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भारत की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में कॉरपोरेट नियंत्रण, महंगाई और संप्रभुता पर गहराता रणनीतिक संकट उजागर

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारत जब भी अपनी संप्रभुता और विदेश नीति का ढिंढोरा पीटता है, तो टीवी चैनलों पर बैठे विश्लेषक इसे देश की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत करार देने लगते हैं। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने और अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने की कहानियों को इस तरह परोसा जाता है मानो देश ने आत्मनिर्भरता का शिखर छू लिया हो। लेकिन हकीकत के पन्नों को पलटने पर एक ऐसा स्याह सच सामने आता है, जो इन तमाम दावों को एक झटके में खारिज कर देता है। कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया यानी सीसीआई की वर्ष 2024 की केस फाइल नंबर छह और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की इंफ्रास्ट्रक्चर रिपोर्ट के खुफिया आंकड़ों को यदि एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो एक बेहद खौफनाक और सोची-समझी क्रोनोलॉजी का पर्दाफाश होता है। यह दस्तावेज़ इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि आम भारतीय नागरिक जिस महंगाई की मार से त्रस्त है, वह दरअसल कोई वैश्विक मंदी या सरकारी टैक्स का नतीजा नहीं है। असलियत में भारत की भोली-भाली जनता समंदर के रणनीतिक रास्तों और बंदरगाहों को बंधक बनाकर बैठे एक शक्तिशाली कॉरपोरेट सिंडिकेट को गुपचुप तरीके से फिरौती दे रही है। बाजार में मिलने वाली रोज़मर्रा की चीज़ें जैसे खाद्य तेल और जीवन रक्षक दवाएं आज इसलिए महंगी नहीं हैं कि उनके उत्पादन की लागत बढ़ गई है, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि लॉजिस्टिक्स और टर्मिनल हैंडलिंग के नाम पर एक ऐसा ‘प्राइवेट टैक्स’ वसूला जा रहा है जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। देश के तकरीबन 45 प्रतिशत से अधिक कंटेनर ट्रैफिक को अपनी मुट्ठी में भींचने वाले चंद कॉरपोरेट्स ने भारत की संप्रभुता को एक भ्रम में तब्दील कर दिया है।

इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें उस आर्थिक जाल की गहराई में उतरना होगा जिसे अर्थशास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली में वर्टिकल इंटीग्रेशन कहा जाता है। वर्ष 2026 के सबसे ताजा और प्रामाणिक वित्तीय आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश के बंदरगाह क्षेत्र में अडानी पोर्ट्स एंड एसजेड की केस स्टडी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़े तस्दीक करते हैं कि यह विशिष्ट कंपनी अकेले ही 450 मिलियन मेट्रिक टन कार्गो संभालने का विशालकाय आंकड़ा पार कर चुकी है। आज की तारीख में समूचे भारत के कुल समुद्री कार्गो ट्रैफिक का लगभग 27.5 प्रतिशत और कंटेनर ट्रैफिक का 45 फीसदी से ज्यादा हिस्सा केवल इसी एक सिंडिकेट के नियंत्रण में सिमट चुका है। यह कोई आकस्मिक संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित व्यापारिक चक्रव्यूह है, जिसके तहत विदेशों में मौजूद कोयले की खदानें भी इसी सिंडिकेट की हैं और उस कोयले को भारत लाने वाले समुद्री जहाज भी इन्हीं के हैं। जब ये जहाज मुंद्रा या गोपालपुर जैसे रणनीतिक बंदरगाहों पर लंगर डालते हैं, तो वे टर्मिनल भी इसी समूह के होते हैं और वहां से जिस रेलवे ट्रैक के जरिए माल देश के आंतरिक हिस्सों और वेयरहाउस तक पहुंचता है, उसकी चाबी भी इसी सिंडिकेट के पास होती है। भारत के महान रणनीतिकार के एम पलिककर ने अपनी कालजयी पुस्तक ‘इंडिया एंड द इंडियन ओशियन’ में बहुत पहले ही आगाह कर दिया था कि जो कोई भी हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित करेगा, वह भारत की स्वाधीनता का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखेगा। भारत ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लोकलुभावन नारे के तहत अपनी लाइफलाइन यानी सप्लाई चेन का निजीकरण करके दरअसल बुनियादी ढांचा नहीं बेचा, बल्कि देश की रणनीतिक सौदेबाजी की क्षमता का ही सौदा कर दिया।

