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गदरपुर से काशीपुर तक सियासी घमासान किसान आत्महत्या पर भड़की राजनीति में गगन कांबोज का तीखा प्रहार

किसान सुखवंत सिंह की मौत से उठी संवेदनशील बहस ने सत्ताधारी गलियारों में बेचैनी बढ़ाई, आरोप-प्रत्यारोप के बीच गगन कांबोज ने संगठन, सत्ता और जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े कर माहौल गरमा दिया।

काशीपुर। राजनीतिक सरगर्मियों से घिरे उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में इन दिनों बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और भावनात्मक अपीलों का दौर तेज हो गया है। गदरपुर से लेकर काशीपुर तक फैली इस राजनीतिक हलचल का केंद्र बने हैं गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय, काशीपुर के महापौर दीपक बाली और सामाजिक कार्यकर्ता व पूर्व विधानसभा प्रत्याशी गगन कांबोज। घटनाक्रम की शुरुआत उस समय मानी जा रही है जब गदरपुर क्षेत्र में किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का मामला सामने आया, जिसने न केवल स्थानीय राजनीति को झकझोर दिया बल्कि पूरे प्रदेश में संवेदनशील बहस को जन्म दे दिया। इस प्रकरण के बाद अलग-अलग राजनीतिक मंचों से लगाए गए आरोपों ने माहौल को और गर्म कर दिया। गदरपुर में प्रदेश महामंत्री गुंजन सुखीजा द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद काशीपुर में महापौर दीपक बाली की ओर से विधायक अरविंद पांडेय पर तीखे प्रहार किए गए, जिससे सियासी तनाव खुलकर सामने आ गया।

इसी उथल-पुथल के बीच काशीपुर के समाजसेवी गगन कांबोज ने अचानक राजनीतिक मंच पर आक्रामक तेवरों के साथ एंट्री करते हुए विधायक अरविंद पांडेय के समर्थन में खुलकर मोर्चा संभाल लिया। प्रेस वार्ता में गगन कांबोज ने न केवल महापौर दीपक बाली के बयानों पर सवाल उठाए बल्कि गदरपुर में उठे किसान आत्महत्या मामले को लेकर भी कई गंभीर बातें रखीं। उनका कहना था कि किसी भी दुखद घटना पर राजनीति करना गलत है, लेकिन यदि पीड़ित परिवार स्वयं जांच की मांग कर रहा है तो उस मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अरविंद पांडेय ने वही कहा जो मृतक किसान के वीडियो में सामने आया था और उसी आधार पर सीबीआई जांच की बात रखी गई। गगन कांबोज ने सवाल किया कि यदि सच्चाई सामने लाने के लिए जांच की मांग करना अपराध है, तो फिर न्याय की अवधारणा का क्या अर्थ रह जाता है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए गगन कांबोज ने काशीपुर नगर निगम की राजनीति को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि महापौर दीपक बाली बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें काशीपुर की जनता ने चुना है, लेकिन इस दावे की नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। गगन कांबोज ने चुनौती भरे स्वर में कहा कि यदि महापौर वास्तव में जनता की पसंद से चुने गए हैं तो सार्वजनिक रूप से कसम खाकर यह बात कहें। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जिस चुनाव में महापौर और वह स्वयं आमने-सामने थे, उसमें मात्र 700-800 वोटों का अंतर था और उन्होंने केवल 15 दिनों में चुनाव लड़ा था। उनके अनुसार, काशीपुर की जनता भली-भांति जानती है कि किसने किस तरह चुनाव लड़ा और किस प्रकार राजनीतिक समीकरण बदले।

किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या को लेकर उठे सवालों पर गगन कांबोज ने बेहद भावुक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब कोई किसान बार-बार न्याय की गुहार लेकर जनप्रतिनिधियों के दरवाजे पर जाता है और उसकी सुनवाई नहीं होती, तो यह पूरे तंत्र की विफलता को दर्शाता है। गगन कांबोज ने आरोप लगाया कि पीड़ित परिवार कई बार महापौर दीपक बाली के पास पहुंचा, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया। यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि समय रहते हस्तक्षेप करते, तो शायद एक परिवार को इस त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस मामले की निष्पक्ष सीबीआई जांच होती है, तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं, जिनसे बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग भी बच नहीं पाएंगे।

