नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। हर वर्ष 24 जनवरी को मनाया जाने वाला ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ एक बार फिर देश को यह याद दिलाने का अवसर लेकर आया कि लड़कियों के सशक्तिकरण का प्रश्न केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत राष्ट्रीय दायित्व है। वर्ष 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए इस दिवस का उद्देश्य समाज के हर तबके में यह संदेश पहुंचाना रहा है कि बालिकाएं केवल संरक्षण की पात्र नहीं, बल्कि समान अधिकारों, अवसरों और सम्मान की अधिकारी हैं। बीते वर्षों में नीति, कार्यक्रमों और योजनाओं के स्तर पर कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी दर्शाती है कि देश की करोड़ों लड़कियां आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और अवसरों की असमानता से जूझ रही हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब केंद्रीय बजट 2026 करीब है और देशभर के नीति निर्माता, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और अर्थशास्त्री इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आने वाला बजट प्रतीकों से आगे बढ़कर ठोस निवेश और निर्णायक कदमों का दस्तावेज बने, ताकि लड़कियों के भविष्य को वास्तविक मजबूती मिल सके।
इस बार का राष्ट्रीय बालिका दिवस इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे दौर में आया है, जब सरकार के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास में निवेश बढ़ाने की चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर रूप ले चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत को समावेशी विकास की राह पर आगे बढ़ना है, तो लड़कियों के जीवन से जुड़े हर पहलू को प्राथमिकता देनी होगी। बीते कुछ वर्षों में सामाजिक संकेतकों में सुधार जरूर हुआ है, जैसे स्कूल नामांकन में वृद्धि, मातृ मृत्यु दर में गिरावट और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में विस्तार, लेकिन इसके समानांतर कई ऐसी समस्याएं भी बनी हुई हैं, जो लड़कियों की प्रगति को सीमित कर रही हैं। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं में लैंगिक असमानता और शिक्षा तक पहुंच में भेदभाव आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन समस्याओं का समाधान केवल कानूनों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि बजटीय प्राथमिकताओं और संस्थागत इच्छाशक्ति से संभव है, जो इस बार के बजट से अपेक्षित है।
देश में लागू महत्वाकांक्षी नीतिगत ढांचों और अनेक प्रमुख सरकारी योजनाओं के बावजूद, वास्तविक जीवन में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों की लड़कियों को अब भी व्यवस्थागत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, खेल, रक्षा सेवाओं और नेतृत्व की भूमिकाओं में अवसर सीमित बने हुए हैं। इस संदर्भ में एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रोफेसर जे.एस. राजपूत का कहना है कि शिक्षा में सार्वजनिक निवेश की कमी आज भी सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने दैनिक सहर प्रजातंत्र समाचार से बातचीत में स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक लड़कियों के सशक्तिकरण की बात अधूरी ही रहेगी। उनके अनुसार, दशकों से शिक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने का वादा किया जाता रहा है, लेकिन यह लक्ष्य आज तक हासिल नहीं हो पाया, जिससे स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन की कमी लगातार बनी हुई है।
शिक्षा पर निवेश को लेकर प्रोफेसर जे.एस. राजपूत ने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि कोठारी आयोग की 1964-65 की रिपोर्ट और 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के समय से ही यह संकल्प दोहराया जाता रहा है कि शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च किया जाएगा। उनके अनुसार, हर सरकार ने इस दिशा में आश्वासन दिए, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह कभी पूरी तरह लागू नहीं हो सका। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि शिक्षा के क्षेत्र में अपर्याप्त बजट का सीधा असर लड़कियों पर पड़ता है, क्योंकि जब संसाधन सीमित होते हैं तो सबसे पहले हाशिए पर खड़े वर्ग प्रभावित होते हैं। राजपूत का मानना है कि बजट 2026 में यदि शिक्षा के लिए ठोस और स्पष्ट आवंटन नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में लैंगिक असमानता और गहराने का खतरा बना रहेगा, जो देश के दीर्घकालिक विकास के लिए भी नुकसानदेह होगा।
