भारत(सुनील कोठारी)। आधुनिकता की चकाचौंध और उपभोक्तावादी संस्कृति के अंधाधुंध प्रभाव ने आज हमारे समाज के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। कभी भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली संचय की आदत अब इतिहास के पन्नों में दफन होने की कगार पर पहुंच चुकी है। पिछली आधी सदी के दौरान हमारे पुरखों ने जिस त्याग, अनुशासन और संयम से एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच तैयार किया था, उसे आज के आधुनिक दौर की बेलगाम और अनियंत्रित जीवनशैली ने महज एक दशक के भीतर ही पूरी तरह से मटियामेट कर दिया है। बाजार के नए नियंताओं ने आम नागरिकों की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का ऐसा सटीक और गहरा फायदा उठाया है कि लोग अब भविष्य की सुरक्षा को पूरी तरह भुलाकर केवल वर्तमान के क्षणिक सुखों को भोगने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं। यही कारण है कि आज देश का मध्यमवर्ग एक ऐसे अदृश्य और खतरनाक भंवर में फंसता चला जा रहा है, जहां से बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता है।
अगर हम देश के आर्थिक इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो एक बेहद चौंकाने वाला और आंखें खोलने वाला सच हमारे सामने उजागर होता है। साल एक हज़ार नौ सौ नब्बे के उस दौर में, जब देश गंभीर आर्थिक बदलावों के दौर से गुजर रहा था, तब भारतीय परिवारों की कुल वित्तीय बचत देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का लगभग बारह प्रतिशत हुआ करती थी। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं था, बल्कि यह देश के करोड़ों परिवारों की आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्थिरता का एक अटूट प्रमाण पत्र था। लेकिन वक्त के बदलने के साथ-साथ यह मजबूत दीवार ढहती चली गई और वर्ष दौ हज़ार दौ सौ तेईस के आते-आते यह घरेलू बचत ऐतिहासिक रूप से गिरकर महज पाँच दशमलव एक प्रतिशत के डरावने स्तर पर सिमट कर रह गई। अर्थशास्त्रियों की मानें तो यह गिरावट पिछले पचास सालों का सबसे निचला और खतरनाक स्तर है, जो यह साफ संकेत देता है कि देश के नागरिकों का आर्थिक सुरक्षा तंत्र अब पूरी तरह से चरमरा चुका है और लोग आने वाले संकटों के प्रति पूरी तरह असुरक्षित हो चुके हैं।
इस भारी वित्तीय गिरावट और मानसिक बदलाव के पीछे कोई सामान्य संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे कॉरपोरेट जगत और वित्तीय संस्थाओं द्वारा बुना गया एक बेहद बारीक और सोची-समझी बिछाया हुआ जाल काम कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में देश के आम नागरिकों की वास्तविक आय में उस अनुपात में कोई बड़ी बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई, जबकि दूसरी तरफ रोजमर्रा की जरूरी चीजों की महंगाई आसमान छूने लगी और आम आदमी की जेब खाली होने लगी। जब मध्यमवर्ग की क्रय शक्ति इस बढ़ती हुई महंगाई के सामने पूरी तरह असहाय और पस्त हो गई, तब चालाक वित्तीय सिस्टम ने एक नया और लुभावना रास्ता निकाला, जिसे हम सभी आज ‘EMI’ यानी मासिक किस्तों के जाल के रूप में जानते हैं। इस व्यवस्था ने लोगों को एक ऐसा खतरनाक नशा परोस दिया जिसने उनकी सोचने-समझने की क्षमता को ही कुंद कर दिया। व्यवस्था ने विज्ञापनों के जरिए यह भ्रामक नारा घर-घर तक पहुंचाया कि ‘अभी जियो और बाद में कमाओ’, और दुर्भाग्य से हमारी पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने बिना सोचे-समझे इस आत्मघाती रास्ते को गले लगा लिया।

