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रेड कारपेट के पीछे की सच्चाई उजागर, सत्ता से सवाल, लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा शुरू

एब्सटीन फाइल से लेकर अंतरराष्ट्रीय समझौतों तक उठे सवालों ने सत्ता, नीति और लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा किया, जहां जवाबदेही, पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नई बहस तेज़ हुई।

भारत(सुनील कोठारी)। जब किसी देश में रेड कारपेट बिछाई जाती है, तो उसका अर्थ केवल सम्मान और स्वागत भर नहीं होता, बल्कि वह सत्ता, छवि और भरोसे की प्रतीक भी बन जाती है। रेड कारपेट पर कोई दाग अच्छा नहीं लगता, क्योंकि वह उन चेहरों के लिए बिछाई जाती है जिन्हें दुनिया ताक़त, प्रतिष्ठा और नेतृत्व का प्रतीक मानती है। यही कारण है कि अगर उस पर दाग लग जाए तो उसे ढकने की हर संभव कोशिश होती है। लेकिन सवाल तब गंभीर हो जाता है जब वही रेड कारपेट ज़मीन की सच्चाई छुपाने के लिए बिछाई गई हो, और अचानक कोई उसे उठाकर नीचे की वास्तविकता दुनिया के सामने रख दे। आज देश की राजनीति ठीक इसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां रेड कारपेट हटने की आशंका ने सत्ता से लेकर व्यवस्था तक को असहज कर दिया है। पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि चमक-दमक के नीचे दबे सवाल अब सतह पर आने लगे हैं और उन्हें ढक पाना आसान नहीं रह गया है।

इसी पृष्ठभूमि में वह घटना सामने आती है जिसने न केवल दिल्ली की सियासी फिज़ा को गर्म किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि और नीतियों को लेकर नई बहस छेड़ दी। देश के भीतर पहली बार किसी नेता का नाम एब्सटीन फाइल में सामने आने की चर्चा ने राजनीति को झकझोर दिया है। जिस एब्सटीन फाइल को दुनिया भर में बाल यौन शोषण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह के रूप में पहचाना जाता है, उसी फाइल में नाम आने की आशंका मात्र से कई देशों के शासनाध्यक्षों की नींद उड़ चुकी है। वैश्विक स्तर पर गिरफ्तारियां हो रही हैं, जांच एजेंसियां सक्रिय हैं और सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों में खलबली मची हुई है। ऐसे समय में भारत के भीतर इस फाइल से जुड़े सवाल उठना सत्ता प्रतिष्ठान के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। यह केवल एक नाम या एक फाइल का मामला नहीं रह जाता, बल्कि देश की नैतिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय साख से जुड़ जाता है।

इसी बीच दूसरा बड़ा सवाल देश की आर्थिक संप्रभुता को लेकर खड़ा होता है। अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील्स, ऊर्जा समझौते और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं ऐसे सौदे तो नहीं किए जा रहे, जिनका लाभ भारत के किसानों, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और भारत की आत्मनिर्भरता को नहीं, बल्कि किसी और को मिल रहा हो। अगर इन समझौतों के चलते भारत की संप्रभुता पर ही सवाल उठने लगें, तो यह चिंता केवल विपक्ष की नहीं, बल्कि हर नागरिक की होनी चाहिए। सवाल यह है कि अगर सौदे ऐसे हों जिनमें भारत देने वाला अधिक और पाने वाला कम बन जाए, तो क्या उस पर सवाल उठाना देशद्रोह कहलाएगा? या फिर सवाल उठाने वालों को चुप कराने की कोशिश ही असली समस्या है?

राजनीतिक माहौल उस वक्त और अधिक तनावपूर्ण हो गया, जब इन मुद्दों को उठाने वालों पर सीधे-सीधे देशद्रोह और गद्दारी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाने लगा। यह आरोप लगाने वाले कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष से जुड़े शीर्ष चेहरे हैं। जब देश का एक कैबिनेट मंत्री खुले तौर पर किसी नेता को देशद्रोही कह दे, और एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का प्रवक्ता उसे गद्दार बताने लगे, तो यह केवल बयानबाज़ी नहीं रह जाती। हालात तब और गंभीर हो जाते हैं जब गोली मारने जैसी धमकियों की बात सामने आती है, और धमकी देने वाले व्यक्ति के राजनीतिक संबंध भी उजागर होते हैं। यह पूरा घटनाक्रम इस सवाल को जन्म देता है कि क्या सवाल उठाना अब अपराध की श्रेणी में आ गया है?

इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडप में आयोजित एआई समिट के दौरान वह दृश्य सामने आया, जिसने राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी। यूथ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने “पीएम कॉम्प्रोमाइज्ड” का नारा लगाते हुए प्रतीकात्मक विरोध किया। उन्होंने अपनी गंजी उतारकर उस पर छपी प्रधानमंत्री की तस्वीर दिखाते हुए यह आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री समझौतों के मामले में समझौता कर चुके हैं। यह विरोध कुछ ही पलों में समाप्त हो गया, क्योंकि तुरंत पुलिस कार्रवाई हुई और यूथ कांग्रेस के चार नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार किए गए नेताओं में कृष्ण हरी, जो भारतीय यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं, कुंदन यादव, जो बिहार प्रदेश सचिव हैं, अजय कुमार, जो उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष हैं, और नरसिम्हा यादव, जो राष्ट्रीय समन्वयक हैं, शामिल हैं। इन चारों की गिरफ्तारी ने यह संदेश दिया कि असहमति के स्वर को बर्दाश्त करने की सीमा कितनी सिमट चुकी है।

इसी दिन उसी एआई समिट के मंच से एक और बयान सामने आता है, जो स्थिति को और पेचीदा बना देता है। भारत में अमेरिका के राजदूत खुले तौर पर यह कहते हैं कि भारत को अब रूस से तेल नहीं खरीदना चाहिए, क्योंकि अमेरिका ऐसा नहीं चाहता। यह बयान ऐसे समय पर आता है, जब भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से तेल खरीद रहा है और इसे अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता का हिस्सा मानता रहा है। सवाल उठता है कि क्या किसी विदेशी प्रतिनिधि को यह तय करने का अधिकार है कि भारत किस देश से तेल खरीदेगा और किससे नहीं? यह बयान केवल कूटनीतिक सलाह नहीं लगता, बल्कि नीति निर्धारण में दखल जैसा प्रतीत होता है।

यहीं से विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा उठाए गए पांच सवालों का संदर्भ और अधिक गंभीर हो जाता है। उन्होंने सीधे पूछा कि भारत की तेल नीति पर अमेरिका को अनुमति देने का अधिकार किसने दिया। इसके साथ ही उन्होंने किसानों, आयात-निर्यात, डेटा सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता से जुड़े अन्य सवाल भी खड़े किए। उनका आरोप है कि अमेरिका को खुश करने के लिए भारत के किसानों की बलि क्यों दी जा रही है, हर साल 100 बिलियन डॉलर के आयात का वादा किस आधार पर किया गया और क्या भारत को एक डेटा कॉलोनी में बदला जा रहा है। ये सवाल केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि नीतिगत चिंताओं को उजागर करते हैं।

इन सवालों का जवाब देने की अपेक्षा सरकार से थी, लेकिन न तो वाणिज्य मंत्री, न तेल मंत्री, न विदेश मंत्री और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कोई सीधा उत्तर सामने आया। इसके विपरीत, एआई समिट के भीतर ही अमेरिकी राजदूत द्वारा दिए गए बयान ने विपक्ष के आरोपों को और बल दिया। यह स्थिति उस रेड कारपेट के हटने जैसी है, जहां नीचे छुपी सच्चाइयाँ एक-एक कर सामने आने लगती हैं। सवाल यह है कि क्या इन सच्चाइयों को उजागर करने वालों को दबा देना ही समाधान है, या फिर जवाबदेही तय करना लोकतंत्र की असली कसौटी है।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इन सवालों को “हास्यास्पद” बताते हुए कहा कि विपक्ष के नेता सोशल मीडिया के अलावा कहीं सुने नहीं जाते। उन्होंने यह भी कहा कि 140 करोड़ देशवासियों को बेहतर भविष्य देने के लिए अवसर पैदा करना ज़रूरी है। लेकिन व्यापारियों और निर्यातकों के बीच यह चिंता भी गहराने लगी है कि अगर आयात पर टैक्स का बोझ बढ़ता है और अमेरिकी शर्तें माननी पड़ती हैं, तो इसका असर सीधे भारतीय उद्योग पर पड़ेगा। 2 से 3 प्रतिशत टैक्स देने वाले व्यापारियों को अब 18 प्रतिशत टैक्स देना पड़े, तो उसे राहत कैसे कहा जाएकृयह सवाल अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक बन चुका है।

यहीं पर रेड कारपेट का प्रतीक और अधिक गहरा हो जाता है। क्या एआई समिट, बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन और भव्य मंच केवल इसीलिए हैं कि असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके? क्या बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली और आर्थिक असमानता जैसे सवालों से ध्यान भटकाने के लिए बार-बार बड़े इवेंट्स का सहारा लिया जा रहा है? यूथ कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि जब भी देश में कोई बड़ा संकट आता है, तब कोई न कोई भव्य आयोजन सामने आ जाता हैकृचाहे वह नोटबंदी हो, जी20 समिट हो, मेक इन इंडिया हो या अब एआई समिट।

