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पूंजीपतियों की तिजोरी भरने के लिए देश की जनता की जेब पर सरकार का सबसे बड़ा डाका

रामनगर(सुनील कोठारी)। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और घरेलू अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोधों के बीच आज भारत का आम उपभोक्ता एक बेहद पेचीदा और आर्थिक रूप से कष्टदायक दौर से गुजर रहा है। देश के भीतर मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोग और देश की रीढ़ माने जाने वाले किसान भाई समय ईंधन की आसमान छूती कीमतों और भारी-भरकम टैक्स के दोहरे बोझ तले दबे हुए हैं। एक तरफ जहां हर सुबह पेट्रोल पंपों पर आम जनता की जेब खाली हो रही है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार के आंकड़े एक ऐसी कड़वी हकीकत बयां कर रहे हैं जो किसी भी आम नागरिक को सोचने पर मजबूर कर देगी। सरकार और नीति निर्माताओं की ओर से लगातार यह तर्क दिया जाता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले व्यवधानों के कारण देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें नियंत्रण से बाहर हो चुकी हैं। लेकिन इस कथित वैश्विक संकट और घरेलू तेल किल्लत के बहानों के पीछे की जो असली आर्थिक क्रोनोलॉजी है, वह कुछ और ही कहानी बयां करती है। देश की जनता लगातार टैक्स चुकाकर बूंद-बूंद ईंधन के लिए तरस रही है, जबकि व्यवस्था के भीतर कुछ खास समीकरणों का फायदा उठाकर चुनिंदा लोग मुनाफे की नई इमारतें खड़ी कर रहे हैं। राष्ट्रवाद के बड़े-बड़े नारों के बीच इस गंभीर विरोधाभास को समझना बेहद जरूरी हो गया है कि आखिर क्यों त्याग सिर्फ देश की जनता को करना पड़ रहा है और मलाई कुछ विशेष हाथों में जा रही है।

हाल ही में सामने आए मार्च 2026 के ताजा सरकारी और व्यापारिक आंकड़े देश की इस विरोधाभासी आर्थिक नीति की पोल पूरी तरह से खोलकर रख देते हैं। इन आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, भारत ने अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के बहाने दुनिया के 40 से भी अधिक देशों से लगभग ₹1.32 लाख करोड़ मूल्य के कच्चे तेल का भारी-भरकम आयात किया है। लेकिन इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला और आंखें खोल देने वाला पहलू इसके ठीक बाद शुरू होता है। इसी अवधि के दौरान, जब देश की जनता महंगे ईंधन की मार से त्रस्त थी, तब भारत से ₹52,826 करोड़ मूल्य का रिफाइंड तेल और पेट्रोलियम उत्पाद दुनिया के 150 से भी ज्यादा देशों को धड़ल्ले से निर्यात कर दिया गया। यह आंकड़ा अपने आप में एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा करता है कि अगर देश के भीतर वास्तव में ऊर्जा का इतना बड़ा संकट है और सरकार को कीमतों पर नियंत्रण पाने में इतनी लाचारी महसूस हो रही है, तो फिर इतनी भारी मात्रा में ईंधन को देश से बाहर भेजने की अनुमति क्यों और कैसे दी जा रही है। क्या यह देश की जनता के साथ एक बड़ा आर्थिक विश्वासघात नहीं है कि जिस तेल को देश की रिफाइनरियों में तैयार किया गया, उसे घरेलू बाजार में कम दामों पर बांटने के बजाय विदेशी खरीदारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जहाजों में लादकर रवाना कर दिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कॉर्पोरेट और नीतिगत स्तर पर जो खेल चल रहा है, उसे गहराई से समझने की जरूरत है। देश की बड़ी-बड़ी पूंजीपति ऑयल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों से तुलनात्मक रूप से बेहद सस्ता कच्चा तेल खरीदकर भारत लाती हैं। इन कंपनियों को सरकार की नीतियों और व्यवस्था का पूरा संरक्षण हासिल होता है, जिसके तहत भारत की विशाल और आधुनिक रिफाइनरियों में इस कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल और डीजल में बदला जाता है। कायदे से इस देश के संसाधनों और रिफाइनरियों में तैयार हुए इस ईंधन पर पहला हक भारत के नागरिकों, यहां के मेहनतकश किसानों और आम उपभोक्ताओं का होना चाहिए था ताकि उन्हें कम कीमतों पर राहत मिल सके। लेकिन जब इस सस्ते और रिफाइंड तेल को देश के घरेलू पेट्रोल पंपों पर आम जनता के लिए रियायती या वाजिब दामों पर बेचने की बारी आती है, तो सरकार और कंपनियों की तरफ से अंतरराष्ट्रीय दबाव और नियमों के तमाम तरह के तकनीकी बहाने बना दिए जाते हैं। आम जनता को यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि यदि घरेलू बाजार में कीमतें कम की गईं तो तेल कंपनियों को भारी घाटा होगा, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।

