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विकास पर फिरा पानी और जल संस्थान की लापरवाही ने उजाड़ीं करोड़ों की चमचमाती टाइल्स

सड़कों को संवारकर प्रदूषण घटाने की पहल पर विभागीय लापरवाही भारी पड़ी, बिना समन्वय की खुदाई ने जनता के पैसे और भरोसे दोनों पर सवाल खड़े किए, महापौर दीपक बाली की सख्ती अब परीक्षा में है।

काशीपुर। देश में विकास की बात जितनी जोर-शोर से की जाती है, जमीनी हकीकत कई बार उतनी ही कड़वी नजर आती है। एक ओर सरकारें और जनप्रतिनिधि आम जनता को बेहतर सड़कें, साफ-सुथरा वातावरण और आधुनिक सुविधाएं देने के दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ विभागीय लापरवाही और आपसी तालमेल की कमी उन दावों पर सवालिया निशान खड़े कर देती है। आम जनमानस के बीच यह चर्चा अब आम हो चली है कि विकास की योजनाएं कागजों और उद्घाटनों तक सीमित रह जाती हैं, जबकि धरातल पर उन्हें बचाने और संवारने की जिम्मेदारी निभाने में संबंधित तंत्र असफल दिखाई देता है। जनता यह भी कहने लगी है कि जब एक तरफ करदाताओं के पैसे से सड़कों और सुविधाओं का निर्माण कराया जाता है, तो दूसरी तरफ वही सड़कें कुछ ही दिनों में खुदी-उधड़ी हालत में क्यों नजर आती हैं। यही विरोधाभास आजकल कई शहरों में दिख रहा है, जहां विकास और विनाश एक ही जगह, एक ही समय पर साथ-साथ चलते प्रतीत हो रहे हैं।

इसी तरह की तस्वीर उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर में इन दिनों साफ देखी जा सकती है। नगर में एक ओर जहां महापौर दीपक बाली द्वारा विकास कार्यों को गति देने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ विभागों की कार्यशैली उन प्रयासों पर पानी फेरती नजर आ रही है। महापौर दीपक बाली पिछले काफी समय से शहर की बुनियादी समस्याओं को लेकर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं और विशेषकर प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से कई योजनाओं पर काम शुरू कराया गया है। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल, बढ़ते वायु प्रदूषण और उससे होने वाली बीमारियों को देखते हुए उन्होंने सड़कों के दोनों ओर सीमेंट की टाइल्स लगवाने का निर्णय लिया। इसका मकसद साफ था कि कच्ची पटरी से उड़ने वाली मिट्टी पर नियंत्रण हो, राहगीरों और आसपास रहने वालों को राहत मिले और शहर की तस्वीर भी बेहतर दिखाई दे।

महापौर दीपक बाली के निर्देश पर पूरे काशीपुर क्षेत्र में चरणबद्ध तरीके से सड़कों के किनारे टाइल्स लगाने का कार्य शुरू किया गया। इस पहल को स्थानीय लोगों ने भी सराहा, क्योंकि वर्षों से लोग धूल-मिट्टी और प्रदूषण की समस्या से परेशान थे। कई इलाकों में जब यह काम पूरा हुआ तो वहां की सड़कें न सिर्फ साफ-सुथरी दिखने लगीं, बल्कि यातायात भी सुगम हो गया। नगर निगम का दावा था कि यह योजना केवल सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जनस्वास्थ्य से है। इसी क्रम में मानपुर रोड जैसे व्यस्त मार्गों पर भी टाइल्स बिछाने का काम कराया गया, ताकि भारी यातायात वाले क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर कम किया जा सके। शुरुआत में सब कुछ सुचारू चलता नजर आया और लोगों को उम्मीद बंधी कि अब शायद शहर को स्थायी समाधान मिलेगा।

लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी। जैसे ही मानपुर रोड पर बाबा रिसोर्ट के पास टाइल्स लगाने का काम पूरा हुआ, वैसे ही जल संस्थान की ओर से सड़क को खोदने का काम शुरू कर दिया गया। स्थानीय लोगों के लिए यह दृश्य चौंकाने वाला था, क्योंकि जिस सड़क को अभी-अभी संवारा गया था, वही फिर से गड्ढों में तब्दील होने लगी। बताया जा रहा है कि जल संस्थान द्वारा पानी की पाइपलाइन में लीकेज बताकर खुदाई शुरू की गई। हैरानी की बात यह रही कि यह लीकेज कोई नई समस्या नहीं थी, बल्कि काफी समय से मौजूद थी। इसके बावजूद टाइल्स लगने से पहले संबंधित विभाग ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और जैसे ही नया निर्माण कार्य पूरा हुआ, अचानक खुदाई की जरूरत महसूस की गई।

इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय समन्वय की पोल खोल दी। सवाल यह उठ रहा है कि जब जल संस्थान को पहले से लीकेज की जानकारी थी, तो समय रहते उसकी मरम्मत क्यों नहीं की गई। क्या यह उचित नहीं होता कि सड़क निर्माण या टाइल्स बिछाने से पहले सभी संबंधित विभाग मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर लेते। महापौर दीपक बाली ने कुछ दिन पहले ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि नगर निगम की अनुमति के बिना यदि कोई विभाग सड़क को खोदता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि बिना अनुमति सड़क तोड़ने वाले विभाग को उसी सड़क का पुनर्निर्माण भी अपने खर्चे पर करना पड़ेगा।

इसके बावजूद मानपुर रोड पर जो दृश्य सामने आया, उसने नगर निगम की सख्ती और विभागों की मनमानी के बीच का फर्क उजागर कर दिया। मौके पर मौजूद लोगों ने देखा कि नई टाइल्स को उखाड़कर पाइपलाइन की मरम्मत की जा रही है, जिससे न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी हो रही है, बल्कि आम जनता को भी परेशानी झेलनी पड़ रही है। सड़क पर फिर से धूल-मिट्टी उड़ने लगी, यातायात प्रभावित हुआ और लोगों में नाराजगी बढ़ गई। वीडियो फुटेज में साफ दिखाई दे रहा है कि किस तरह हाल ही में लगाए गए टाइल्स को हटाकर गड्ढा खोदा गया, जबकि इस तरह की स्थिति से बचने के लिए पहले से योजना बनाई जा सकती थी।

इस मामले को लेकर शहर में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या विकास कार्य सिर्फ दिखावे के लिए किए जा रहे हैं, या फिर उन्हें टिकाऊ बनाने की भी कोई योजना है। महापौर दीपक बाली की मंशा पर भले ही सवाल न उठे, लेकिन अन्य विभागों की कार्यप्रणाली ने उनकी कोशिशों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नगरवासियों का कहना है कि अगर हर विभाग अपने-अपने स्तर पर बिना तालमेल के काम करता रहा, तो शहर कभी भी व्यवस्थित और विकसित नहीं हो पाएगा। एक तरफ नगर निगम प्रदूषण कम करने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहा है, दूसरी तरफ वही काम कुछ ही दिनों में खोदकर बेकार कर दिया जा रहा है।

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी यह मुद्दा अब चर्चा का विषय बन चुका है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में महापौर दीपक बाली इस मामले को लेकर सख्त रुख अपना सकते हैं और संबंधित विभागों से जवाब तलब किया जा सकता है। नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो कार्रवाई तय है। वहीं, आम जनता की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस बार वास्तव में दोषियों पर शिकंजा कसा जाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। काशीपुर की यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास केवल निर्माण से नहीं, बल्कि समन्वय, जिम्मेदारी और जवाबदेही से संभव होता है।

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