नई दिल्ली। चिकित्सा जगत के गलियारों में एक गहरी हलचल और चिंता की लहर दौड़ गई जब देश की सर्वोच्च अदालत ने मेडिकल नेग्लिजेंस यानी चिकित्सा लापरवाही के दशकों पुराने कानूनी सिद्धांतों को एक नई और सख्त व्याख्या दे दी। 6 मई 2026 को नई दिल्ली से जारी इस न्यायिक आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि अब किसी डॉक्टर की मृत्यु मात्र से पीड़ित मरीज या उसके परिजनों के मुआवजे की लड़ाई खत्म नहीं होगी, बल्कि उस डॉक्टर के कानूनी वारिसों को भी अब अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। हालांकि माननीय न्यायालय ने यह राहत जरूर दी है कि वारिसों की जिम्मेदारी केवल उस संपत्ति तक सीमित रहेगी जो उन्हें विरासत में मिली है, लेकिन इस फैसले ने डॉक्टर समुदाय के भीतर एक अनकहे डर और असुरक्षा की भावना को जन्म दे दिया है। डॉक्टरों का मानना है कि इस तरह के कड़े प्रावधानों के बाद अब चिकित्सा जैसा संवेदनशील पेशा केवल सेवा भाव तक सीमित नहीं रह जाएगा, बल्कि यह अत्यधिक कानूनी जटिलताओं और ‘डिफेंसिव मेडिसिन’ के जाल में फंस सकता है, जहां हर कदम पर कानूनी वारिसों के भविष्य की चिंता डॉक्टर की प्राथमिकता बन जाएगी।
इस ऐतिहासिक मामले की जड़ें 1990 के दशक के उस दौर में छिपी हैं, जब एक महिला ने अपनी आंखों की रोशनी खोने के बाद न्याय की गुहार लगाई थी। पति द्वारा कंज्यूमर फोरम में दायर किए गए इस मुआवजे के मामले में साल 2009 में एक नया मोड़ तब आया जब आरोपी डॉक्टर का निधन हो गया। इसके बाद एक लंबी कानूनी जंग छिड़ गई कि क्या डॉक्टर की मौत के साथ ही मामला बंद हो जाना चाहिए। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के उस पुराने आदेश पर अपनी मुहर लगा दी, जिसमें वारिसों को पक्षकार बनाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने ‘इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925’ की धारा 306 का सहारा लेते हुए तर्क दिया कि आर्थिक क्षतिपूर्ति का दावा डॉक्टर की व्यक्तिगत देयता नहीं, बल्कि उसकी ‘एस्टेट’ यानी संपत्ति से जुड़ा होता है। डॉक्टर समुदाय इस तर्क से खासे व्यथित हैं क्योंकि उनका मानना है कि चिकित्सा कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है और एक डॉक्टर की मृत्यु के वर्षों बाद उसके बच्चों या परिवार को अदालतों के चक्कर कटवाना उनके मानसिक और सामाजिक सम्मान पर गहरा आघात है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह फैसला न केवल उनके काम करने के तरीके को प्रभावित करेगा, बल्कि भविष्य में इलाज की लागत में भी भारी वृद्धि कर सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, जब एक चिकित्सक को यह पता होगा कि उसकी मृत्यु के बाद भी उसके परिवार की शांति भंग हो सकती है, तो वह जटिल और उच्च जोखिम वाले ऑपरेशनों को हाथ में लेने से कतराएगा। अब हर डॉक्टर ‘प्रोटेक्शन कवर’ और प्रोफेशनल इंडेम्निटी इंश्योरेंस की भारी-भरकम राशि के पीछे भागेगा, जिसका सीधा बोझ अंततः मरीजों की जेब पर ही पड़ेगा। इलाज के दौरान होने वाली हर अनहोनी को ‘लापरवाही’ का नाम दे देना और फिर पीढ़ियों तक उस कानूनी बोझ को ढोना, चिकित्सा नैतिकता और मानवता के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी कर देगा। चिकित्सा पेशेवरों का तर्क है कि ‘बोलम टेस्ट’ जैसे मानक पहले से ही उनकी सुरक्षा के लिए मौजूद थे, लेकिन अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 और ‘वाइकेरियस लायबिलिटी’ जैसे कानूनी फंदे डॉक्टरों को एक अपराधी की तरह देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं।
