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फिरोज गांधी की असली पहचान पर अलका पाल का वो खुलासा जिसने हिला दिया पूरा देश

राहुल गांधी के दादा को खान बताने वालों को अलका पाल का मुंहतोड़ जवाब और फिरोज गांधी द्वारा अपनी ही सरकार का महाघोटाला उजागर करने की वह अनसुनी दास्तां जिसने भारतीय राजनीति में मचा दिया था हड़कंप।

काशीपुर। कांग्रेस जिला अध्यक्ष अलका पाल एक बड़ा पर्दा उठाते हुए बताया कि भारतीय राजनीति के इतिहास को लेकर आज जिस तरह का भ्रमजाल फैलाया गया है, वह न केवल निंदनीय है बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों की हत्या करने के समान है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और व्हाट्सएप की कथित यूनिवर्सिटी से निकले आधे-अधूरे सच ने राहुल गांधी के परिवार को लेकर कई ऐसी भ्रांतियां पैदा कर दी हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। अलका पाल ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि जिन्हें आज राजनीतिक द्वेष के चलते ‘खान’ बताकर ट्रोल किया जाता है, वास्तव में उनके पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास त्याग और ईमानदारी की मिसाल रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज की पीढ़ी को यह जानने की सख्त जरूरत है कि जिस शख्स को निशाना बनाया जा रहा है, वह कोई और नहीं बल्कि फिरोज गांधी थे, जिन्होंने अपनी ही सरकार के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़कर भारतीय लोकतंत्र में शुचिता की एक नई परिभाषा लिखी थी।

अलका पाल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए खुलासा किया कि राहुल गांधी के दादाजी फिरोज गांधी का जन्म एक संभ्रांत और प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था, न कि किसी मुस्लिम परिवार में। उनका मूल नाम फिरोज जहांगीर घंडी था, जिसमें ‘घंडी’ शब्द उनके पारसी मूल की पहचान था। यह समुदाय भारत के सबसे छोटे लेकिन सबसे अधिक सम्मानित और शिक्षित अल्पसंख्यक समुदायों में से एक रहा है, जिसने देश के नवनिर्माण में टाटा और वाडिया जैसे दिग्गजों के माध्यम से अभूतपूर्व योगदान दिया है। फिरोज गांधी का न तो इस्लाम से कोई वास्ता था और न ही उनका पारिवारिक इतिहास किसी अन्य धर्म से जुड़ा था। वे पूरी तरह से एक पारसी थे, जो अपनी जड़ों के प्रति हमेशा वफादार रहे। अलका पाल ने बताया कि किस तरह नाम के उच्चारण और वर्तनी के मामूली बदलावों को आज एक बड़े षडयंत्र के तहत सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है, जो कि सरासर गलत और निराधार है।

स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड की चर्चा करते हुए अलका पाल ने बताया कि फिरोज गांधी की देशभक्ति और उनके अडिग जज्बे से खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बेहद प्रभावित थे। उस दौर में जब युवा फिरोज अंग्रेजों की लाठियों के सामने सीना तानकर खड़े रहते थे, तब गांधी जी ने उनके साहस को देखते हुए स्वयं उन्हें अपना ‘गांधी’ सरनेम अपनाने की प्रेरणा और सहर्ष अनुमति दी थी। यह कोई पहचान छुपाने का प्रयास नहीं था, बल्कि एक महान क्रांतिकारी को बापू द्वारा दिया गया सम्मान था। आज जो लोग आनंद भवन को केवल एक विलासिता का केंद्र बताते हैं, उन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के पन्नों को पलटना चाहिए, जब इसी परिवार के सदस्यों ने अपनी सुख-सुविधाओं को तिलांजलि दे दी थी। फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी दोनों ने विदेशी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें जेल की काल कोठरियों में समय बिताना पड़ा, जो इस बात का प्रमाण है कि नेहरू परिवार की पहचान त्याग से बनी है।

अलका पाल ने आगे विस्तार से बताया कि आनंद भवन कोई आम रिहाइश नहीं, बल्कि आजादी के दीवानों और क्रांतिकारियों का वह मुख्य केंद्र था जहां से फिरंगी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बनती थीं। 1945 का वह दौर, जब हिंदुस्तान अपनी आजादी की दहलीज पर खड़ा था, फिरोज गांधी महज नेहरू परिवार के दामाद बनकर शांत नहीं बैठे रहे। वे एक अत्यंत ऊर्जावान और सक्रिय कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में उभरकर सामने आए, जिन्होंने अपनी रणनीतियों से ब्रिटिश प्रशासन की नाक में दम कर दिया था। उनकी भूमिका केवल पर्दे के पीछे की नहीं थी, बल्कि वे जमीन पर उतरकर संघर्ष करने वाले जननेता थे। उनकी निडरता और स्पष्टवादिता का ही परिणाम था कि उन्होंने आजादी के बाद भी अपनी स्वतंत्र वैचारिक छवि को बरकरार रखा और सत्ता की गलियारों में कभी भी अपनी व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा से समझौता नहीं किया।

आजादी के बाद जब फिरोज गांधी संसद पहुंचे, तो उन्होंने एक ऐसा उदाहरण पेश किया जो आज के दौर में अकल्पनीय लगता है। अलका पाल ने बताया कि वे ‘जी हुजूरी’ करने वाले सांसद कतई नहीं थे, बल्कि वे सदन के भीतर अपनी ही पार्टी की सरकार के लिए सबसे बड़े प्रहरी थे। 1958 में जब देश ने भ्रष्टाचार का पहला बड़ा रूप देखा, तो वह फिरोज गांधी ही थे जिन्होंने एलआईसी घोटाले को सबके सामने उजागर किया था। यह घोटाला उनके अपने ससुर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के दौरान हुआ था। उनकी निर्भीक रिपोर्टिंग और संसदीय हस्तक्षेप के कारण ही तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। अलका पाल ने सवाल उठाया कि क्या आज के दौर में कोई सत्ताधारी दल का सांसद अपने ही परिवार की सरकार के खिलाफ ऐसी हिम्मत और पारदर्शिता दिखाने का साहस कर सकता है?

अत: अलका पाल ने जनता से अपील की कि वे अफवाहों के जाल में फंसने के बजाय अपने गौरवशाली इतिहास को पढ़ें और समझें। फिरोज गांधी का व्यक्तित्व एक ऐसे स्तंभ की तरह था, जिसने परिवारवाद की बेड़ियों से ऊपर उठकर सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। आज राहुल गांधी को उनके दादा के नाम पर कोसने वाले लोग शायद यह भूल जाते हैं कि वे उस महापुरुष के वंशज हैं जिसने भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए अपनों से भी लड़ने में संकोच नहीं किया। इतिहास केवल नारों से नहीं, बल्कि कठिन संघर्षों और भारी त्याग से रचा जाता है। अलका पाल ने अंत में कहा कि यदि आपको यह जानकारी सत्य और न्यायपूर्ण लगती है, तो इसे हर भारतीय तक पहुंचाएं ताकि उन लोगों के मुंह बंद किए जा सकें जो झूठ की राजनीति के सहारे देश की एकता और महान क्रांतिकारियों की छवि को बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।

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