भारत(सुनील कोठारी)। वैश्विक अर्थव्यवस्था के मानचित्र पर भारत की साख आज उस दोराहे पर खड़ी है, जहाँ दावों और हकीकत के बीच की खाई दिनों-दिन चौड़ी होती जा रही है। 14 मई की तारीख भारतीय मुद्रा के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज हुई, जब डॉलर के मुकाबले रुपया अपने सबसे निचले स्तर $95.85 तक जा गिरा। हैरानी की बात यह है कि जब डॉलर 70 के स्तर पर था, तब जो शोर सुनाई देता था, आज 95 के पार पहुँचने पर उसे ‘वैश्विक संकट’ का मुलम्मा चढ़ाकर ढका जा रहा है। अनंत नागेश्वरन, जो भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं, अब कह रहे हैं कि रुपए को और गिरने से बचाना प्राथमिकता है, जबकि महज पांच महीने पहले जब भाव 90 के पार था, तब वे चैन की नींद सोने की बात कर रहे थे। क्या 95 का आंकड़ा पार होते ही कोई ऐसा अलार्म बजा जिसने सरकार की नींद उड़ाई? सीएनबीसी की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि भारतीय रुपया दुनिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन चुका है। एशिया के 48 देशों में बांग्लादेश के टाका के बाद अगर किसी की हालत सबसे पतली है, तो वह हमारा रुपया है।
देश में इन दिनों ‘त्याग’ का एक नया ड्रामा शुरू हुआ है, जिसे गोदी मीडिया बड़े चाव से परोस रहा है। प्रधानमंत्री मोदी सरकार ने साल 2017 में लाल बत्ती हटाकर वीआईपी संस्कृति खत्म करने का जो डंका पीटा था, उसकी असलियत किसी से छिपी नहीं है। मंत्रियों और नेताओं के 50-50 कारों के काफिले आज भी सड़कों पर धूल उड़ाते देखे जा सकते हैं। अब अचानक यह खबर फैलाई जा रही है कि देशहित में ये नेता अपनी कारों की संख्या कम कर रहे हैं। सवाल यह है कि 11 मई से पहले इन काफिलों पर जनता की गाढ़ी कमाई के कितने करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए? जिस सरकार की नाक के नीचे मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में धांधली नहीं रुक रही, उसके मंत्री महज दो कारें घटाकर ‘त्यागी’ बनने का ढोंग कर रहे हैं। यह जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है, जहाँ बुनियादी आर्थिक नाकामियों को छिपाने के लिए ऐसे प्रतीकात्मक हथकंडों का सहारा लिया जा रहा है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है।
सोने की कीमतों में आया उछाल भी एक बड़े आर्थिक खेल की ओर इशारा करता है। 10 ग्राम सोने का भाव 1,62,000 रुपए तक पहुँच गया है, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की देशवासियों से अपील है कि वे सोना न खरीदें। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वे लोग सोना खरीद रहे हैं जो गैस का सिलेंडर न मिलने पर शहर छोड़कर गाँव चले गए? या वे दुकानदार जिन्होंने कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 3000 के पार होने पर अपनी दुकानें बढ़ा दीं? हकीकत यह है कि सोना वह तबका खरीद रहा है जो एक बार में 20 से 50 लाख रुपए निवेश करने की हैसियत रखता है। विवेक कौल जैसे विश्लेषकों का मानना है कि सोने की खरीद कम करने की अपील के पीछे असल वजह डॉलर की भारी किल्लत है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना, तेल और फर्टिलाइजर आयात करता है, जिसका भुगतान डॉलर में होता है। 12 साल के शासन के बाद भी हम तेल और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर नहीं हो सके, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है।
