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देश में इस्तीफ़ों की सियासत और जाति आधारित भावनात्मक ड्रामे में उलझती आम जनता

उत्तर प्रदेश के दो अधिकारियों के इस्तीफ़ों ने नैतिकता से ज़्यादा राजनीति, भावनात्मक उबाल, जातिगत ध्रुवीकरण और मीडिया तमाशे को उजागर किया, जहाँ असली जनसमस्याएँ पीछे छूटती दिखीं और सत्ता को सवालों से राहत मिलती चली गई।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश की सियासत इस समय जिस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, वह किसी गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श से ज़्यादा एक योजनाबद्ध तमाशे जैसी लगने लगी है। राजनीति, प्रशासन और सत्ता की परिधि में बैठे कुछ चेहरे मिलकर ऐसी पटकथा रचते नज़र आ रहे हैं, जिसमें आम जनता को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर असल सवालों से दूर रखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए दो इस्तीफ़े इसी नौटंकी का ताज़ा उदाहरण बनकर सामने आए हैं। ये इस्तीफ़े किसी नीतिगत असहमति, प्रशासनिक विफलता या जनहित के ठोस मुद्दों पर नहीं, बल्कि ऐसे विवादों पर दिए गए हैं जिनका सीधा संबंध भावनाओं, पहचान और जातिगत प्रतीकों से है। देखने में यह घटनाएँ अचानक और नैतिक आक्रोश से प्रेरित लग सकती हैं, लेकिन गहराई से देखने पर इनका स्वरूप पूरी तरह राजनीतिक प्रतीत होता है, जिसमें मीडिया, सोशल मीडिया और जनभावनाओं की भूमिका बेहद अहम बन जाती है।

इन दो इस्तीफ़ों में पहला नाम अलंकार अग्निहोत्री का सामने आया, जिन्होंने यह कहते हुए पद छोड़ा कि शंकराचार्य का अपमान हुआ है और वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनके इस्तीफ़े के साथ ही यूजीसी से जुड़ा एक और तर्क जोड़ा गया, जिसमें यह कहा गया कि उच्च शिक्षा से जुड़ी नीतियाँ सवर्णों के ख़िलाफ़ हैं। यह बयान सामने आते ही एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें कथित तौर पर ‘पंडित साला’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल का ज़िक्र किया गया। यदि किसी व्यक्ति को इस तरह अपमानजनक शब्द कहे गए हैं तो वह निस्संदेह निंदनीय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी का काम व्यक्तिगत या सामूहिक अपमान के मुद्दे पर इस्तीफ़ा देकर सुर्ख़ियों में आना है, या फिर व्यवस्था के भीतर रहकर न्याय सुनिश्चित करना है। वीडियो में लखनऊ से आए कॉल, स्पीकर फ़ोन पर हुई बातचीत और अधिकारियों की मौजूदगी ने इस पूरे प्रकरण को और भी नाटकीय बना दिया, जिससे यह साफ़ हो गया कि मामला सिर्फ़ विरोध का नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर स्वयं को स्थापित करने का भी है।

दूसरा मामला प्रशांत कुमार सिंह का है, जो जीएसटी उपायुक्त पद पर तैनात थे। उनका वीडियो और भी ज़्यादा भावुक अंदाज़ में सामने आया, जिसमें वे कैमरे के सामने अपनी पत्नी से बात करते हुए फूट-फूटकर रोते नज़र आए और यह कहते सुने गए कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया है क्योंकि शंकराचार्य द्वारा योगी आदित्यनाथ को लेकर दिए गए बयान उन्हें असहनीय लगे। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर तेज़ी से जगह बनाई और देखते ही देखते यह भावनात्मक अपील का रूप ले गया। सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को किसी बयान से ठेस लगी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि एक संवैधानिक पद पर बैठा अधिकारी क्या इस तरह व्यक्तिगत आक्रोश को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल सकता है। कैमरे के सामने रोना, इस्तीफ़े की घोषणा करना और फिर व्यापक कवरेज पाना, यह सब किसी स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया से ज़्यादा सुनियोजित प्रतीत होता है।

इन दोनों मामलों में एक साझा तर्क बार-बार सामने आया कि “जिसका नमक खाया है, उसके ख़िलाफ़ कुछ सहन नहीं किया जा सकता।” यह सोच न केवल खतरनाक है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। कोई भी अधिकारी किसी व्यक्ति विशेष, मुख्यमंत्री या सरकार का नमक नहीं खाता, बल्कि वह भारत के नागरिकों द्वारा दिए गए टैक्स से वेतन प्राप्त करता है। उसकी जवाबदेही किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि जनता और संविधान के प्रति होती है। अधिकारी की शपथ उसे यह सिखाती है कि वह नियमों और क़ानून के अनुसार निष्पक्ष रूप से काम करेगा, न कि भावनात्मक या जातिगत आग्रहों के आधार पर निर्णय लेगा। जब कोई अधिकारी यह कहता है कि उसने किसी व्यक्ति का नमक खाया है, तो वह स्वयं अपने पद की गरिमा और लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है।