इसके विपरीत, यही बड़ी-बड़ी पूंजीपति कंपनियां अपने बेतहाशा मुनाफे के चक्कर में उस तैयार पेट्रोल और डीजल को घरेलू बाजार में खपाने के बजाय विदेशों में ऊंचे दामों पर बेच देती हैं। इस वैश्विक व्यापार के जरिए ये चंद निजी घराने वैश्विक बाजार से अरबों-खरबों का मुनाफा कमाकर अपनी तिजोरियां भरने में मशगूल हैं। देश की आम जनता को दिन-रात टीवी चैनलों और बयानों के माध्यम से यह समझाया जाता है कि देश में तेल की “कमी” है और हम एक वैश्विक “संकट” के दौर से गुजर रहे हैं, इसलिए हमें राष्ट्रवाद और देशहित के नाम पर महंगे दामों को स्वीकार कर लेना चाहिए। मगर इस पूरे विमर्श के पर्दे के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि भारत के प्राकृतिक संसाधनों, यहां की जमीन, पानी और मानव श्रम का इस्तेमाल करके ये चंद बड़ी कंपनियां वैश्विक स्तर पर आपदा को एक अभूतपूर्व अवसर में बदल रही हैं। यह पूरी तरह से एकतरफा व्यवस्था बन चुकी है जहां मुनाफा पूरी तरह से इन कॉर्पोरेट घरानों की जेब में जाता है, जबकि इस पूरे चक्र का जो वित्तीय घाटा और महंगाई का दर्द है, उसे केवल और केवल देश की मूक जनता को अपनी खाली होती जेब से चुकाना पड़ रहा है।

अगर हम भारतीय कृषि क्षेत्र पर इस दोहरी नीति के विनाशकारी प्रभावों का मूल्यांकन करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे किसान भाई इस समय सबसे बड़े शिकार बन चुके हैं। खेती की लागत का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर डीजल की कीमतों से जुड़ा होता है, क्योंकि ट्रैक्टर चलाने से लेकर सिंचाई के पंपों तक हर जगह इसी ईंधन की आवश्यकता होती है। जब सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार की मजबूरी बताकर देश के भीतर डीजल के दाम बढ़ाती है, तो इसका सीधा असर फसलों के उत्पादन की लागत पर पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ, जब देश के भीतर ही तैयार किया गया ₹52,826 करोड़ का रिफाइंड तेल 150 से अधिक देशों को निर्यात किया जा रहा होता है, तब हमारे किसानों को मंडियों में अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है। यह कैसी न्याय व्यवस्था है जहां देश का पेट भरने वाला अन्नदाता तो डीजल की एक-एक बूंद के लिए भारी टैक्स चुकाकर अपनी जेब खाली कर रहा है, और दूसरी तरफ देश का तेल विदेशों में निर्यात करके पूंजीपति अपनी तिजोरियों का आकार बढ़ा रहे हैं। सरकार को यह जवाब देना ही होगा कि आखिर देश के संसाधनों पर पहला अधिकार देश के इस मेहनतकश वर्ग का क्यों नहीं तय किया जा रहा है।