प्रेस वार्ता के दौरान गगन कांबोज ने यह स्पष्ट किया कि उनकी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है और न ही वह किसी राजनीतिक पद की लालसा में बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होंने महापौर दीपक बाली को बड़े भाई की संज्ञा देते हुए कहा कि सम्मान अपनी जगह है, लेकिन गलत को गलत कहना भी उतना ही जरूरी है। उनका कहना था कि यदि कोई भी गरीब, किसान या दबा-कुचला व्यक्ति अन्याय का शिकार होता है, तो उसकी आवाज उठाना उनका नैतिक कर्तव्य है। इसी भावना के तहत वह गदरपुर पहुंचे थे, जहां कई वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि भी अपने-अपने विवेक से पहुंचे। उन्होंने सवाल किया कि जब सभी लोग अपने जमीर की आवाज पर वहां पहुंचे थे, तो इसे राजनीतिक साजिश क्यों कहा जा रहा है। राजनीतिक आरोपों की कड़ी में गगन कांबोज ने महापौर द्वारा प्रयुक्त शब्दों पर भी कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बलराज पासी को ‘धृतराष्ट्र’ कहना न केवल असंवेदनशील है बल्कि उस परिवार के प्रति भी अपमानजनक है जिसने पार्टी के लिए दशकों तक संघर्ष किया। गगन कांबोज ने याद दिलाया कि स्वर्गीय योगराज पासी जैसे नेताओं ने उस दौर में पार्टी को सींचा जब जिले में कोई नामलेवा तक नहीं था। ऐसे में आज के राजनीतिक परिदृश्य में नए-नए पदों पर पहुंचे लोगों द्वारा वरिष्ठ नेताओं पर इस तरह की टिप्पणी करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने मांग की कि महापौर दीपक बाली को अपने शब्दों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।

राजनीतिक इतिहास की चर्चा करते हुए गगन कांबोज ने अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि उनका परिवार लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा रहा है और उन्होंने स्वयं भी बाल्यकाल से स्वयंसेवक के रूप में काम किया। कोविड काल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय जब उन्होंने आम जनता की पीड़ा देखी, तो चुप रहना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने आवाज उठाई और उसी का परिणाम यह हुआ कि उन्हें पार्टी विरोधी के रूप में देखा जाने लगा। गगन कांबोज ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी पार्टी का विरोध नहीं किया, बल्कि जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाए। उनके अनुसार, सवाल पूछना और जनहित में बोलना किसी भी लोकतंत्र की आत्मा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लगाए गए ‘गिरोह’ शब्द पर भी गगन कांबोज ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी, कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुना और विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी जैसे नामों को एक ही लकीर में खड़ा कर गिरोह कहा जाता है, तो यह शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन है। उन्होंने सवाल उठाया कि गिरोह शब्द का प्रयोग आखिर किस संदर्भ में किया जा रहा है और इसका उद्देश्य क्या है। उनके अनुसार, इस तरह की भाषा से न केवल पार्टी की छवि धूमिल होती है बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटता है। गगन कांबोज ने यह भी आरोप लगाया कि काशीपुर में कई ऐसे पुराने कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन पार्टी को समर्पित कर दिया, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अचानक राजनीति में आए कुछ लोगों को बड़े पद सौंप दिए गए, जबकि जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत को भुला दिया गया। उनके मुताबिक, यही कारण है कि आज असंतोष की आग सुलग रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने स्वयं महापौर के चुनाव में समर्थन किया था और इसके लिए वह अपने कई समर्थकों की नाराजगी भी झेल चुके हैं। आज वह सार्वजनिक रूप से उन सभी से क्षमा मांगते हैं जिनका दिल उस फैसले से दुखा।