यह भी गौर करने वाली बात है कि इन इस्तीफ़ों के बावजूद दोनों अधिकारियों की नौकरी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। एक मामले में निलंबन हुआ, दूसरे में इस्तीफ़ा दिया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि आगे की प्रक्रिया क्या होगी। इसके बावजूद जिस तरह से मीडिया कवरेज, समर्थन और विरोध की लहरें चलीं, उससे यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक लाभ भी है। अलग-अलग जाति समूहों में इन अधिकारियों को ‘हीरो’ की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा, कोई ब्राह्मण गौरव की बात करने लगा तो कोई राजपूत स्वाभिमान की। यह वही पुराना खेल है, जिसमें अधिकारियों को भी जातिगत पहचान के खांचे में डालकर समाज को और विभाजित किया जाता है।

इतिहास गवाह है कि प्रशासनिक पदों से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में प्रवेश करने की परंपरा नई नहीं है। फैज़ाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के. नायर का उदाहरण आज भी चर्चा में आता है, जिन्होंने 1949 से 1951 के बीच अपनी भूमिका के बाद समय से पहले सेवानिवृत्ति ली और बाद में जनसंघ से चुनाव लड़कर सांसद बने। इसी तरह अनेक उदाहरण हैं, जहाँ अधिकारियों ने व्यवस्था बदलने के नाम पर इस्तीफ़ा दिया और अंततः राजनीति का रास्ता अपनाया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आज के ये इस्तीफ़े भी किसी आगामी राजनीतिक पारी की भूमिका हैं। क्या ये अधिकारी यह लिखित में देने को तैयार हैं कि वे भविष्य में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।

अगर वास्तव में नैतिक साहस और जनहित की भावना होती, तो सवाल यह भी उठता कि क्या इन अधिकारियों ने अपने कार्यक्षेत्र में मौजूद गंभीर समस्याओं पर कभी इसी तरह का विरोध दर्ज कराया। क्या जीएसटी विभाग में करदाताओं की परेशानियाँ खत्म हो गई हैं। क्या सिटी मजिस्ट्रेट के क्षेत्र में प्रशासनिक चुनौतियाँ पूरी तरह सुलझ चुकी हैं। क्या उत्तर प्रदेश की सड़कें, बिजली व्यवस्था, पानी की आपूर्ति और प्रदूषण जैसी समस्याएँ समाप्त हो गई हैं। दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद जैसे इलाकों में बढ़ते प्रदूषण पर कोई अधिकारी यह कहते हुए इस्तीफ़ा क्यों नहीं देता कि वह जनता को साफ़ हवा दिलाने में असफल रहा। नोएडा में नाले में गिरकर जान गंवाने वाले युवराज का मामला आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। इतने समय बाद भी एसआईटी की रिपोर्ट सामने नहीं आई, लेकिन इस सरकारी लापरवाही पर किसी अधिकारी को कैमरे के सामने रोते हुए इस्तीफ़ा देते नहीं देखा गया। यही हाल अन्य कई मामलों का है, जहाँ व्यवस्था की चूक से आम नागरिकों की जान चली गई, लेकिन न तो भावनात्मक वीडियो बने और न ही जातिगत समर्थन की लहरें उठीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि किन मुद्दों पर इस्तीफ़ा देना ‘राजनीतिक रूप से उपयोगी’ है और किन पर चुप्पी साध लेना सुविधाजनक।

शंकराचार्य और योगी आदित्यनाथ के बीच चल रही बयानबाज़ी ने भी इस पूरे माहौल को और ज़हरीला बना दिया है। एक तरफ़ मुख्यमंत्री को औरंगज़ेब कहा जा रहा है, तो दूसरी ओर साधु-संतों को कालनेमी जैसे शब्दों से नवाज़ा जा रहा है। भाषा की सारी मर्यादाएँ टूट चुकी हैं और यह टकराव सीधे-सीधे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। असल सवाल यह होना चाहिए था कि साधु-संतों या किसी भी नागरिक के साथ पुलिस द्वारा की गई कथित मारपीट पर क्या कार्रवाई हुई। किसी की शिखा पकड़कर मारना न तो क़ानूनी है और न ही नैतिक, लेकिन इस मुद्दे को भी राजनीतिक शोर में दबा दिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़रूरी सवाल यही है कि आख़िर आम आदमी को इससे क्या मिलने वाला है। क्या इन इस्तीफ़ों के बाद उत्तर प्रदेश की बुनियादी समस्याएँ अपने आप हल हो जाएंगी, या फिर यह केवल कुछ दिनों की सुर्ख़ियों तक सीमित रह जाएगा। क्या इससे बेरोज़गारी कम होगी, महँगाई पर लगाम लगेगी, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधरेगी या पर्यावरण से जुड़े गंभीर संकटों पर कोई ठोस कदम उठाया जाएगा। ज़मीनी हकीकत यह है कि इन सवालों का जवाब अब तक नज़र नहीं आता। इसके बजाय बार-बार ऐसे मुद्दे उछाले जाते हैं जो जनता का ध्यान असली परेशानियों से भटका दें। राजनीति का यह पुराना और आज़माया हुआ तरीका है कि समाज को जाति, धर्म और पहचान की लकीरों में बाँट दिया जाए, ताकि लोग आपस में बहस और टकराव में उलझे रहें। जब जनता इसी खींचतान में फँसी रहती है, तब सत्ता और तंत्र से जवाबदेही मांगने की ज़रूरत और आवाज़ दोनों कमजोर पड़ जाती हैं।

