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संसद में गूंजा पीरूल और रेज़िन का मुद्दा त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने रोजगार की राह दिखाई

संसद में चर्चा के दौरान त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि पीरूल और रेज़िन जैसे वन संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाएगा, वनाग्नि कम करेगा और उत्तराखंड सहित पहाड़ी राज्यों में हरित अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देगा।

नई दिल्ली। राष्ट्रीय संसद में पर्वतीय राज्यों की चुनौतियों और संभावनाओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा उस समय जोरदार तरीके से सामने आया जब हरिद्वार से सांसद और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सदन के भीतर पहाड़ी क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग की आवश्यकता को प्रमुखता से उठाया। अपने वक्तव्य में उन्होंने विशेष रूप से उत्तराखंड सहित हिमालयी राज्यों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध पीरूल यानी चीड़ की सूखी पत्तियों, चीड़ के पेड़ों से निकलने वाले रेज़िन और अन्य वन आधारित जैविक संसाधनों के व्यवस्थित उपयोग की बात कही। उन्होंने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि इन संसाधनों को यदि वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित, प्रसंस्कृत और बाजार से जोड़ा जाए तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित होंगे बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बना सकते हैं। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने यह भी कहा कि आज के समय में जब दुनिया भर में हरित विकास और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की चर्चा हो रही है, तब भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करना बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि सरकार इस दिशा में ठोस और दूरदर्शी नीति तैयार करे तो यह क्षेत्र रोजगार, ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम कर सकता है।

सदन में अपने विचार रखते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने यह स्पष्ट किया कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के जंगलों में हर साल बड़ी मात्रा में पीरूल और अन्य वन-बायोमास जमीन पर गिरकर जमा हो जाते हैं। यह जैविक सामग्री वन संपदा का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा मानी जाती है, लेकिन इसके बावजूद इसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति न केवल संसाधनों की बर्बादी का कारण बनती है बल्कि इससे जंगलों में आग लगने की घटनाओं का खतरा भी लगातार बढ़ता रहता है। गर्मियों के मौसम में जब जंगलों में सूखी पत्तियों की मोटी परत जमा हो जाती है, तब मामूली चिंगारी भी बड़े पैमाने पर वनाग्नि का रूप ले सकती है। इस तरह की आग से न केवल पेड़-पौधों को नुकसान होता है बल्कि वन्यजीवों के जीवन पर भी खतरा मंडराने लगता है। सांसद ने कहा कि यदि इन सूखी पत्तियों को समय पर एकत्रित कर उनका उपयोग ऊर्जा उत्पादन या अन्य औद्योगिक कार्यों में किया जाए तो जंगलों में आग लगने की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस दिशा में संगठित प्रयास किए जाएं तो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों उद्देश्यों को एक साथ हासिल किया जा सकता है।

प्राकृतिक संसाधनों के औद्योगिक उपयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने रेज़िन के महत्व को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि चीड़ के पेड़ों से प्राप्त होने वाला रेज़िन कई उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण कच्चा माल है। रेज़िन का इस्तेमाल औषधि निर्माण, पेंट उद्योग, साबुन उत्पादन, कागज़ निर्माण और रबर उद्योग सहित कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके बावजूद पर्वतीय क्षेत्रों में इस संसाधन का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं हो पा रहा है। सांसद ने कहा कि यदि रेज़िन के संग्रहण और प्रसंस्करण के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाए और स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग स्थापित किए जाएं तो इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में काम करने के अवसर मिल सकेंगे। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सदन में यह भी कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग पर्वतीय राज्यों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पीरूल के उपयोग से जुड़ी संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए सांसद ने कहा कि सूखी चीड़ की पत्तियों से बायो-फ्यूल और बायो-पैलेट्स तैयार किए जा सकते हैं, जो ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में एक प्रभावी विकल्प बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन पत्तियों को इकट्ठा कर आधुनिक तकनीक की मदद से ईंधन में बदला जाए तो यह ऊर्जा संकट को कम करने में भी सहायक साबित हो सकता है। इसके अलावा पीरूल और अन्य वन आधारित जैविक सामग्री से पर्यावरण के अनुकूल बोर्ड तैयार किए जा सकते हैं, जिनका उपयोग निर्माण और फर्नीचर उद्योग में किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियों से जैविक कम्पोस्ट तैयार करना भी संभव है, जिससे कृषि क्षेत्र को भी लाभ मिल सकता है। सांसद ने कहा कि इस तरह की गतिविधियों से स्थानीय समुदायों को सीधे तौर पर फायदा मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। खासकर महिलाओं के स्वयं सहायता समूह और युवा उद्यमियों को इस क्षेत्र में आगे आने का अवसर मिल सकता है, जिससे गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

संसद में अपनी बात रखते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने यह भी कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार पीरूल और रेज़िन जैसे संसाधनों के व्यवस्थित उपयोग के लिए स्पष्ट नीति बनाए और निजी क्षेत्र को भी इसमें भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करे तो यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इन संसाधनों के संग्रहण, भंडारण और विपणन के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत ढांचा तैयार किया जाना चाहिए। इससे न केवल संसाधनों की बर्बादी रुकेगी बल्कि स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि होगी। सांसद ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के पास सीमित आर्थिक अवसर होते हैं, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योग उनके लिए एक महत्वपूर्ण सहारा बन सकते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस दिशा में योजनाएं बनाते समय पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।