भावनात्मक अंदाज में गगन कांबोज ने कहा कि उन्हें यह अंदेशा है कि इस प्रेस वार्ता के बाद उनके खिलाफ साजिशें रची जा सकती हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें जेल भेजा जा सकता है या उनकी जान को भी खतरा हो सकता है, लेकिन यदि काशीपुर और उत्तराखंड के हित में बलिदान देना पड़ा तो वह पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने अपने बयान में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जमीर जिंदा है और वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे। उनके अनुसार, अहंकार का अंत हमेशा होता है और इतिहास गवाह है कि सत्ता का घमंड किसी का स्थायी नहीं रहा। अरविंद पांडेय के समर्थन में खुलकर बोलते हुए गगन कांबोज ने कहा कि विधायक को काशीपुर आने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि यदि अरविंद पांडेय किसी पीड़ित की आवाज उठाने काशीपुर आते हैं, तो उनका विरोध करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे उत्तराखंड देवभूमि में यदि कहीं भी किसी गरीब या किसान के साथ अन्याय होगा, तो वहां जाना और आवाज उठाना स्वाभाविक है। इसे राजनीतिक रंग देना सही नहीं है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाते हुए गगन कांबोज ने कहा कि यदि शासन और प्रशासन पर किसी एक व्यक्ति का इतना व्यापक और प्रभावी नियंत्रण माना जाता है, तो फिर इस तरह की दर्दनाक और संवेदनशील घटनाएं आखिर कैसे घट रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसान आत्महत्या जैसी घटनाओं को किसी एक चेहरे, एक पद या एक नाम तक सीमित करना सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है। यह केवल किसी व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है, जो समय रहते पीड़ित की आवाज सुनने में असफल रहा। गगन कांबोज ने कहा कि जब कोई किसान बार-बार न्याय की गुहार लगाता है और उसे निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलता, तो यह शासन-प्रशासन दोनों की सामूहिक जवाबदेही बनती है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि एसआईटी जांच का असली उद्देश्य यही होना चाहिए कि सच सामने आए और यह तय हो सके कि दोषी कौन है और निर्दोष कौन। उनकी मांग स्पष्ट है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को साजिश या दबाव में जेल न जाना पड़े, और वहीं यदि कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे कानून के अनुसार सख्त सजा से कोई नहीं बचा सके।

राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच गगन कांबोज ने केवल व्यक्तियों तक सीमित न रहते हुए संगठनात्मक भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी महत्वपूर्ण और चर्चित प्रेस वार्ता के दौरान भारतीय जनता पार्टी संगठन की ओर से कोई भी अधिकृत प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था। इससे स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या संगठन की पकड़ अब इतनी कमजोर हो गई है कि वह अपने ही नेताओं के बीच पनपते मतभेदों और सार्वजनिक टकराव को नियंत्रित करने में असमर्थ हो गया है। गगन कांबोज ने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के हालिया बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने सभी नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर संयमित और मर्यादित भाषा का प्रयोग करने की सलाह दी थी। कांबोज का कहना था कि जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं संतुलन की बात कर रहा है, तो जमीनी स्तर पर उसका पालन सुनिश्चित करना संगठन की जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते संगठन ने इन परिस्थितियों पर संज्ञान नहीं लिया और आंतरिक अनुशासन कायम नहीं किया, तो इसका सीधा और सबसे बड़ा नुकसान पार्टी की साख, कार्यकर्ताओं के मनोबल और आने वाले राजनीतिक भविष्य को उठाना पड़ेगा।

महापौर दीपक बाली और गगन कांबोज के संबंधों को लेकर जब गगन कांबोज से सीधे सवाल किए गए, तो उन्होंने साफ और भावुक शब्दों में अपना पक्ष रखा। गगन कांबोज ने कहा कि महापौर दीपक बाली उनके लिए पहले भी बड़े भाई थे और आज भी हैं। उनके बीच किसी तरह की व्यक्तिगत कटुता, वैमनस्य या निजी टकराव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि सोच और बयानों के खिलाफ है। गगन कांबोज ने कहा कि जिस तरह से सांसद प्रतिनिधि बलराज पासी को सार्वजनिक मंच से “धृतराष्ट्र” कहा गया, उससे उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा है। यह बयान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी आहत करने वाला है। उन्होंने कहा कि बलराज पासी जैसे वरिष्ठ नेता, जिन्होंने पार्टी और समाज के लिए जीवन भर संघर्ष किया, उनके लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि सम्मान और मर्यादा राजनीति की बुनियाद होनी चाहिए। आलोचना हो सकती है, सवाल भी उठ सकते हैं, लेकिन शब्दों की सीमा पार करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है। यही पीड़ा और यही संवेदना उन्हें यह बात सार्वजनिक रूप से कहने के लिए मजबूर कर रही है।

समापन की ओर बढ़ते हुए गगन कांबोज ने यह स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों के खिलाफ है जो काशीपुर और गदरपुर जैसे क्षेत्रों में पैदा की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि शहर की टूटी सड़कों, बुनियादी समस्याओं और आम जनता की परेशानियों पर ध्यान देना ही जनप्रतिनिधियों का असली काम है। यदि सड़कें बन रही हैं तो यह सराहनीय है, लेकिन उसके पीछे की पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाला समय सच्चाई को सामने लाएगा और जनता स्वयं तय करेगी कि कौन सही है और कौन गलत।

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