अस्पताल प्रबंधन और वरिष्ठ सर्जनों का पक्ष यह भी है कि मरीज के अधिकारों का चार्टर (2018-21) और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट जैसे कानून पहले से ही मरीजों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। वे पूछते हैं कि यदि मरीज को सूचना का अधिकार, सूचित सहमति और गोपनीयता जैसे व्यापक अधिकार प्राप्त हैं, तो डॉक्टरों की सुरक्षा का क्या? सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब डॉक्टरों को अपने हर परामर्श और हर सर्जरी के साथ दस्तावेजीकरण (डॉक्यूमेंटेशन) पर इतना समय खर्च करना होगा कि वे मरीज के स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कानूनी कागजी कार्रवाई में ही उलझे रहेंगे। अस्पताल अब जटिल मामलों में मरीजों को भर्ती करने से पहले सैकड़ों ‘डिस्क्लेमर’ पर हस्ताक्षर करवाएंगे, जिससे एक विश्वास आधारित रिश्ता महज एक व्यावसायिक अनुबंध बनकर रह जाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि वे भगवान नहीं हैं और चिकित्सा विज्ञान में 100% सफलता की गारंटी कभी नहीं दी जा सकती, ऐसे में कानूनी वारिसों को खींचना उनके परिवार के प्रति अन्यायपूर्ण है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और सुप्रीम कोर्ट ने भले ही अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य को जीवन का अभिन्न अंग माना हो, लेकिन डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग इस फैसले को एकतरफा देख रहा है। वे मानते हैं कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत उन्हें ‘सेवा प्रदाता’ की श्रेणी में रखना पहले ही उनके पेशे की गरिमा के खिलाफ था, और अब संपत्ति की कुर्की जैसे प्रावधान उनके बुढ़ापे की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, आपातकालीन स्थिति में इलाज का अधिकार (परमानंद कटारा मामला) जैसे आदेशों का वे हमेशा सम्मान करते हैं, लेकिन जब सुरक्षा की बात आती है, तो सारा भार केवल डॉक्टर पर डाल दिया जाता है। इस फैसले के बाद चिकित्सा क्षेत्र में ‘सेकंड ओपिनियन’ और पारदर्शी बिलिंग जैसे अधिकार अब एक रक्षात्मक हथियार के रूप में उपयोग किए जाएंगे, जिससे डॉक्टरों और मरीजों के बीच संवाद कम और संदेह ज्यादा बढ़ेगा। भविष्य में चिकित्सा जगत में इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे, जो शायद इलाज की गुणवत्ता से ज्यादा कानूनी सुरक्षा पर केंद्रित होंगे।
यह कानूनी फैसला न केवल मरीजों के अधिकारों को सुदृढ़ करता है, बल्कि चिकित्सा पेशेवरों को अपनी कार्यप्रणाली को पूरी तरह से बदलने के लिए मजबूर भी करता है। अब डॉक्टरों के लिए केवल ‘उचित देखभाल’ पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके जाने के बाद उनकी विरासत कानूनी दांव-पेंचों से सुरक्षित रहे। यह स्थिति चिकित्सा शिक्षा की ओर बढ़ रहे युवाओं को भी सोचने पर मजबूर करेगी कि क्या वे ऐसे जोखिम भरे पेशे में आना चाहते हैं जहां मृत्यु के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा जाता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वारिसों की निजी जेब पर कोई आंच नहीं आएगी, फिर भी सामाजिक प्रतिष्ठा और अदालती प्रक्रिया का डर डॉक्टरों के मनोबल को प्रभावित करने के लिए काफी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार डॉक्टरों की इन जायज चिंताओं को समझते हुए किसी विशेष सुरक्षात्मक कानून पर विचार करेगी, ताकि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था केवल कानूनी जंग का मैदान न बनकर रह जाए।