बजट 2026 से अपेक्षाओं पर बात करते हुए प्रोफेसर जे.एस. राजपूत ने विशेष रूप से लड़कियों के लिए लक्षित प्रावधानों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश के कई हिस्सों में स्कूल तो हैं, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार, यह स्थिति सरकारी और निजी दोनों तरह के शिक्षण संस्थानों में देखी जा सकती है। राजपूत ने कहा कि यदि किसी इलाके में केवल एक ही स्कूल है, तो भी वहां शिक्षकों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे बच्चों के आत्मविश्वास, दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए इस क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
लड़कियों की शिक्षा में महिला शिक्षकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए प्रोफेसर जे.एस. राजपूत ने कहा कि महिला शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, महिला शिक्षक छात्राओं के साथ बेहतर संवाद स्थापित कर सकती हैं, उनकी भावनाओं और समस्याओं को समझ सकती हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे सकती हैं। राजपूत का मानना है कि जब लड़कियों को ऐसा माहौल मिलता है, जहां वे बिना झिझक अपनी बात रख सकें, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे खुद को समाज का बराबरी का हिस्सा महसूस करती हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी छात्रा को यह एहसास नहीं होना चाहिए कि उसकी उपेक्षा हो रही है या उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके विपरीत, शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि हर लड़की अपनी क्षमता और ताकत को पहचाने और भविष्य के लिए बड़े सपने देख सके।
शिक्षक प्रशिक्षण के मुद्दे पर भी प्रोफेसर जे.एस. राजपूत ने गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से देश में अच्छी तरह से प्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं है, जिसका असर सीधे तौर पर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। उनके अनुसार, महिला शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण और कोचिंग दी जानी चाहिए, ताकि वे यह समझ सकें कि लड़कियों की शैक्षणिक और सामाजिक जरूरतें क्या हैं। राजपूत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लड़कियों की शिक्षा को लेकर जो प्रावधान किए गए हैं, उन्हें कागजों तक सीमित न रखते हुए हर संस्थान में अक्षरशः लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यही असमानता आगे चलकर समाज में गहरी खाइयों को जन्म देती है।
इतिहास की ओर नजर डालते हुए प्रोफेसर जे.एस. राजपूत ने कोठारी आयोग और 10$2 शिक्षा ढांचे को लड़कियों के लिए विज्ञान और गणित के द्वार खोलने वाला एक बड़ा परिवर्तन बताया। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था, जब यह मान लिया गया था कि लड़कियां गणित और विज्ञान जैसे विषयों में सक्षम नहीं होतीं और उन्हें कताई, बुनाई या गृह विज्ञान जैसे सीमित विकल्पों तक ही रखा जाता था। राजपूत ने डॉ. डी.एस. कोठारी को याद करते हुए कहा कि उन्होंने इस सोच को चुनौती दी और यह स्पष्ट किया कि लड़कियां भी विज्ञान और गणित में उतनी ही सक्षम हैं, जितने लड़के। 10$2 फॉर्मूले के जरिए कक्षा दसवीं तक विज्ञान और गणित को अनिवार्य बनाकर लड़कियों को समान अवसर दिए गए, जिसका परिणाम यह हुआ कि आज लड़कियां विज्ञान, अंतरिक्ष, परमाणु अनुसंधान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में देश का नाम रोशन कर रही हैं।
शिक्षा को व्यापक आर्थिक विकास से जोड़ते हुए आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर सीमा शर्मा ने लैंगिक समानता को समावेशी विकास की बुनियादी शर्त बताया। उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा के हर स्तर पर लड़कियों और लड़कों के बीच समानता सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक समावेशी विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा। प्रोफेसर शर्मा का मानना है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव है। उन्होंने दैनिक सहर प्रजातंत्र समाचार से बातचीत में कहा कि भारत जैसे देश में, जहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है, यदि लड़कियों को समान अवसर मिलें तो यह देश की आर्थिक प्रगति को नई गति दे सकता है।
वैश्विक परिदृश्य की तुलना करते हुए प्रोफेसर सीमा शर्मा ने बताया कि विकसित देशों में महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी 70 प्रतिशत से अधिक है, जबकि भारत में यह आंकड़ा लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है। उनके अनुसार, यह अंतर एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन साथ ही यह भारत के लिए एक अवसर भी है। शर्मा ने कहा कि यदि भारत इस अंतर को एक मिशन के रूप में लेकर काम करे और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए, तो यह देश को वैश्विक विकास पटल पर अग्रणी बना सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रमों में निवेश कर भारत अपनी इस कमजोरी को बड़ी ताकत में बदल सकता है, जिससे आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक संतुलन भी मजबूत होगा।
