spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeभारत2014 में कांग्रेस की हार के पीछे पांच अधिकार आधारित कानूनों की...

2014 में कांग्रेस की हार के पीछे पांच अधिकार आधारित कानूनों की भी रही अहम भूमिका

सूचना से रोजगार और शिक्षा से खाद्य सुरक्षा तक पांच बड़े फैसलों ने आम लोगों को अधिकार दिए, लेकिन 2014 में सत्ता परिवर्तन ने देश की आर्थिक और राजनीतिक दिशा बदल दी।

भारत।भारत वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता से विदाई को लेकर एक नया राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषण सामने आया है। इस विश्लेषण में दावा किया गया है कि कांग्रेस की हार को केवल चुनावी रणनीति, नेतृत्व की कमजोरी या राजनीतिक माहौल के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके कार्यकाल में बनाए गए उन अधिकार आधारित कानूनों को भी समझना जरूरी है, जिन्होंने देश के गरीब, मजदूर, ग्रामीण, आदिवासी, विद्यार्थी और कमजोर वर्गों को कानूनी अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किए। इस दृष्टिकोण के मुताबिक, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सूचना का अधिकार, ग्रामीण रोजगार की गारंटी, वन अधिकार, शिक्षा का अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे पांच महत्वपूर्ण कानून लागू किए थे। इन कानूनों ने शासन में पारदर्शिता बढ़ाने से लेकर गरीब परिवारों को रोजगार, बच्चों को शिक्षा, वनवासियों को अधिकार और जरूरतमंदों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने तक व्यापक प्रभाव डाला। इसी विश्लेषण में यह राजनीतिक दावा भी किया गया है कि इन अधिकार आधारित व्यवस्थाओं से बड़े कारोबारी और कॉर्पोरेट हितों के सामने जवाबदेही बढ़ी और आर्थिक नीतियों को लेकर एक अलग तरह की बहस पैदा हुई। 2014 के चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को विकास, सुशासन और ‘अच्छे दिन’ के प्रमुख चेहरे के तौर पर सामने लाया गया। भाजपा के चुनाव अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिला और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल करते हुए केंद्र की सत्ता अपने हाथ में ले ली। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर यह सवाल आज भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है कि 2014 का सत्ता परिवर्तन किन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से संभव हुआ।

तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल की नीतियों पर नजर डालें तो सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को सबसे महत्वपूर्ण अधिकार आधारित कानूनों में गिना जाता है। इस कानून ने आम नागरिक को सरकारी कामकाज और प्रशासन से जुड़ी सूचनाएं प्राप्त करने का कानूनी अधिकार दिया। इससे सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया गया तथा नागरिकों को यह अवसर मिला कि वे सार्वजनिक प्राधिकरणों से निर्धारित प्रक्रिया के तहत जानकारी मांग सकें। इसके बाद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा ग्रामीण भारत में रोजगार सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बना। इस व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को एक निश्चित अवधि तक मजदूरी आधारित रोजगार की कानूनी गारंटी उपलब्ध कराना था, जिससे गांवों में रहने वाले गरीब और मजदूर परिवारों को आय का सहारा मिल सके। तीसरे प्रमुख कानून के रूप में वन अधिकार अधिनियम 2006 सामने आया। इसके माध्यम से अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के कुछ वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की व्यवस्था की गई। लंबे समय से जंगलों और वन क्षेत्रों पर निर्भर समुदायों के लिए यह कानून उनके पारंपरिक अधिकारों को पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया। इन तीनों कानूनों का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई दिया और इन्होंने नागरिक अधिकार, ग्रामीण रोजगार तथा वन समुदायों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में लाने का काम किया।