यह ब्लैकमेल अर्थशास्त्र संकट के दौर में देश की संप्रभु सरकार को घुटनों पर लाने की पूरी ताकत रखता है, जिसका प्रामाणिक सबूत कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया यानी सीसीआई की फाइलों में दर्ज है। सीसीआई की वर्ष 2024 की केस फाइल नंबर छह को खंगालने पर पता चलता है कि विशाखापटनम पोर्ट पर कोल्ड स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में एक निजी ऑपरेटर ने अपने एकाधिकार का घिनौना प्रदर्शन किया था। इस ऑपरेटर ने वेंडर्स को मनमाने लॉक-इन पीरियड के समझौतों पर दस्तखत करने के लिए विवश किया और मांगें न मानने पर बिजली सप्लाई काटने जैसी खुलेआम धमकियां दीं। इसी तरह एन्नोर पोर्ट कामराजार पर भी टर्मिनल हैंडलिंग चार्जेस को अचानक 180 रुपये से बढ़ाकर सीधा 300 रुपये कर दिया गया, जिसके बाद सीसीआई को इस जबरन वसूली की जांच बैठानी पड़ी। वर्ष 2024 से 2026 के बीच जब होरमुज जलडमरूमध्य और रेड सी क्राइसिस के कारण मिडिल ईस्ट में भारी तनाव फैला और विदेशी जहाजों ने अपने रास्ते बदले, तब भारत सरकार असहाय मूकदर्शक बनी रही क्योंकि देश के पास अपनी कोई वैश्विक शिपिंग फ्लीट नहीं थी। निजी शिपिंग लाइसेंसधारकों और पोर्ट टर्मिनलों ने इस अप्रत्याशित वैश्विक परिस्थिति का फायदा उठाते हुए ‘फोर्स मेज्योर’ क्लॉज का सहारा लिया और मनमाना माल भाड़ा वसूलना शुरू कर दिया। भारतीय निर्यातकों का अरबों रुपये का सामान बंदरगाहों पर सड़ता रहा और जब सरकार से गुहार लगाई गई तो व्यवस्था ने बड़ी बेरहमी से जवाब दिया कि यह बाजार द्वारा निर्धारित दरें हैं। यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि संकट भले ही विदेशी हो, लेकिन उसका खामियाजा भारत के आम आदमी को कमरतोड़ महंगाई के रूप में भुगतना पड़ता है।

इस समूचे सिंडिकेट के वित्तीय तंत्र को खंगालने पर तीन बड़े खतरे उभरकर सामने आते हैं जिन्हें शैडो लॉजिस्टिक्स, सॉवरेन रिस्क और सिस्टमिक लीकेज कहा जा सकता है। इस निजी सिंडिकेट ने देश के भीतर 650 मिलियन टन की विशालकाय पोर्ट कैपेसिटी खड़ी करने के लिए भारतीय बैंकों से कर्ज लेने के बजाय वॉलस्ट्रीट और मिडिल ईस्ट के संप्रभु वेल्थ फंड्स से अरबों डॉलर के ‘डॉलर डिनॉमिनेटेड बॉन्ड्स’ जारी करवाए। इस खतरनाक मैकेनिज्म का सबसे बड़ा दोष यह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया कमजोर होता है, तो इन निजी कंपनियों पर विदेशी कर्ज का बोझ रातों-रात हजारों करोड़ रुपये बढ़ जाता है। इस भारी-भरकम नुकसान की भरपाई ये कॉरपोरेट्स अपनी जेब से नहीं करते, बल्कि बंदरगाहों पर टर्मिनल हैंडलिंग चार्जेस यानी टीएचसी में बेतहाशा बढ़ोतरी करके आम जनता की जेब पर डाका डालते हैं। कर्ज विदेशी सिंडिकेट लेता है, लेकिन उसकी किस्तें चुकाने के लिए भारत के गरीब और मध्यम वर्ग के साबुन, तेल और दवाएं महंगी हो जाती हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने हाल ही में बुनियादी ढांचे के इस खतरनाक एकाधिकार पर देश को चेतावनी देते हुए स्पष्ट कहा था कि जब पूंजी और इंफ्रास्ट्रक्चर का अत्यधिक संकेंद्रण कुछ ही कॉरपोरेट्स के हाथों में सिमट जाता है, तो वे न केवल बाजार की कीमतें तय करते हैं बल्कि संप्रभु सरकार की राष्ट्रीय नीतियों को भी डिक्टेट करने की हैसियत में आ जाते हैं।

इस कड़वी सच्चाई का एक और भयावह पहलू देश की ऊर्जा सुरक्षा और स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी एसपीआर से जुड़ा हुआ है, जिस पर सरकारी आंकड़े हमेशा पर्दा डालते आए हैं। यदि भविष्य में ताइवान जलडमरूमध्य या मिडिल ईस्ट में दोबारा युद्ध जैसी स्थितियां भड़कती हैं, तो भारत का रणनीतिक तेल भंडार कितने दिनों तक देश का साथ देगा, इसका वास्तविक उत्तर किसी के पास नहीं है। रियलिटी यह है कि देश का अधिकांश कच्चा तेल और रिफाइनिंग क्षमता सरकारी उपक्रमों के बजाय निजी रिफाइनरियों और दिग्गजों के नियंत्रण में है। संकट के समय ये निजी रिफाइनरियां देशहित में अपनी व्यावसायिक प्राथमिकताओं का त्याग करके कभी भी सस्ते दामों पर ईंधन की आपूर्ति नहीं करेंगी। इसके विपरीत, सरकार को अपनी साख बचाने के लिए इन्हीं निजी ऑपरेटरों को हजारों करोड़ रुपये का बेलआउट पैकेज या भारी सब्सिडी देनी होगी, जो सीधे तौर पर देश के खजाने की सिस्टमिक लीकेज है। हालिया ऑयल क्राइसिस के दौरान भी यही खेल खेला गया जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद भारत के घरेलू बाजार में कीमतें नहीं घटीं, क्योंकि इस ब्लैकमेल इकॉनमी के कर्णधारों ने सारा मुनाफा अपनी तिजोरियों में बंद कर लिया और जनता को राहत का एक पैसा भी ट्रांसफर नहीं होने दिया।

