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हरेला पर संस्कृत विश्वविद्यालय में वृक्षारोपण से गूंजा पर्यावरण संरक्षण का संकल्प छात्रावास निर्माण को मिली रफ्तार

कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय और संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला ने रुद्राक्ष सहित विभिन्न पौधे रोपकर हरियाली का संदेश दिया, साथ ही निर्माणाधीन बालिका छात्रावास का निरीक्षण कर 31 जुलाई तक कार्य पूरा करने के निर्देश दिए।

हरिद्वार। उत्तराखंड की लोक परंपराओं, प्रकृति संरक्षण की सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व का जीवंत संदेश उस समय देखने को मिला, जब उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में लोक पर्व हरेला पूरे उत्साह, श्रद्धा और व्यापक सहभागिता के साथ मनाया गया। हरियाली, जैव विविधता और प्रकृति के संरक्षण के प्रतीक इस पर्व को केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे जनजागरण के अभियान का स्वरूप देने का प्रयास किया गया। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय तथा उत्तराखण्ड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला ने रुद्राक्ष सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी तथा विद्यार्थियों ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई और सामूहिक रूप से वृक्षारोपण अभियान को सफल बनाया। कार्यक्रम के दौरान यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने हरेला पर्व को उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरणीय चेतना से जोड़ते हुए इसे भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का माध्यम बताया। पूरे परिसर में हरियाली के प्रति समर्पण, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सांस्कृतिक मूल्यों का ऐसा वातावरण दिखाई दिया, जिसने उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का अहसास कराया।

वृक्षारोपण कार्यक्रम के उपरांत आयोजित सभा में कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय ने अपने संबोधन में हरेला पर्व की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में हरेला केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से उत्तराखंड की परंपराओं में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है तथा उन्हें जीवन, समृद्धि और संतुलित पर्यावरण का आधार समझा गया है। उन्होंने कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा और शोध का केंद्र बनकर ही अपनी भूमिका पूरी नहीं कर सकता, बल्कि समाज में पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना के संवाहक के रूप में भी उसे अग्रणी भूमिका निभानी होगी। कुलपति ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न रहें, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी नियमित देखभाल करने का संकल्प ले, तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण की चुनौती को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल स्रोतों और हरित वातावरण को भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए कहा कि आज लगाया गया प्रत्येक पौधा आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ और सुरक्षित जीवन की मजबूत नींव बनेगा। उन्होंने संस्कृत साहित्य में वर्णित प्रकृति के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव पर्यावरण संरक्षण को मानव जीवन के मूल कर्तव्यों में शामिल करती रही है।

कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिवार के वरिष्ठ विद्वानों ने भी पर्यावरण और भारतीय संस्कृति के पारस्परिक संबंधों पर अपने विचार रखे। बीएड विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश चंद्र पंत ने संस्कृत के एक प्राचीन पौराणिक श्लोक का उल्लेख करते हुए उसका भावार्थ समझाया और कहा कि भारतीय मनीषा ने हजारों वर्ष पूर्व ही वृक्षों के महत्व को स्वीकार करते हुए एक वृक्ष की तुलना दस पुत्रों के समान की है। उन्होंने कहा कि यह उपमा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति भारतीय समाज की दूरदर्शी सोच का परिचायक भी है। उन्होंने विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों से आग्रह किया कि आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते शहरीकरण के बीच पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण को जनआंदोलन का स्वरूप देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर वैदिक मंत्रोच्चार, हरेला गीतों और पारंपरिक सांस्कृतिक वातावरण से गुंजायमान रहा। लोक पर्व की गरिमा के अनुरूप आयोजित कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण का संदेश सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। वृक्षारोपण अभियान में शामिल प्रत्येक प्रतिभागी ने पौधों की सुरक्षा और नियमित देखभाल का संकल्प भी लिया। कार्यक्रम के दौरान यह स्पष्ट रूप से महसूस किया गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन पर्यावरण संरक्षण को केवल प्रतीकात्मक गतिविधि न मानकर उसे संस्थागत संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उत्तराखण्ड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला ने स्वयं रुद्राक्ष का पौधा रोपित कर अभियान की शुरुआत को और अधिक सार्थक बनाया। उन्होंने समस्त उपस्थितजनों को हरेला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हरियाली ही स्वस्थ, संतुलित और समृद्ध जीवन की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं रह गया है, बल्कि प्रत्येक नागरिक को इसे अपनी दैनिक जीवनचर्या का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने सभी विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और समाज के प्रत्येक वर्ग से वर्ष में कम से कम एक पौधा लगाने और उसकी सुरक्षा का संकल्प लेने का आह्वान किया। सचिव ने कहा कि यदि वृक्षारोपण केवल एक दिन का कार्यक्रम बनकर रह जाएगा तो उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे, इसलिए पौधों की निरंतर देखभाल और संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन की चेतना विकसित करना भी है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार के सामूहिक प्रयासों की प्रशंसा करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के अभियान आने वाली पीढ़ियों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना को और अधिक मजबूत करेंगे।

हरेला पर्व के आयोजन के उपरांत उत्तराखण्ड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला ने विश्वविद्यालय परिसर में निर्माणाधीन पांच मंजिला बालिका छात्रावास का विस्तृत निरीक्षण भी किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने निर्माण कार्य की प्रगति, गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों तथा उपलब्ध सुविधाओं की विस्तार से समीक्षा की और कार्यदायी संस्था के प्रतिनिधियों से निर्माण की वर्तमान स्थिति की जानकारी प्राप्त की। सचिव ने कार्यदायी संस्था को स्पष्ट निर्देश दिए कि छात्रावास का निर्माण कार्य हर हाल में 31 जुलाई 2026 तक पूर्ण किया जाए, ताकि इसी शैक्षणिक सत्र से छात्राओं को आधुनिक और सुरक्षित छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके। उन्होंने निर्माण कार्य में गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता न करने पर विशेष बल देते हुए कहा कि छात्राओं के लिए सुरक्षित, सुविधाजनक और उच्च मानकों वाला आवासीय परिसर विश्वविद्यालय की प्राथमिकताओं में शामिल है। निरीक्षण के दौरान कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय, कुलसचिव दिनेश कुमार, कार्यदायी संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर तथा विश्वविद्यालय के अनेक डीन और अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के समापन अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव दिनेश कुमार, वरिष्ठ आचार्य प्रोफेसर मोहन बलोदी, प्रोफेसर दिनेश चमोला, विभागाध्यक्ष योग प्रोफेसर लक्ष्मीनारायण जोशी, बीएड विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश पन्त, संस्कृत अकादमी के सचिव प्रोफेसर विनय कुमार विद्यालंकार, डॉ कामाख्या कुमार, सहायक कुलसचिव सुनील कुमार, शोध अधिकारी डॉ महेश ध्यानी, निजी सचिव मनोज गहतोड़ी सहित विश्वविद्यालय के अनेक अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और आधारभूत सुविधाओं के विकास को समान महत्व देते हुए समग्र प्रगति की दिशा में लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

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