अधिकार आधारित नीतियों की इसी श्रृंखला में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को शिक्षा का कानूनी अधिकार देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि निर्धारित आयु वर्ग के बच्चों को बुनियादी शिक्षा से वंचित न रहना पड़े। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने और स्कूलों तक उनकी पहुंच बढ़ाने की दिशा में इस कानून ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 ने देश की बड़ी आबादी के लिए सब्सिडी वाले खाद्यान्न की व्यवस्था को कानूनी अधिकार के ढांचे में रखा। इस कानून के तहत बड़ी संख्या में पात्र परिवारों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। करीब 67 प्रतिशत आबादी को इसके दायरे में लाने की बात कही गई थी। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली इससे पहले भी मौजूद थी। अंतर यह था कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था को व्यापक कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित किया। इन पांच कानूनों को एक साथ देखा जाए तो सूचना, रोजगार, जमीन और वन अधिकार, शिक्षा तथा भोजन जैसे बुनियादी मुद्दों को कानूनी संरक्षण देने की तत्कालीन नीति स्पष्ट दिखाई देती है। इसी आधार पर यह राजनीतिक तर्क दिया जाता रहा है कि कांग्रेस सरकार का जोर कल्याणकारी और अधिकार आधारित शासन पर था।

भारतीय राजनीति में आर्थिक नीतियों के पुराने संदर्भों को देखें तो इंदिरा गांधी के कार्यकाल का भी उल्लेख किया जाता है। इंदिरा गांधी की सरकार ने वर्ष 1969 में प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण का बड़ा फैसला लिया था। इसके पीछे बैंकिंग क्षेत्र को व्यापक सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप इस्तेमाल करने तथा बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करने की नीति प्रमुख थी। बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में बैंकिंग पहुंच बढ़ाने तथा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराने की दिशा में बदलाव आया। इसी ऐतिहासिक संदर्भ को कांग्रेस की आर्थिक सोच से जोड़ते हुए यह तर्क दिया जाता है कि पार्टी की राजनीति में सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी हस्तक्षेप की भूमिका लंबे समय तक महत्वपूर्ण रही। बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने भी अधिकार आधारित कानूनों को आगे बढ़ाया। मनमोहन सिंह की सरकार के समय सूचना का अधिकार, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, वन अधिकार और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा जैसे कानूनों को लागू किया गया। मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली अपेक्षाकृत शांत और नीतिगत मानी जाती थी, लेकिन उनके कार्यकाल में कई ऐसे महत्वपूर्ण विधायी कदम उठे जिनका सीधा संबंध सामाजिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों से था। इस कारण कांग्रेस के शासन मॉडल को लेकर समर्थकों की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक विकास के साथ सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों के अधिकारों को भी समान महत्व दिया गया।

दूसरी ओर, देश में बढ़ती आर्थिक असमानता को लेकर भी राजनीतिक बहस लगातार तेज होती रही है। संपत्ति के वितरण को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों और अध्ययनों में भारत में आर्थिक असमानता की गंभीर तस्वीर सामने आती रही है, हालांकि किसी एक आंकड़े के आधार पर पूरे देश की संपत्ति संरचना का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। राजनीतिक विमर्श में यह दावा किया जाता है कि देश की बड़ी मात्रा में संपत्ति समाज के बेहद सीमित और संपन्न वर्ग के हाथों में केंद्रित है। इसी आधार पर सवाल उठाया जाता है कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ आम जनता तक कितना पहुंच रहा है। आलोचक यह आरोप लगाते रहे हैं कि बड़े कारोबारी समूहों का आर्थिक और नीतिगत प्रभाव बढ़ा है, जबकि दूसरी ओर सरकारें विकास और निवेश को बढ़ावा देने के लिए बड़े उद्योगों को सुविधाएं देने की नीति अपनाती हैं। इसके समर्थकों का तर्क है कि बड़े निवेश से रोजगार, बुनियादी ढांचा और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। यही वह बिंदु है जहां भारतीय राजनीति में विकास मॉडल को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। एक पक्ष तेज आर्थिक विकास और निवेश को प्राथमिकता देता है, जबकि दूसरा पक्ष विकास के साथ संपत्ति के समान वितरण, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों के अधिकारों पर अधिक जोर देता है। कांग्रेस की नीतियों को इसी दूसरे दृष्टिकोण से जोड़कर देखा जाता है।