विदेशी निवेशकों का भारत से मोहभंग होना अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की सबसे बड़ी घंटी है। निर्मला सीतारमण भले ही सदन में यह कहें कि विदेशी निवेशकों के आने-जाने से उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। साल 2025 में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब 1.80 लाख करोड़ रुपए बाजार से निकाल लिए। नोमूरा और एसएपी ग्लोबल जैसी संस्थाओं ने पहले ही आगाह किया था कि मार्च 2026 तक रुपया 92 के नीचे जाएगा, लेकिन वह तो जनवरी में ही उस स्तर को पार कर गया। उदय कोटक अब सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहने की बात कर रहे हैं। सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का विश्लेषण बताता है कि भारत का कॉर्पोरेट सेक्टर अब निवेशकों को उत्साहित नहीं कर पा रहा है। एआई, चिप निर्माण और ऊर्जा के क्षेत्र में हमारी भूमिका नगण्य है, जबकि पारंपरिक कंपनियां कम मार्जिन पर जूझ रही हैं।

संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने जब वित्त मंत्री से पूछा कि क्या प्रधानमंत्री की साख आज भी रुपए के साथ गिर रही है, तो जवाब में केवल ‘पॉपुलैरिटी सर्वे’ का हवाला दिया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं और रुपया केवल एक ‘विषय’ मात्र है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि 23 मार्च को आरबीआई को 4 अरब डॉलर बेचने पड़े ताकि रुपए को 95 तक पहुँचने से रोका जा सके? बावजूद इसके, एक हफ्ते के भीतर ही रुपया उस लक्ष्मण रेखा को पार कर गया। विपक्षी नेता राहुल गांधी लगातार आरोप लगा रहे हैं कि गलत जीएसटी और नोटबंदी ने देश के छोटे उद्योगों की कमर तोड़ दी है, जिसका फायदा केवल दो-तीन अरबपतियों को मिल रहा है। मेक इन इंडिया जैसे दावे आज आयात पर बढ़ती निर्भरता के नीचे दबे नजर आ रहे हैं।
रुपए की इस बदहाली के लिए केवल युद्ध को जिम्मेदार ठहराना एक सुविधाजनक बहाना मात्र है। 28 फरवरी को ईरान पर हमला हुआ, लेकिन रुपए की गिरावट तो उसके दो साल पहले से ही जारी थी। नेहरू जी के पुराने भाषणों का हवाला देकर अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश अब मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं लगती। अगर रूस-यूक्रेन या ईरान संकट ही असली वजह है, तो हंगरी, चिली और ताइवान जैसे देश, जो पूरी तरह तेल आयात पर निर्भर हैं, उनके विदेशी मुद्रा भंडार में भारत जैसी गिरावट क्यों नहीं देखी गई? सच तो यह है कि अमेरिका के दबाव में आकर हमने रूस और ईरान से सस्ता तेल और गैस लेने के सौदे रद्द कर दिए। फिच रेटिंग एजेंसी और ब्लूमबर्ग की भविष्यवाणियां डराने वाली हैं, जो रुपए के 100 के पार जाने का अंदेशा जता रही हैं।
अंततः, देश के भीतर बढ़ती बेरोजगारी और न्यूनतम सैलरी की नौकरियों ने आम आदमी की बचत करने की क्षमता को खत्म कर दिया है। 50 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी के दौर में जनता का ध्यान धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति से भटकाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं पर 460 करोड़ से अधिक खर्च किए, लेकिन उनका कूटनीतिक लाभ क्या मिला, यह आज भी एक अनुत्तरित प्रश्न है। एक तरफ डॉलर बचाने के लिए आम जनता से विदेश न जाने और सोना न खरीदने की अपील की जा रही है, तो दूसरी तरफ रसूखदार लोग अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाने के लिए करोड़ों डॉलर बाहर भेज रहे हैं। भारत का रुपया आज अपनी आबरू बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, और यदि बुनियादी आर्थिक सुधार नहीं किए गए, तो आने वाला आर्थिक तूफान उन तमाम हेडलाइंस को बहा ले जाएगा जिन्हें आज ‘उपलब्धि’ बताकर पेश किया जा रहा है।