इन सबके बीच मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जिस मीडिया को सत्ता से सवाल पूछने चाहिए, वह कई बार सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा करता दिखाई देता है। एब्सटीन फाइल में नाम आने की चर्चा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही गिरफ्तारियां और भारत से जुड़े संभावित कनेक्शनकृइन पर गहन बहस की बजाय, ध्यान यूथ कांग्रेस के विरोध और गिरफ्तारी पर केंद्रित कर दिया जाता है। यह चयनात्मक आक्रोश इस संदेह को जन्म देता है कि कहीं रेड कारपेट को जानबूझकर बचाने की कोशिश तो नहीं हो रही।

एप्सटीन फाइल कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं है। यह उस वैश्विक नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जहां सत्ता, पैसा और अपराध एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में इस फाइल से जुड़े नाम सामने आने के बाद राजनीतिक भूचाल आ चुका है। राजघरानों से लेकर कॉरपोरेट जगत और राजनेताओं तक, कोई भी इस जांच के दायरे से बाहर नहीं दिख रहा। ब्रिटेन में प्रिंस एंड्रयू का नाम सामने आने के बाद शाही परिवार को सार्वजनिक सफाई देनी पड़ी। अमेरिका में बड़े उद्योगपतियों और प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए। इन सबके बीच भारत में अचानक सन्नाटा छा जाना सामान्य नहीं माना जा सकता।

इस सन्नाटे को और गहरा बनाती है सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया। एब्सटीन फाइल का नाम आते ही उसे “अफवाह”, “साजिश” और “विदेशी एजेंडा” बताकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। सवाल पूछने वालों पर व्यक्तिगत हमले शुरू हो जाते हैं। कोई देशद्रोही कहा जाता है, कोई गद्दार, तो किसी को विदेशी ताकतों का एजेंट घोषित कर दिया जाता है। यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन इसकी तीव्रता यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं कोई न कोई बात ऐसी है, जिसे सामने आने से रोका जा रहा है।

इसी संदर्भ में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के कानूनी मामलों को भी नए सिरे से देखा जाने लगा है। उनके समर्थकों का कहना है कि जब-जब उन्होंने बड़े और असहज सवाल उठाए, तभी-तभी उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कस दिया गया। मानहानि का मामला हो या संसद की सदस्यता से जुड़ा विवाद, हर कदम पर यह सवाल खड़ा होता है कि क्या कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए हो रहा है या फिर असहमति की आवाज़ दबाने के लिए। अदालतों में चल रही सुनवाइयों के बीच भी राजनीतिक बयानबाज़ी का स्तर यह दिखाता है कि मामला केवल कानून तक सीमित नहीं है।

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्ता से सवाल पूछने की होती है। लेकिन जब सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी, धमकी या राजनीतिक बहिष्कार बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। यूथ कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी इसका ताज़ा उदाहरण है। एआई समिट जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ सेकंड का प्रतीकात्मक विरोध, और उसके बाद तुरंत कार्रवाईकृयह संदेश देता है कि असहमति के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि विरोध सही था या गलत, सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध की गुंजाइश बची है?

इसी दौरान मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर बहस शुरू हो जाती है। देश का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि मीडिया अब सत्ता का आईना नहीं, बल्कि उसका कवच बनता जा रहा है। एब्सटीन फाइल जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर गहन चर्चा की बजाय, ध्यान यूथ कांग्रेस के प्रदर्शन और गिरफ्तारी पर केंद्रित कर दिया जाता है। बहस इस पर नहीं होती कि फाइल में क्या है, बल्कि इस पर होती है कि किसने सवाल उठाया और क्यों उठाया। यह ट्रेंड लोकतंत्र के लिए खतरनाक माना जा रहा है, क्योंकि बिना स्वतंत्र मीडिया के कोई भी लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

इसी बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक और पहलू सामने आता है। अमेरिका और भारत के रिश्तों को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, वे केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक भी हैं। अमेरिका के राजदूत का यह बयान कि भारत को रूस से तेल नहीं खरीदना चाहिए, केवल एक सलाह नहीं माना जा सकता। यह सीधे-सीधे भारत की ऊर्जा नीति में दखल जैसा प्रतीत होता है। अगर भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी देश पर निर्भर होता है, तो वह उसका रणनीतिक फैसला होता है। लेकिन जब कोई बाहरी ताकत यह तय करने लगे कि भारत किससे व्यापार करेगा और किससे नहीं, तो यह संप्रभुता का सवाल बन जाता है।