हालांकि, इस क्रोनी कैपिटलिज्म और निजीकरण की वकालत करने वाले बुद्धिजीवी और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगड़िया जैसे विशेषज्ञ हमेशा एक अलग ही दलील पेश करते हैं। अरविंद पनगड़िया का मानना है कि सरकार का काम व्यापार करना बिल्कुल नहीं है और जब देश के बंदरगाह सरकारी नियंत्रण में थे, तब वहां लालफीताशाही यानी रेड टेपिज्म का बोलबाला था और जहाजों को खाली होने में हफ्तों लग जाते थे। उनके मुताबिक, निजी क्षेत्र के आने से आज बंदरगाहों का टर्न अराउंड टाइम घटकर 24 घंटे से भी कम रह गया है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसी नोमुरा की 2026 की ताजा रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के निजी पोर्ट्स का इबिड मार्जिन 60 प्रतिशत को पार कर चुका है, जो पूरी दुनिया में सबसे आकर्षक और बेहतरीन माना जाता है। लेकिन एफिशिएंसी और मुनाफे का यह चमकदार आंकड़ा अपने पीछे एक बेहद अनपेक्षित और आत्मघाती परिणाम को छुपाए हुए है। कुशलता और कार्यक्षमता केवल शांति के दिनों में ही देश का भला कर सकती हैं, लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल आता है, तो देश एफिशिएंसी से नहीं बल्कि रेजिलिएंस यानी संकट झेलने के लचीलेपन से चलते हैं। जब एक संप्रभु राष्ट्र अपनी पूरी जीवन रेखा और सप्लाई चेन को मात्र तीन या चार मेगापोर्ट्स पर निर्भर कर देता है, तो वह अनजाने में खुद को एक बहुत बड़े सॉवरेन रिस्क यानी संप्रभु खतरे के मुहाने पर धकेल देता है।

कहानी सिर्फ बंदरगाहों के भौतिक नियंत्रण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसमें डिजिटल सर्विलांस और ‘मास्टर स्विच’ का एक नया और घातक अध्याय जुड़ चुका है। वर्ष 2026 की शुरुआत में भारत के सबसे बड़े निजी पोर्ट ऑपरेटर ने कैलरीस नाम की एक बेहद संदेहास्पद विदेशी टेक कंपनी के साथ लगभग 100 मिलियन डॉलर यानी 830 करोड़ रुपये का एक गुप्त ऑटोमेशन एग्रीमेंट साइन किया। इस सौदे का मुख्य उद्देश्य बिना किसी नई जमीन का अधिग्रहण किए, विशुद्ध रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड सॉफ्टवेयर के दम पर 91 मिलियन मेट्रिक टन की अतिरिक्त परिचालन क्षमता पैदा करना है। तकनीकी भाषा में इसे टर्मिनल ऑपरेटिंग सिस्टम यानी टीओएस कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि भारत का पूरा लॉजिस्टिक्स ढांचा अब इंसानों से नहीं बल्कि विदेशी एआई और क्लाउड सर्वर्स से संचालित हो रहा है। भारतीय सेना का कौन सा रडार किस कंटेनर में बंद होकर किस पोर्ट से गुजर रहा है, या देश के किस संवेदनशील हिस्से में कल कोयले या ईंधन की भारी किल्लत होने वाली है, यह सारा क्रिटिकल डेटा इन विदेशी ऑपरेटिंग सिस्टम्स और निजी डेटा सेंटर्स में रियल-टाइम फीड हो रहा है। जब देश की संप्रभु सरकार के पास अपने ही क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के डेटा का कोई नियंत्रण नहीं बचेगा, तो वह किसी भी आगामी डिजिटल युद्ध में असहाय हो जाएगी क्योंकि आने वाले समय में लड़ाइयां मिसाइलों से नहीं, बल्कि इन चोक पॉइंट्स के डिजिटल मास्टर स्विच को बंद करके लड़ी जाएंगी। यह ब्लैकमेल इकॉनमी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ऐसा टाइम बम है, जिसे समय रहते निष्क्रिय नहीं किया गया तो देश की आजादी सिर्फ एक कागजी छलावा बनकर रह जाएगी।

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