हमें यह गहराई से समझने की सख्त जरूरत है कि हमारे बुजुर्गों द्वारा की जाने वाली बचत सिर्फ बैंक खातों में जमा कोई निर्जीव संख्या या पैसा नहीं होती थी। वास्तव में वह बचत किसी भी इंसान और परिवार की वह मजबूत रीढ़ की हड्डी होती थी, जो उसे समाज में सिर उठाकर जीने का हौसला देती थी। वह एक ऐसी आत्मनिर्भरता थी, जो किसी भी विपरीत परिस्थिति या आपातकाल के दौरान आपको किसी बैंक, साहूकार या रिश्तेदार के सामने झुकने से पूरी तरह रोकती थी। जब किसी समाज से बचत की यह पवित्र और अनुशासित संस्कृति खत्म होती है, तो उसके साथ ही स्वाभिमान से जीने की वह आंतरिक ताकत भी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है जो इंसान को किसी का मोहताज नहीं होने देती थी। पुराने जमाने में हमारे घरों में मिट्टी का एक छोटा सा गुल्लक हुआ करता था, जिसमें हमारी मां हर महीने अपनी गृहस्थी के खर्चों में से कटौती करके कुछ ना कुछ पैसे चुपचाप डाल दिया करती थीं, वह गुल्लक केवल मिट्टी का बर्तन नहीं बल्कि हमारे भविष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा ढाल हुआ करता था।
आज के इस तथाकथित आधुनिक और पढ़े-लिखे समाज ने अपनी जड़ों को भुलाकर खुद को एक ऐसे भयानक दलदल में धकेल दिया है जहां चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ कर्ज का साया मंडरा रहा है। आधिकारिक वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक, आज देश के उपभोक्ता एक सौ छतीस लाख करोड़ के कर और भारी कर्ज के बोझ तले बुरी तरह दबे हुए हैं। इस विशालकाय कर्ज के आंकड़ों के सामने आने के बाद अब जाकर लोगों की आंखें खुल रही हैं और उन्हें अपनी इस ऐतिहासिक भूल का एहसास होना शुरू हुआ है। हमारी दादी हमेशा एक बेहद व्यावहारिक और कड़वी बात कहती थीं कि “उधार लेकर कभी घी मत खाओ”, यानी अपनी चादर से बाहर पैर पसारना हमेशा विनाशकारी होता है। उस दौर में हम अपनी इन अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी माताओं और दादियों को ‘पुराने जमाने का’ और दकियानूसी समझकर उनकी बातों पर हंस दिया करते थे, लेकिन आज जब हम इस कर्ज के अंतहीन चक्रव्यूह में घुटने तक धंस चुके हैं, तब हमें यह कड़वा सच समझ में आ रहा है कि वे पारंपरिक महिलाएं ही असल में आधुनिक अर्थशास्त्री थीं, जिन्हें जीवन के असली अर्थशास्त्र का गहरा ज्ञान था।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे डरावना और कड़वा पहलू यह है कि आज हम खुद को एक स्वतंत्र नागरिक तो कहते हैं, लेकिन वास्तव में हम मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह गुलाम बन चुके हैं। हमने अपनी अनमोल व्यक्तिगत आजादी और रातों की सुकून भरी नींद को क्रेडिट कार्ड की उस मासिक पर्ची और ‘मिनिमम ड्यू’ यानी न्यूनतम देय राशि के चक्रव्यूह में चुपचाप गिरवी रख दिया है। हर महीने की पहली तारीख को आने वाली तनख्वाह पर हमारा हक होने से पहले उन बैंकों और वित्तीय कंपनियों का हक हो जाता है जिन्होंने हमें कर्ज के जाल में फंसाया है। पचास साल के कड़े परिश्रम, त्याग और धैर्य से खड़ी की गई स्वावलंबन की इस खूबसूरत कहानी को हमने महज दस साल के शॉर्टकट और लालच के चक्कर में पूरी तरह खत्म कर दिया है। आज भी हमारे पास संभलने का आखिरी और बेहद कीमती वक्त बचा हुआ है। या तो हम आज ही इस आत्मघाती और विनाशकारी ‘EMI का नशा’ पूरी तरह से छोड़ दें, या फिर भविष्य में अपने स्वाभिमान और अपनी रीढ़ की हड्डी को हमेशा-हमेशा के लिए खोने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें।





