नई दिल्ली(सुनील कोठारी)।राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर विदेश नीति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है और इस बार निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि क्या एक बार फिर भारत के राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखकर अमेरिका के दबाव में बड़ा रणनीतिक फैसला ले लिया गया है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारत ने फिर से आत्मसमर्पण किया है। कांग्रेस का दावा है कि ईरान के चाहबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से भारत को चुपचाप बाहर कर दिया गया है और इस प्रक्रिया में देश की जनता के लगभग 120000000 डॉलर, यानी करीब 1000 करोड़ रुपये का सार्वजनिक निवेश डूब गया। यह वही परियोजना थी जिसे वर्षों तक भारत की विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया गया, लेकिन अब अचानक इसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस ने इसे न केवल आर्थिक नुकसान बल्कि भारत की रणनीतिक साख पर गंभीर चोट करार दिया है। आरोप है कि सरकार ने बिना संसद, बिना जनता और बिना किसी आधिकारिक बयान के इस अहम परियोजना से हाथ खींच लिए।
राजनीतिक तापमान उस वक्त और बढ़ गया जब कांग्रेस ने इस मुद्दे पर तीखा हमला करते हुए सोशल मीडिया पर ट्वीट किया। ट्वीट में सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा गया कि “हज वंस अगेन सरेंडर टू ट्रंप”। कांग्रेस का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार ने अमेरिका के इशारों पर कदम पीछे खींचे हों। सवाल यह भी उठाया गया कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी वाला चाहबहार पोर्ट, जिसे कभी भारत की भू-राजनीतिक सफलता का प्रतीक माना गया, आज अचानक गायब कर दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने न केवल चाहबहार पोर्ट से अपने ऑपरेशन रोक दिए, बल्कि उससे जुड़ी आधिकारिक वेबसाइट तक बंद करवा दी गई। हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि इतने बड़े और संवेदनशील फैसले पर सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, न संसद में जवाब दिया गया और न ही देश की जनता को भरोसे में लिया गया।
जानकारों का कहना है कि यह वही चाहबहार पोर्ट था जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया के लिए भारत का “गेम चेंजर” बताया था। यह परियोजना भारत को पाकिस्तान को बाइपास करते हुए सीधे व्यापारिक मार्ग उपलब्ध कराती थी। इसके जरिए भारत को अफगानिस्तान तक मानवीय सहायता पहुंचाने में मदद मिलती थी और सेंट्रल एशिया के बाजारों तक सीधी पहुंच का रास्ता खुलता था। इतना ही नहीं, इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जवाब के रूप में भी देखा जा रहा था। लेकिन अब कांग्रेस पूछ रही है कि क्या अमेरिका की नाराजगी के डर से भारत ने अपनी पूरी विदेश नीति वाशिंगटन के सामने गिरवी रख दी है। आरोप यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दबाव में भारत ने ईरान से दूरी बनानी शुरू कर दी और इसका सीधा असर चाहबहार परियोजना पर पड़ा।
कांग्रेस ने अपने आरोपों के समर्थन में एक अहम तारीख की ओर भी इशारा किया है। पार्टी के अनुसार 12 जनवरी 2026 को डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया था कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा, उस पर अमेरिका 25 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। कांग्रेस का दावा है कि इस ऐलान के ठीक बाद भारत के रुख में अचानक बदलाव देखने को मिला। पार्टी का कहना है कि यह महज संयोग नहीं हो सकता। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह फैसला दबाव में लिया गया या फिर अमेरिका की चेतावनी के डर से भारत ने अपने दीर्घकालिक हितों की बलि दे दी। कांग्रेस के अनुसार मोदी सरकार ने वही किया जो अमेरिका चाहता था। पहले रूस के मामले में दूरी बनाई गई और अब ईरान के साथ भी बैकफुट पर आना पड़ा। विपक्ष का आरोप है कि यह सिलसिला भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को कमजोर करता जा रहा है।
इस पूरे विवाद में कांग्रेस यह भी रेखांकित कर रही है कि चाहबहार कोई साधारण परियोजना नहीं थी। यह भारत की भू-राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा था। इसके जरिए भारत न केवल पाकिस्तान की नाकेबंदी को तोड़ सकता था, बल्कि अफगानिस्तान में मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण कार्यों में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता था। इसके अलावा सेंट्रल एशिया के देशों के साथ भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूती मिलती थी। कांग्रेस का कहना है कि ऐसे समय में, जब चीन सीमा पर दबाव बनाए बैठा है, पाकिस्तान और बांग्लादेश की नजदीकियां बढ़ रही हैं और श्रीलंका के साथ रिश्तों में तनाव है, तब इस तरह के रणनीतिक प्रोजेक्ट से पीछे हटना भारत को और कमजोर करता है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या सरकार ने इस व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ पर गंभीरता से विचार किया या सिर्फ अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई।
विपक्ष ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि ईरान और इजरायल के बीच तनाव के दौरान चाहबहार पोर्ट अस्थायी रूप से बंद हुआ था, तो क्या भारत को अपनी रणनीति को और मजबूत नहीं करना चाहिए था। कांग्रेस का कहना है कि अस्थायी हालात के चलते स्थायी तौर पर पीछे हटना समझ से परे है। आरोप है कि सरकार ने बिना किसी वैकल्पिक योजना के इस महत्वपूर्ण परियोजना को छोड़ दिया। आज स्थिति यह बताई जा रही है कि अमेरिका के एक बयान के बाद भारत ने कदम पीछे खींच लिए और जनता का 120000000 डॉलर का निवेश हवा हो गया। कांग्रेस ने सीधे दो सवाल सरकार के सामने रखे हैं—क्या अब भारत की विदेश नीति व्हाइट हाउस तय करेगा और क्या नरेंद्र मोदी ने अमेरिका को भारत पर दबाव बनाने की खुली छूट दे दी है।
कांग्रेस इस बहस में ऐतिहासिक उदाहरणों का भी हवाला दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इंदिरा गांधी के दौर में भी अमेरिका की धमकियों का सामना किया गया था, लेकिन तब भारत ने अपने फैसले खुद लिए थे। आरोप है कि मौजूदा सरकार हर अंतरराष्ट्रीय संकट में झुकती नजर आ रही है। विपक्ष यह भी याद दिला रहा है कि खुद डोनाल्ड ट्रंप यह कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी उन्हें खुश करने की कोशिश कर रहे हैं और तारीफ के मुद्दे पर भारत दबाव में रहता है। कांग्रेस का तर्क है कि अगर ईरान के मुद्दे पर भी भारत पीछे हट गया है, तो आने वाले समय में अमेरिका और ज्यादा शर्तें थोप सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत की स्वतंत्र विदेश नीति सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गई है।
मामले का सबसे गंभीर पहलू वह आर्थिक नुकसान बताया जा रहा है, जिसे लेकर अब तक कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई गई। कांग्रेस पूछ रही है कि क्या जनता के 120000000 डॉलर यूं ही डूब जाने चाहिए थे, बिना किसी जवाबदेही और बिना किसी सार्वजनिक स्पष्टीकरण के। विपक्ष का कहना है कि चाहबहार सिर्फ एक पोर्ट नहीं था, बल्कि यह भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। यदि भारत वास्तव में इस परियोजना से बाहर हो गया है, तो यह केवल आर्थिक झटका नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक नुकसान भी है। अब नजरें सरकार पर टिकी हैं कि वह इस पूरे मामले पर कब और क्या जवाब देती है। या फिर यह चुप्पी ही इस बात का संकेत है कि डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में एक और बड़ा राष्ट्रीय फैसला गिरवी रख दिया गया।





