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हिमालय में ग्लेशियरों का बढ़ता कहर अब जीएलओएफ से तबाही का नया खतरा मंडरा रहा

केदारनाथ, धराली और नेपाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता, पिघलती बर्फ से बन रही झीलें बन सकती हैं विनाशकारी बाढ़ का कारण, संवेदनशील क्षेत्रों में सख्त नियम और सुरक्षित पुनर्वास जरूरी।

देहरादून(सुनील कोठारी) नेपाल में हालिया घटनाक्रम ने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। इससे पहले केदारनाथ, धराली और नीति वैली जैसे क्षेत्रों में सामने आई विनाशकारी घटनाओं ने भी यह संकेत दिया था कि पर्वतीय इलाकों में आपदाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब तक अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, फ्लैश फ्लड और एवलांच जैसी प्राकृतिक घटनाओं को लेकर आपदा प्रबंधन की रणनीतियां तैयार की जाती रही हैं, लेकिन बदलती हिमालयी परिस्थितियों के बीच ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ एक नई और बेहद गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। साधारण भाषा में इसे ग्लेशियर से जुड़ी झील के अचानक फटने के बाद आने वाली विनाशकारी बाढ़ कहा जा सकता है। हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में रहने या वहां जाने का अनुभव नहीं रखने वाले लोगों के लिए इस खतरे की गंभीरता को समझना आसान नहीं है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर और उनके ऊपर बनने वाली झीलें सामान्य नजर से जितनी शांत दिखाई देती हैं, उनके भीतर भविष्य की बड़ी तबाही की परिस्थितियां छिपी हो सकती हैं। यही वजह है कि अब हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था के साथ ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाले खतरे को भी प्राथमिकता के साथ शामिल करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि का असर हिमालय के ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है और कई स्थानों पर बर्फ के भीतर अथवा उसकी सतह पर पानी जमा होने लगता है। शुरुआत में यह पानी छोटे-छोटे गड्ढों के रूप में दिखाई देता है, लेकिन समय के साथ यही गड्ढे बड़े जलाशयों का रूप ले सकते हैं। जो लोग गौमुख से आगे तपोवन अथवा एवरेस्ट बेसकैंप जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों की यात्रा कर चुके हैं, उन्होंने ग्लेशियरों की बर्फ पर छोटे-छोटे जलभराव वाले हिस्से जरूर देखे होंगे। बर्फीली सतह पर बने ये पानी के गड्ढे देखने में सामान्य लग सकते हैं, लेकिन इनके आसपास मौजूद बर्फ पर तापमान और पानी के बीच लगातार होने वाली प्रक्रिया ग्लेशियर की संरचना को प्रभावित कर सकती है। पानी के कारण आसपास की बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है और गड्ढे का आकार बढ़ता जाता है। वर्षों तक यही प्रक्रिया चलती रहे तो छोटी जलराशि एक बड़ी झील में बदल सकती है। हिमालयी क्षेत्र में ऐसी कई ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनका आकार काफी बड़ा हो चुका है। इसलिए ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को केवल बर्फ के कम होने तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उससे बनने वाली झीलों और उनके भविष्य के खतरे का भी लगातार आकलन करना जरूरी है।

दरअसल, ग्लेशियर केवल बर्फ का विशाल ढेर नहीं होते, बल्कि उनमें बर्फ के साथ मिट्टी, चट्टान और अन्य मलबा भी शामिल रहता है। यही प्राकृतिक संरचना कई बार ग्लेशियल झील के पानी को रोकने का काम करती है। लेकिन इस तरह बनी प्राकृतिक रोक हमेशा स्थायी और पूरी तरह सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। लगातार बढ़ते पानी का दबाव, बर्फ के कमजोर होने की प्रक्रिया, तापमान में बदलाव और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियां किसी समय इस प्राकृतिक अवरोध को कमजोर कर सकती हैं। ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ों की अनुपस्थिति भी परिस्थितियों को अलग बनाती है, क्योंकि वहां वनस्पति की वह मजबूत पकड़ नहीं होती जो निचले इलाकों में मिट्टी और ढलान को स्थिर रखने में मदद करती है। यदि किसी ग्लेशियल झील को रोकने वाला हिस्सा अचानक टूट जाए तो जमा हुआ पानी बहुत कम समय में बाहर निकल सकता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ढलान अत्यधिक तीखा होने के कारण पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है। रास्ते में आने वाली मिट्टी, पत्थर, चट्टान और अन्य मलबा भी इस तेज बहाव के साथ जुड़ता जाता है। परिणामस्वरूप सामान्य पानी का प्रवाह एक भारी और अत्यधिक विनाशकारी मलबे वाले प्रवाह में बदल सकता है, जिसकी मारक क्षमता सामान्य बाढ़ से कहीं अधिक हो सकती है।