मध्यम वर्ग और वेतनभोगी तबके की स्थिति भी इस आर्थिक चक्रव्यूह में किसी बंधक जैसी हो गई है, जो हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को सौंप देता है। जब एक आम नौकरीपेशा व्यक्ति सुबह अपनी मोटरसाइकिल या कार में पेट्रोल डलवाने जाता है, तो उसे मिलने वाले प्रति लीटर ईंधन की कीमत का आधा हिस्सा केवल केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स के रूप में वसूला जाता है। इस भारी-भरकम टैक्स वसूली के बाद भी जब उसे यह सुनने को मिलता है कि देश तेल के भयंकर संकट से जूझ रहा है, तो उसका व्यवस्था पर से भरोसा उठना स्वाभाविक है। मार्च 2026 के आंकड़ों ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि संकट तेल की उपलब्धता का नहीं, बल्कि नीतियों की नीयत का है। जब सरकार की सरपरस्ती में पूंजीपति ऑयल कंपनियां बाहर से कच्चा तेल लाकर देश की धरती पर उसे रिफाइन कर सकती हैं, तो उस तेल का लाभ देश के इस टैक्सपेयर वर्ग को क्यों नहीं मिल पाता। चंद रसूखदार कॉर्पोरेट घरानों के वैश्विक मुनाफे की खातिर देश के करोड़ों परिवारों के मासिक बजट को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है।

इस पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली को अगर एक निष्पक्ष समीक्षक की नजर से देखा जाए, तो यह लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर ही एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। लोकतांत्रिक सरकारों का मुख्य दायित्व अपने नागरिकों के जीवन को सुगम बनाना और उन्हें बुनियादी सुविधाएं उचित दरों पर उपलब्ध कराना होता है। परंतु यहां जो आर्थिक ढांचा विकसित कर दिया गया है, वह पूरी तरह से पूंजीपतियों के अनुकूल और आम नागरिकों के प्रतिकूल दिखाई देता है। आपदा को अवसर में बदलने की जो कला इन तेल कंपनियों ने सीखी है, उसे सरकार का मौन समर्थन प्राप्त है। जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तब भी देश के भीतर पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई उल्लेखनीय कटौती नहीं की जाती, और जब वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं, तो तुरंत उसका पूरा बोझ जनता पर डाल दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जो भारी-भरकम मुनाफा इकट्ठा होता है, वह सीधे इन कंपनियों के बैंक खातों में चला जाता है। देश की जनता अब इस क्रोनोलॉजी को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है कि किस तरह राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय संकट के आवरण में उनकी गाढ़ी कमाई को कॉर्पोरेट लूट का हिस्सा बनाया जा रहा है।

अब समय आ गया है कि इस नीतिगत विसंगति के खिलाफ देश के भीतर एक गंभीर और तार्किक बहस की शुरुआत की जाए, क्योंकि यह मुद्दा केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक संप्रभुता और संसाधनों के वितरण से जुड़ा हुआ है। देश की जनता संसद से लेकर सड़क तक यह सीधा सवाल पूछ रही है कि मुनाफा कमाने का अधिकार सिर्फ चंद पूंजीपतियों को ही क्यों दिया गया है, जबकि उस मुनाफे को कमाने की प्रक्रिया में होने वाले हर नुकसान की भरपाई देश का आम नागरिक कर रहा है। सरकार को अपनी इस दोहरी नीति पर तुरंत स्थिति स्पष्ट करनी होगी और ऐसे कड़े कदम उठाने होंगे जिससे देश की रिफाइनरियों में बनने वाले ईंधन का पहला लाभ भारत के नागरिकों को मिले। जब तक निर्यात की जाने वाली इस भारी मात्रा पर घरेलू बाजार के पक्ष में नियंत्रण नहीं लगाया जाता, तब तक आम जनता को महंगाई के इस दुष्चक्र से मुक्ति मिलना असंभव है। यह देश किसी कॉर्पोरेट कंपनी की जागीर नहीं है, बल्कि यहां के नागरिकों और किसानों का सामूहिक घर है, और इसके संसाधनों पर पहला और अंतिम हक भी इन्हीं का होना चाहिए।

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