लैंगिक बजटिंग पर जोर देते हुए प्रोफेसर सीमा शर्मा ने कहा कि लड़कियों के लिए उच्च और लक्षित आवंटन कई स्तरों पर सकारात्मक बदलाव ला सकता है। उनके अनुसार, यदि शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रमों को लैंगिक दृष्टिकोण से डिजाइन किया जाए, तो इसका सीधा लाभ महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सशक्तिकरण के रूप में सामने आएगा। शर्मा ने कॉर्पाेरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी सीएसआर की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि सीएसआर फंडों का उपयोग यदि बिखरे हुए प्रयासों के बजाय एक संरचित और रणनीतिक तरीके से किया जाए, तो इससे महिलाओं के जीवन में उच्च प्रभाव वाले परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उनका मानना है कि निजी क्षेत्र और अकादमिक संस्थानों की साझेदारी से इस दिशा में बड़े बदलाव संभव हैं।
अकादमिक जगत की भूमिका को रेखांकित करते हुए प्रोफेसर सीमा शर्मा ने आईआईटी दिल्ली के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संस्थान सूक्ष्म स्तर की महिला उद्यमियों को व्यावसायिक शिक्षा प्रदान कर रहा है और उनके व्यवसायों को बढ़ाने में सहयोग कर रहा है। शर्मा के अनुसार, इस तरह की पहल न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाती हैं, बल्कि समाज में उनकी भूमिका और पहचान को भी मजबूत करती हैं। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनती हैं, तो इसका सकारात्मक असर पूरे परिवार और समुदाय पर पड़ता है, जिससे विकास का दायरा और व्यापक हो जाता है।
शहरी और ग्रामीण भारत के बीच शिक्षा की खाई पर चिंता जताते हुए अर्थशास्त्री शरद कोहली ने कहा कि असमान पहुंच आज भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। उनके अनुसार, गांवों, टियर-चार और टियर-पांच शहरों में दी जा रही शिक्षा और बड़े महानगरों के पब्लिक स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं के बीच बड़ा अंतर है। कोहली ने कहा कि यदि हमें भविष्य के लिए लड़कियों को तैयार करना है, तो इस अंतर को पाटना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे की मासूमियत में उसकी कोई गलती नहीं होती, इसलिए शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह हर बच्चे को समान अवसर प्रदान करे, चाहे वह किसी भी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि से क्यों न आता हो।
लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों की वकालत करते हुए शरद कोहली ने सुझाव दिया कि जो परिवार अपनी बेटियों को शिक्षा पूरी करने की अनुमति देते हैं, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, इस तरह के प्रोत्साहन न केवल परिवारों का नजरिया बदल सकते हैं, बल्कि समाज में शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल भी बना सकते हैं। कोहली ने कहा कि यदि लड़कियां पूरी तरह से शिक्षित होती हैं, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई देगा। उनके शब्दों में, एक शिक्षित लड़की बेहतर समाज की नींव रखती है और यही नींव एक मजबूत भारत का निर्माण करती है।
सरकारी स्कूलों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए सर्वाेदय को-एड विद्यालय के प्रिंसिपल और राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित अवधेश कुमार झा ने कहा कि आगामी बजट 2026 में सरकारी स्कूलों को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और डिजिटल संसाधनों की जरूरत आज भी महसूस की जा रही है। झा के अनुसार, यदि इन क्षेत्रों में पर्याप्त फंडिंग सुनिश्चित की जाती है, तो गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा का सपना साकार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए सीखने के अंतर को पाटना बेहद जरूरी है, ताकि वे भी समान प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ सकें।
राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों की यह साझा राय सामने आई है कि प्रतीकात्मक आयोजनों से आगे बढ़कर ठोस वित्तीय और संस्थागत कदम उठाने का समय आ चुका है। केंद्रीय बजट 2026 को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि यह शिक्षा पर खर्च, जेंडर बजटिंग और समावेशी विकास से जुड़े लंबे समय से किए जा रहे वादों को वास्तविकता में बदलने की दिशा में निर्णायक साबित होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि असली परीक्षा इसी बात में है कि क्या यह बजट भारत की लड़कियों के जीवन में स्थायी और सकारात्मक बदलाव ला पाएगा या नहीं। राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक संकल्प है, जो यह याद दिलाता है कि जब तक देश की हर लड़की सुरक्षित, शिक्षित और सशक्त नहीं होगी, तब तक विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।