आपदा की असली भयावहता उस समय सामने आती है, जब यह तेज बहाव ऊंचाई वाले निर्जन क्षेत्र से निकलकर आबादी वाले हिस्सों की तरफ बढ़ता है। पहाड़ों में ऊपर की ओर ढलान जितना अधिक होता है, पानी और मलबे की गति उतनी ही तीव्र हो सकती है। नीचे आते-आते जब ढलान कम होता है तो प्रवाह की रफ्तार घटती है, लेकिन तब तक रास्ते में आने वाली संरचनाओं, सड़कों, पुलों, खेतों और बस्तियों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। प्राकृतिक दृष्टि से देखें तो ग्लेशियरों का टूटना, झीलों का बनना और पानी का बहाव कोई बिल्कुल नई प्रक्रिया नहीं है। हिमालय जैसे युवा पर्वतीय क्षेत्र में भूगर्भीय और प्राकृतिक बदलाव हजारों-लाखों वर्षों से होते रहे हैं। समस्या तब गंभीर बनती है जब मानव बस्तियां ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में विकसित हो जाती हैं जहां प्राकृतिक आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकलने का अवसर बहुत कम रहता है। यही कारण है कि नदी किनारे शुरू हुई छोटी-छोटी मानवीय गतिविधियां धीरे-धीरे स्थायी गांव, बाजार, होटल, ढाबे और कस्बों में बदल जाती हैं। जिस स्थान को लोग पहले खेती, व्यापार या यात्रा के लिए उपयोग करते हैं, समय के साथ वहीं स्थायी निर्माण खड़े होने लगते हैं। आपदा के समय यही बसावट सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

केदारनाथ की त्रासदी को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। गौरीकुंड से आगे लंबे हिस्से में स्थायी आबादी सीमित रही, लेकिन तीर्थयात्रा बढ़ने के साथ यात्रा मार्ग के आसपास रामबाड़ा जैसे स्थानों पर होटल, दुकानें, ठहरने की व्यवस्था और अन्य गतिविधियां विकसित होती गईं। नदी और जलधाराओं के बेहद करीब बनी ऐसी बसावट प्राकृतिक जोखिम के सामने बेहद संवेदनशील साबित हुई। स्वयं केदारनाथ में भी बड़ी संख्या में निर्माण और लोगों की मौजूदगी ने आपदा के समय खतरे को बढ़ाया। आपदा के बाद पुनर्निर्माण के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर काफी ध्यान दिया गया, लेकिन भविष्य में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि क्या अत्यधिक संवेदनशील ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थायी या लंबी अवधि की बसावट को सीमित करना अधिक सुरक्षित विकल्प नहीं होगा। इसी तरह धराली का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। मुख्य धराली गांव अपेक्षाकृत ऊंचाई पर स्थित है, जबकि नीचे के क्षेत्रों में लोगों की जमीन और खेती से जुड़ी गतिविधियां थीं। यात्रा मार्ग नीचे से गुजरने और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने के साथ वहां होटल, ढाबे तथा दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां विकसित हुईं। जब विनाशकारी आपदा आई तो नीचे की बसावट को भारी नुकसान पहुंचा, जबकि ऊंचाई पर स्थित मुख्य गांव अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा। यह अंतर बताता है कि पर्वतीय क्षेत्रों में स्थान का चयन केवल सुविधा और कारोबार के आधार पर नहीं, बल्कि संभावित प्राकृतिक खतरे को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

नेपाल की हालिया घटना भी इसी व्यापक सवाल को सामने लाती है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण किस स्थान पर होना चाहिए। जब किसी क्षेत्र में घर पूरी तरह बह जाते हैं और उनकी जगह पर एक-दो मंजिल तक मलबा जमा हो जाता है, तब केवल पुराने स्थान पर सड़क, मकान और दूसरी सुविधाएं फिर से खड़ी कर देना भविष्य के खतरे को समाप्त नहीं करता। प्रभावित लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना जीवन दोबारा शुरू करना होती है। उनके घर, दुकानें, रोजगार और आजीविका के साधन समाप्त हो जाते हैं। प्रशासन के सामने भी बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की कठिन जिम्मेदारी होती है। लेकिन यदि आपदा के बाद लोगों को अपेक्षाकृत सुरक्षित ऊंचाई वाले स्थानों पर बसाने की योजना बनाई जाए तो लंबे समय में जोखिम कम किया जा सकता है। विस्थापन आसान नहीं होता और नई जगह पर रोजगार तथा जीवन-यापन की व्यवस्था करना भी चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में आपदा, बांध निर्माण या सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण बड़े पैमाने पर पुनर्वास किया गया है। टिहरी बांध के निर्माण के बाद नई टिहरी बसाई गई और अनेक प्रभावित परिवारों को देहरादून तथा ऋषिकेश सहित अन्य स्थानों पर पुनर्वासित किया गया। इसी तरह मिजोरम में उग्रवाद के दौर में लोगों को संवेदनशील इलाकों से हटाकर सुरक्षित क्षेत्रों में बसाने की प्रक्रिया अपनाई गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि कठिन परिस्थितियों में योजनाबद्ध पुनर्वास संभव है, बशर्ते प्रशासनिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टि मौजूद हो।