2014 के लोकसभा चुनाव की परिस्थितियों को समझना भी इस पूरी बहस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उस समय कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप, महंगाई, आर्थिक सुस्ती, रोजगार से जुड़े सवाल और शासन को लेकर असंतोष जैसे मुद्दे विपक्ष के प्रमुख हथियार बने हुए थे। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विकास, रोजगार, सुशासन और परिवर्तन के मजबूत राजनीतिक संदेश के साथ चुनाव अभियान चलाया। ‘अच्छे दिन’ का नारा आम मतदाताओं के बीच व्यापक रूप से पहुंचा और नरेंद्र मोदी को एक निर्णायक तथा मजबूत नेतृत्व के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी दौरान बड़े उद्योग जगत के एक हिस्से द्वारा नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन और उनके नेतृत्व में आर्थिक विकास की उम्मीदें भी सार्वजनिक चर्चा का विषय बनीं। चुनाव परिणाम में भाजपा ने 282 लोकसभा सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जबकि कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई। इस परिणाम ने भारतीय राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल दी। कांग्रेस की हार को लेकर बाद में अनेक विश्लेषण सामने आए, जिनमें नेतृत्व, भ्रष्टाचार के आरोप, महंगाई, संगठनात्मक कमजोरी, चुनावी रणनीति और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सहित कई कारण गिनाए गए। ऐसे में केवल पांच कानूनों को कांग्रेस की हार का एकमात्र कारण मानना राजनीतिक रूप से एक पक्षीय निष्कर्ष होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अधिकार आधारित कानून कांग्रेस सरकार की नीतिगत पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके थे।

इन पांच कानूनों की राजनीतिक विरासत को लेकर बहस आज भी जारी है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 ने नागरिकों को सरकारी सूचनाओं तक पहुंच का माध्यम दिया, मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार की कानूनी गारंटी उपलब्ध कराई, वन अधिकार अधिनियम 2006 ने वनवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने की व्यवस्था की, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 ने बच्चों की शिक्षा को कानूनी अधिकार का स्वरूप दिया और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 ने बड़ी आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा को अधिकार आधारित ढांचे में रखा। इन कानूनों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद जरूर रहे, लेकिन इनके सामाजिक प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस समर्थक इन्हें अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि आलोचक इनके क्रियान्वयन, वित्तीय बोझ और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थक आर्थिक सुधार, निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी नीतियों को विकास का आधार बताते हैं। यही वैचारिक अंतर आने वाले समय की राजनीति में भी महत्वपूर्ण रहने वाला है। सवाल अब केवल यह नहीं है कि कौन सी पार्टी सत्ता में आती है, बल्कि यह भी है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक किस तरह पहुंचाया जाए और आर्थिक शक्ति के बढ़ते केंद्रीकरण के बीच सामाजिक न्याय और समान अवसर कैसे सुनिश्चित किए जाएं।

2014 की सत्ता परिवर्तन की कहानी इसलिए आज भी राजनीतिक बहस में प्रासंगिक बनी हुई है, क्योंकि यह केवल एक सरकार के जाने और दूसरी सरकार के आने की घटना नहीं थी, बल्कि देश की नीतिगत दिशा में बड़े बदलाव का संकेत भी थी। कांग्रेस के दौर में लागू किए गए अधिकार आधारित कानूनों ने आम नागरिक को सूचना, रोजगार, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और वन अधिकार जैसे क्षेत्रों में कानूनी आधार देने का प्रयास किया। वहीं 2014 के बाद केंद्र की राजनीति में आर्थिक विकास, निवेश, बुनियादी ढांचा और कारोबारी सुगमता को अधिक प्रमुखता देने वाली नीतियां सामने आईं। दोनों दृष्टिकोणों के बीच बहस आज भी जारी है। एक तरफ यह सवाल है कि गरीब और कमजोर वर्गों को अधिकार आधारित कानूनों से कितना वास्तविक लाभ मिला, तो दूसरी ओर यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि तेज आर्थिक विकास का फायदा समाज के निचले तबके तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा। कांग्रेस की 2014 की हार को केवल इन पांच कानूनों के कारण हुई पराजय बताना तथ्यों की दृष्टि से पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि चुनाव परिणाम कई राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारकों से प्रभावित होते हैं। फिर भी इन कानूनों को कांग्रेस की नीतिगत पहचान और उसके शासन मॉडल के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में देखा जा सकता है। यही वजह है कि आज भी 2014 के चुनाव की चर्चा होते ही अधिकार आधारित कानूनों, आर्थिक असमानता और विकास मॉडल को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो जाती है।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!