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चंपावत में मासूम बेटी से सामूहिक दरिंदगी पर अलका पाल का प्रचंड प्रहार और सरकार को खुली चुनौती

देवभूमि को शर्मसार करने वाली चंपावत की दरिंदगी पर दहाड़ी कांग्रेस नेत्री अलका पाल और शासन की चूूलें हिलाते हुए पूछा कि आखिर कब तक हैवानों का शिकार बनती रहेंगी पहाड़ की मासूम और सुरक्षित बेटियां?

काशीपुर। उत्तराखंड के शांत कहे जाने वाले पर्वतीय अंचल चंपावत से निकलकर आई एक रूह कंपा देने वाली दरिंदगी की वारदात ने पूरे प्रदेश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ एक 16 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घिनौनी घटना को अंजाम दिया गया। इस अमानवीय कृत्य के सामने आने के बाद देवभूमि की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और इसी कड़ी में कांग्रेस की महानगर जिला अध्यक्ष अलका पाल ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए तीखे प्रहार किए हैं। अलका पाल ने इस घटना को मानवता पर कलंक बताते हुए कहा कि जिस प्रदेश में बेटियों को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है, वहां अब बेटियां अपने घर की चौखट के बाहर भी सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने सत्तासीन सरकार की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि अपराधियों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है, जिसके चलते वे ऐसी जघन्य वारदातों को अंजाम देने से भी नहीं हिचक रहे हैं। चंपावत की इस घटना ने न केवल पुलिसिया तंत्र की विफलता को उजागर किया है, बल्कि उन दावों की भी पोल खोल दी है जिनमें महिला सुरक्षा को सर्वोपरि रखने की कसमें खाई जाती थीं।

चंपावत में घटी इस हृदयविदारक घटना पर अपना कड़ा रोष प्रकट करते हुए कांग्रेस की प्रखर नेत्री अलका पाल ने कहा कि नाबालिग के साथ हुई इस दरिंदगी ने यह साबित कर दिया है कि राज्य में जंगलराज की स्थिति पैदा हो चुकी है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि सामूहिक दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध अब पहाड़ों की शांत वादियों में आम होते जा रहे हैं, जो एक बेहद खतरनाक संकेत है। अलका पाल ने पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मांग की है कि इस मामले के दोषियों को ऐसी कठोरतम सजा मिलनी चाहिए जो समाज के लिए एक नजीर बन सके, ताकि भविष्य में कोई भी अपराधी ऐसी घिनौनी सोच पालने की हिम्मत भी न कर सके। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर इस मामले में जरा सी भी ढिलाई बरती गई या राजनीतिक रसूख के चलते अपराधियों को बचाने की कोशिश हुई, तो कांग्रेस सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी। उनके अनुसार, महिला सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने वाली सरकार आज गहरी नींद में सोई हुई है और बेटियां दरिंदों का शिकार बन रही हैं।

महानगर जिला अध्यक्ष अलका पाल ने अपनी प्रेस वार्ता के दौरान बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि चंपावत की घटना केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि यह वर्तमान शासन की नैतिकता की हार है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों पुलिस का खुफिया तंत्र और गश्त व्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि सरेआम सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है? अलका पाल ने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस मामले की त्वरित जांच करानी चाहिए और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से पीड़िता को न्याय दिलाना चाहिए। उन्होंने समाज के प्रबुद्ध वर्ग से भी अपील की कि वे इस अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाएं क्योंकि चुप रहना भी अपराधियों को बढ़ावा देने जैसा है। अलका पाल ने स्पष्ट किया कि जब तक पीड़िता को पूर्ण न्याय नहीं मिल जाता और दोषियों को फांसी के फंदे तक नहीं पहुँचाया जाता, तब तक वह और उनकी पार्टी चैन से नहीं बैठेंगी। उनके कड़े शब्दों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देगी।

इस भयावह कांड ने पूरे उत्तराखंड में आक्रोश की एक नई लहर पैदा कर दी है और अलका पाल के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कानून व्यवस्था के पुतले फूंकने का सिलसिला भी शुरू कर दिया है। अलका पाल ने सीधे तौर पर पुलिस महानिदेशक और संबंधित जिला प्रशासन से जवाब तलब करने की बात कही है कि आखिर क्यों बेटियां सरेराह असुरक्षित महसूस कर रही हैं? उन्होंने कहा कि 16 साल की उस मासूम बच्ची की चीखें चंपावत की वादियों में आज भी गूँज रही होंगी, लेकिन सत्ता के नशे में चूर शासन को कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। महिला सुरक्षा के दावों को खोखला बताते हुए उन्होंने तंज कसा कि ‘बेटी बचाओ’ का नारा केवल विज्ञापनों तक सीमित रह गया है, जबकि धरातल पर बेटियां खौफ के साये में जी रही हैं। अलका पाल का मानना है कि इस तरह की घटनाएं राज्य के पर्यटन और छवि पर भी बुरा असर डालती हैं, क्योंकि सुरक्षित वातावरण ही किसी भी समाज की प्रगति का आधार होता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस आक्रोश के बाद क्या कार्रवाई करता है।

अलका पाल ने अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में अत्यंत भावुक और उत्तेजक लहजे में कहा कि चंपावत की पीड़िता हम सबकी बेटी है और उसके साथ हुआ अन्याय पूरे देवभूमि के स्वाभिमान पर हमला है। उन्होंने राज्य की महिलाओं से आह्वान किया कि वे अपनी सुरक्षा के हक के लिए बाहर निकलें और सरकार को बताएं कि अब और सहा नहीं जाएगा। महानगर अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि अक्सर ऐसे संवेदनशील मामलों में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की जाती है, जिसे वह किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगी। उन्होंने मांग की है कि पीड़िता के परिवार को सरकारी सुरक्षा और उचित आर्थिक सहायता के साथ-साथ एक सरकारी नौकरी भी दी जाए ताकि वे अपने जीवन को दोबारा पटरी पर ला सकें। अलका पाल के इन प्रहारों ने चंपावत से लेकर राजधानी तक के राजनीतिक गलियारों में बेचैनी पैदा कर दी है और महिला सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जहाँ हर कोई अब दोषियों की गिरफ्तारी और सख्त सजा का इंतजार कर रहा है।

चंपावत सामूहिक दुष्कर्म मामले में अलका पाल का यह कड़ा रुख इस बात का संकेत है कि विपक्ष अब महिला अपराधों पर सरकार को किसी भी प्रकार की राहत देने के मूड में नहीं है। उन्होंने कहा कि आज चंपावत रो रहा है क्योंकि उसकी एक मासूम बेटी की अस्मत को सरेबाजार तार-तार किया गया है, और ऐसे समय में अगर सरकार ठोस कदम नहीं उठाती है, तो उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अलका पाल ने यह भी कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से पीड़िता के परिजनों से मुलाकात करेंगी और उन्हें कानूनी लड़ाई में हर संभव मदद मुहैया कराएंगी। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक अपराधियों के मन में मृत्युदंड जैसा डर पैदा नहीं होगा, तब तक ऐसी दरिंदगी की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रहेंगी। आज की यह प्रेस वार्ता और अलका पाल के तीखे तेवर यह बताने के लिए काफी हैं कि देवभूमि की बेटियां अब अपने खिलाफ होने वाले हर अन्याय का हिसाब मांगेगी और कांग्रेस इस संघर्ष में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।

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