़ों अरब डॉलर का रिफंड करना पड़ सकता है, हालांकि इस पर अभी कानूनी स्पष्टता नहीं है। कई राज्यों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए पहले से लगाए गए टेरिफ से हुए नुकसान की भरपाई की मांग उठाई है। हजारों कंपनियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और लाखों उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद जगी है। यह दिखाता है कि जब न्यायिक संस्थाएं मजबूत होती हैं, तो उनका असर केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिक के जीवन तक पहुंचता है।
भारत के संदर्भ में इस फैसले ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा है कि यदि सरकार ने जल्दबाजी में व्यापारिक समझौते न किए होते और अदालत के फैसले का इंतजार किया होता, तो देश को बेहतर शर्तें मिल सकती थीं। वहीं राहुल गांधी ने भी इसे सरकार की कमजोरी से जोड़ते हुए आरोप लगाए हैं। इन बयानों से साफ है कि अमेरिकी अदालत का निर्णय भारतीय राजनीति में भी संदर्भ बिंदु बन चुका है।
व्यापार के मोर्चे पर भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान के अनुसार व्यापार समझौते का ढांचा तो तैयार है, लेकिन उसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल कायम हैं। अमेरिकी फैसले के बाद टेरिफ को लेकर जो स्थिति बनी है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब किसी भी देश के लिए मनमानी करना आसान नहीं रहेगा। यह भारत जैसे देशों के लिए सबक भी है और अवसर भी कि वे समानता के आधार पर बातचीत कर सकें।
अंततः अमेरिका के सर्वाेच्च न्यायालय का यह निर्णय केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का पुनर्पाठ है। इसने याद दिलाया है कि संस्थाएं जब मजबूत होती हैं, तो वे सबसे ताकतवर व्यक्ति को भी उसकी सीमा दिखा सकती हैं। भारत समेत दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए यह एक संदेश है कि न्याय में देरी, चुप्पी या भय लोकतंत्र को कमजोर करता है, जबकि साहसिक और समयबद्ध निर्णय उसे मजबूत बनाते हैं। इतिहास में वही फैसले याद रखे जाते हैं, जो नागरिकों के मन में यह भरोसा पैदा करें कि न्याय अभी भी जिंदा है, और सत्ता के सामने झुकने के लिए नहीं, बल्कि संविधान के साथ खड़े रहने के लिए बनी है।