इसी कड़ी में राहुल गांधी द्वारा उठाए गए पांच सवाल और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने पूछा कि भारत को हर साल 100 बिलियन डॉलर का आयात करने का वादा किसने किया और किसके फायदे के लिए। किसानों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय किसानों के हितों की अनदेखी की जा रही है। डेटा सुरक्षा को लेकर उन्होंने चेताया कि कहीं भारत एक डेटा कॉलोनी तो नहीं बनता जा रहा। ये सवाल केवल विपक्ष की राजनीति नहीं, बल्कि नीति निर्धारण की पारदर्शिता से जुड़े हैं।

इन सवालों पर सरकार की चुप्पी कई आशंकाओं को जन्म देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इन मुद्दों पर कोई सीधा बयान नहीं आता। विदेश मंत्री, वाणिज्य मंत्री और तेल मंत्री भी स्पष्ट जवाब देने से बचते दिखाई देते हैं। इसके उलट, सत्ता पक्ष के प्रवक्ता आक्रामक भाषा का सहारा लेते हैं। सवाल पूछने वालों को “एंटी-नेशनल” करार देना आसान रास्ता है, लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि और गहरे हो जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति भारत के लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक मोड़ हो सकती है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर असहमति की आवाज़ों को दबाया जा रहा है। यह विरोधाभास लंबे समय तक नहीं चल सकता। अगर लोकतंत्र मजबूत है, तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर सवालों से डर लगने लगे, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कमजोरी है।

एब्सटीन फाइल के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को देखें तो यह साफ़ होता है कि यह केवल एक व्यक्ति या एक देश की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां सत्ता और अपराध के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। जिन देशों में इस फाइल पर खुली जांच हो रही है, वहां यह संदेश दिया जा रहा है कि कानून सबके लिए बराबर है। भारत में इस पर चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या यहां भी ऐसी ही निष्पक्ष जांच संभव है, या फिर राजनीतिक प्रभाव कानून से ऊपर है। इसी संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका भी चर्चा में आती है। अदालतें लोकतंत्र का अंतिम स्तंभ मानी जाती हैं। जब कार्यपालिका और विधायिका पर सवाल उठते हैं, तब जनता की नजरें न्यायपालिका पर टिक जाती हैं। राहुल गांधी के मामलों में अदालतों के फैसलों को इसी नजर से देखा जा रहा है। क्या न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाएगी, या फिर राजनीतिक दबाव का असर दिखेगाकृयह आने वाला समय बताएगा। लेकिन यह तय है कि इन मामलों के फैसले केवल एक नेता के भविष्य को नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा को भी प्रभावित करेंगे।

देश की राजनीति में यह भी देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इन घटनाओं को किस तरह देख रहा है। यूथ कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी ने युवाओं के बीच यह संदेश दिया है कि राजनीति में सवाल पूछना जोखिम भरा हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि इतिहास गवाह हैकृजब-जब सवाल दबाने की कोशिश हुई है, तब-तब वे और ज़ोर से उभरे हैं। सोशल मीडिया के दौर में किसी भी मुद्दे को पूरी तरह दबा पाना आसान नहीं रहा। एब्सटीन फाइल, ट्रेड डील्स और संप्रभुता जैसे मुद्दे अब केवल संसद या टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम जनता की चर्चा का विषय बन चुके हैं। इन सबके बीच सत्ता पक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की है। अगर सरकार को अपने फैसलों पर भरोसा है, तो उसे सवालों का जवाब देने से क्यों डरना चाहिए? अगर ट्रेड डील्स देशहित में हैं, तो उनकी शर्तें सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं? अगर एब्सटीन फाइल में भारत से जुड़ा कुछ भी नहीं है, तो खुली जांच से डर क्यों? ये सवाल केवल विपक्ष के नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर नागरिक के हैं।

अंत में यह स्पष्ट होता है कि यह पूरी बहस केवल किसी एक फाइल, एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है। यह बहस उस दिशा को तय करेगी, जिस ओर भारत का लोकतंत्र आगे बढ़ेगा। क्या भारत सवाल पूछने वालों का देश रहेगा, या फिर सवाल पूछना अपराध बन जाएगा? क्या रेड कारपेट के नीचे छुपी सच्चाइयों को सामने आने दिया जाएगा, या फिर उन्हें और मोटे कालीन से ढक दिया जाएगा? आज भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से दो रास्ते निकलते हैं। एक रास्ता जवाबदेही, पारदर्शिता और मजबूत लोकतंत्र की ओर जाता है। दूसरा रास्ता चुप्पी, डर और सत्ता के केंद्रीकरण की ओर। कौन-सा रास्ता चुना जाएगा, यह केवल सरकार नहीं, बल्कि जनता तय करेगी। क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम फैसला हमेशा जनता का होता है।

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