हरित और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की दिशा में इस पहल को महत्वपूर्ण बताते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि यदि इन संसाधनों का उपयोग योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो पर्वतीय क्षेत्रों में एक मजबूत हरित अर्थव्यवस्था विकसित की जा सकती है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में पर्यावरण के अनुकूल उद्योगों और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है और भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध वन-बायोमास इस दिशा में एक बड़ा अवसर प्रदान कर सकता है। सांसद ने कहा कि यदि सरकार इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराए तो स्थानीय स्तर पर वन आधारित उद्योग तेजी से विकसित हो सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में भी वृद्धि होगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया से युवाओं और महिलाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं, जिससे पलायन की समस्या को भी कम करने में मदद मिलेगी।

संसद में उठाया गया यह मुद्दा केवल एक संसाधन के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्वतीय राज्यों के समग्र विकास की दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट किया कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संपदा की कोई कमी नहीं है, लेकिन इन संसाधनों का सही तरीके से उपयोग नहीं होने के कारण वहां के लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि यदि सरकार, स्थानीय समुदाय और उद्योग मिलकर एक समन्वित रणनीति अपनाएं तो इन संसाधनों का उपयोग क्षेत्रीय विकास के लिए किया जा सकता है। सांसद ने यह भी कहा कि पीरूल और रेज़िन को रणनीतिक वन संसाधन घोषित किया जाना चाहिए और इनके संग्रहण, मूल्य संवर्धन तथा विपणन के लिए ठोस और समयबद्ध नीति बनाई जानी चाहिए। इससे पर्वतीय राज्यों की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि होगी।

केंद्र सरकार से अपील करते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम उठाए जाने चाहिए ताकि प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कहा कि यदि इन संसाधनों के उपयोग के लिए समग्र नीति तैयार की जाती है तो इससे न केवल वनाग्नि की समस्या को कम किया जा सकेगा बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी। सांसद ने यह भी कहा कि इस पहल से स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार के अवसर मिलेंगे और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए पलायन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। संसद में रखे गए इस प्रस्ताव को कई विशेषज्ञों ने भी महत्वपूर्ण बताया है, क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण विकास जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं को एक साथ जोड़ता है। माना जा रहा है कि यदि इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए गए तो आने वाले समय में पर्वतीय राज्यों के विकास की तस्वीर बदल सकती है और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित एक मजबूत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था का निर्माण संभव हो सकेगा।

पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध वन संसाधनों के बेहतर उपयोग की बात करते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने संसद में यह भी कहा कि यदि पीरूल और रेज़िन जैसे संसाधनों के लिए संगठित ढंग से कार्ययोजना तैयार की जाए तो इससे स्थानीय स्तर पर अनेक छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना संभव हो सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के समय में दुनिया भर में जैविक और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक वन-बायोमास भारत के लिए एक बड़ा अवसर बन सकता है। सांसद ने कहा कि यदि इन संसाधनों को केवल जंगलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए तो यह न केवल आर्थिक दृष्टि से नुकसानदेह है बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों को भी बढ़ाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि पीरूल के संग्रहण के लिए स्थानीय स्तर पर संगठित अभियान चलाए जाएं और ग्रामीण समुदायों को इसमें भागीदारी दी जाए। इससे एक ओर जंगलों की सफाई होगी तो दूसरी ओर गांवों में रहने वाले लोगों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी तैयार होगा। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने यह भी कहा कि सरकार यदि इस दिशा में सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उद्यमियों को प्रोत्साहन दे तो यह पहल बहुत कम समय में बड़े आर्थिक आंदोलन का रूप ले सकती है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को आधुनिक स्वरूप मिल सकता है और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास का एक नया मॉडल तैयार हो सकता है।

वनाग्नि की समस्या को गंभीर बताते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने संसद में यह भी उल्लेख किया कि हर वर्ष गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड सहित कई पर्वतीय राज्यों के जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। इन घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण जंगलों में बड़ी मात्रा में जमा होने वाला सूखा पीरूल माना जाता है, जो मामूली चिंगारी से भी तेजी से जल उठता है और देखते ही देखते आग पूरे क्षेत्र में फैल जाती है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति से न केवल वन संपदा को नुकसान होता है बल्कि इससे पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होता है और कई बार स्थानीय गांवों के लिए भी खतरा पैदा हो जाता है। सांसद ने कहा कि यदि पीरूल के व्यवस्थित संग्रहण और उपयोग की नीति लागू की जाए तो जंगलों में आग लगने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकता है। जब ग्रामीण लोग स्वयं पीरूल के संग्रहण में भागीदारी करेंगे और उसे उद्योगों या ऊर्जा परियोजनाओं तक पहुंचाएंगे, तब जंगलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी और लोगों को आर्थिक लाभ भी मिलेगा। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि विकास और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन बना रहे।

संसद में उठाए गए इस विषय को व्यापक दृष्टिकोण से देखते हुए त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने यह भी कहा कि पर्वतीय राज्यों के विकास के लिए वहां की भौगोलिक परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप योजनाएं बनाना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मैदानों के लिए बनाई गई विकास नीतियां अक्सर पहाड़ी क्षेत्रों में उतनी प्रभावी नहीं होतीं, इसलिए इन क्षेत्रों के लिए अलग सोच और विशेष रणनीति की जरूरत होती है। सांसद ने कहा कि यदि पीरूल, रेज़िन और अन्य वन-बायोमास के उपयोग को केंद्र में रखकर एक समग्र नीति बनाई जाए तो इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की पहल से पर्यटन, कृषि और वन आधारित उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकता है। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार इस विषय को गंभीरता से लेते हुए पर्वतीय राज्यों के हित में ठोस कदम उठाएगी और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए प्रभावी नीति तैयार करेगी। उनका मानना है कि यदि इस दिशा में समय रहते पहल की जाती है तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड सहित अन्य पर्वतीय राज्यों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है और स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव आएगा।

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