सबसे बड़ा प्रश्न अब यह है कि क्या आपदा के बाद केवल राहत और पुनर्निर्माण पर ध्यान दिया जाए या उससे पहले ही जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर मानव गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो जहां जमीन उपलब्ध होती है, वहां कब्जे और निर्माण की कोशिशें होती रहती हैं। स्थानीय जरूरतें, रोजगार और पर्यटन इस दबाव को और बढ़ाते हैं। ऐसे में केवल लोगों से अपेक्षा करना कि वे संवेदनशील इलाकों में निर्माण नहीं करेंगे, पर्याप्त नहीं होगा। प्रशासन को स्पष्ट और कठोर नियम बनाने होंगे। धराली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नदी, जलधारा और संभावित फ्लैश फ्लड मार्ग के आसपास निश्चित दूरी तक किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण ही नहीं, बल्कि अस्थायी ढाबे और व्यावसायिक ढांचे भी प्रतिबंधित किए जा सकते हैं। केदारनाथ में भी आपदा के बाद पुनर्विचार का आधार यही होना चाहिए कि धार्मिक आस्था और पर्यटन की आवश्यकता पूरी हो, लेकिन अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र में मानव दबाव न्यूनतम रहे। मंदिर को केंद्र में रखते हुए नीचे अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थानों पर यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था की जा सकती है और दर्शन के बाद लोगों को वापस लौटने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। श्रीखंड महादेव, किन्नर कैलाश, हेमकुंड साहिब और आदि कैलाश जैसे कठिन पर्वतीय धार्मिक स्थलों की यात्राओं में भी सीमित समय के प्रवास और नियंत्रित आवाजाही का मॉडल कई मामलों में जोखिम घटाने में मदद कर सकता है।

इसी संदर्भ में घोड़े, खच्चर, कंडी और हेलीकॉप्टर आधारित भारी यातायात को लेकर भी व्यापक चर्चा की जरूरत है। ऊंचाई वाले संवेदनशील क्षेत्रों में जितनी अधिक मानवीय गतिविधियां और आवाजाही होगी, उतना ही दबाव प्राकृतिक संसाधनों तथा स्थानीय भूगोल पर पड़ेगा। यदि भविष्य में केदारनाथ में रोपवे जैसी व्यवस्था विकसित होती है तो इसके पर्यावरणीय और भौगोलिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक होगा, लेकिन नियंत्रित यातायात के दृष्टिकोण से रोपवे कुछ परिस्थितियों में वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान कर सकता है। एक संभावित मॉडल यह हो सकता है कि श्रद्धालु रोपवे से ऊपर जाएं, सीमित समय में दर्शन करें और उसी दिन सुरक्षित क्षेत्र में वापस लौट आएं। गुलमर्ग जैसे पर्यटन स्थलों पर नियंत्रित ऊंचाई वाले परिवहन मॉडल का उदाहरण इस दिशा में चर्चा का आधार बन सकता है। इसका उद्देश्य धार्मिक आस्था या पर्यटन को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि लोगों की सुविधा के नाम पर ऐसी स्थायी बसावट न विकसित हो जाए जो भविष्य की प्राकृतिक आपदा को मानव त्रासदी में बदल दे। हिमालय में ग्लेशियरों की मौजूदगी के कारण जोखिम कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। आज खतरा न आए तो इसका अर्थ यह नहीं कि कल भी नहीं आएगा। कोई घटना अगले वर्ष हो सकती है, कई दशकों बाद हो सकती है या उससे भी लंबे समय बाद, लेकिन संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नेपाल में एवरेस्ट बेसकैंप के आसपास गोक्यो क्षेत्र की तस्वीरें इस बदलती हिमालयी वास्तविकता को समझने का एक महत्वपूर्ण दृश्य उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। ग्लेशियरों के ऊपर मिट्टी, पत्थरों और पानी से जुड़ी कई झीलें दिखाई देती हैं। ऐसी तस्वीर यदि लगभग एक दशक पुरानी है तो इस बीच इन जलस्रोतों और ग्लेशियरों का आकार, स्वरूप तथा आसपास की परिस्थितियां बदल चुकी होंगी। यही बदलाव लगातार निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करता है। केवल किसी ग्लेशियल झील की एक बार तस्वीर लेना या उसका आकार दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं है। समय-समय पर उसके विस्तार, पानी की मात्रा, आसपास की बर्फ, प्राकृतिक अवरोधों और नीचे की ओर स्थित आबादी का अध्ययन करना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील बस्तियों की मैपिंग, सुरक्षित निकासी मार्ग, नियमित निगरानी और जोखिम आधारित निर्माण नीति को आपदा प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। अब समय आ गया है कि आपदा प्रबंधन की किताब में केवल अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना और एवलांच तक सीमित अध्याय न हों, बल्कि जीएलओएफ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड को भी उतनी ही गंभीरता से शामिल किया जाए। क्योंकि हिमालय की ऊंचाइयों पर बन रही झीलें भले ही आज दूर और शांत दिखाई दें, लेकिन उनके भीतर छिपी संभावित ऊर्जा नीचे बसे इलाकों के लिए आने वाले समय की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन सकती है।

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