जब आम जनता सच में सोचने लगती है, पढ़ने की आदत डालती है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े असल मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने लगती है, तभी सत्ता के गलियारों में बेचैनी साफ़ दिखाई देने लगती है। इसी असहजता के कारण जनता की सोच को सीमित रखने की योजनाबद्ध कोशिशें की जाती हैं, ताकि लोग बड़े सवालों तक न पहुँच सकें। कभी बहस को जाति की दीवार में कैद कर दिया जाता है, कभी क्षेत्रीय पहचान तक समेट दिया जाता है और कभी किसी एक नेता या चेहरे के इर्द-गिर्द घुमा दिया जाता है। धीरे-धीरे नागरिकता का मतलब यह बना दिया जाता है कि आप उद्घाटन कार्यक्रमों की तस्वीरें देखें, मंचों पर खड़े नेताओं की झलक पाएं और सोशल मीडिया पर भावनात्मक वीडियो साझा करें। जो लोग इस दायरे से बाहर निकलकर सवाल पूछते हैं, उन्हें तुरंत तीखा, नकारात्मक या पक्षपाती करार दे दिया जाता है। जबकि सच यह है कि सवाल करना, जवाब मांगना और सत्ता को कठघरे में खड़ा करना ही लोकतंत्र की असली आत्मा और नागरिक का मूल अधिकार है।

यूजीसी से जुड़े मुद्दे पर भी ठीक यही रणनीति बार-बार अपनाई जाती दिखाई देती है, जहाँ गंभीर और तथ्यपरक चर्चा को जानबूझकर हाशिये पर धकेल दिया जाता है। आधे घंटे या उससे अधिक की विस्तृत बहस, जिसमें तर्क, आंकड़े और विभिन्न पक्षों की राय शामिल होती है, उसे देखने या समझने का धैर्य आम दर्शक से छीन लिया गया है। उसकी जगह कुछ सेकंड या मिनट के चुनिंदा क्लिप सोशल मीडिया पर इस तरह प्रसारित किए जाते हैं कि हर वर्ग अपने हिसाब से अर्थ निकाल सके। कोई इन्हें अपने पक्ष में हथियार बनाता है तो कोई विरोध के लिए इस्तेमाल करता है। इस प्रक्रिया में मुद्दे की जटिलता और सच्चाई दोनों ही गुम हो जाती हैं। परिणामस्वरूप समाज में मतभेद और गहरे होते जाते हैं और आपसी अविश्वास बढ़ता है। इस शोरगुल के बीच सरकारें और पूरा तंत्र असली सवालों से आसानी से बच निकलते हैं। इस पूरे खेल को समझने के लिए किसी विशेष विशेषज्ञता की नहीं, बल्कि बस थोड़ा ठहरकर सोचने, संदर्भ समझने और पूरी बात सुनने की ईमानदार कोशिश की ज़रूरत है।

अंततः यह स्पष्ट होता है कि इस्तीफ़ों की यह राजनीति न तो नई है और न ही निष्कपट। यह एक सोची-समझी प्रक्रिया है, जिसमें भावनाओं, जातिगत पहचान और मीडिया कवरेज का इस्तेमाल कर भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को तैयार किया जाता है। आम जनता अगर इस जाल को नहीं समझेगी, तो हर कुछ समय बाद इसी तरह के तमाशे उसके सामने परोसे जाते रहेंगे। ज़रूरत इस बात की है कि लोग इन भावनात्मक प्रदर्शनों से आगे बढ़कर यह सवाल पूछें कि उनके जीवन की बुनियादी समस्याओं का समाधान कब और कैसे होगा। जब तक ये सवाल केंद्र में नहीं आएंगे, तब तक राजनीति का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा और जनता उसी में उलझी रहेगी।

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