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वन चौकी पर उबाल आत्मदाह की चेतावनी से हिला प्रशासन मारपीट विवाद ने मचाया बवाल

जुर्माना वसूली के बाद भी बेरहमी से पिटाई के आरोपों पर भड़के ग्रामीण, वन चौकी का घेराव कर आरोपित कर्मियों के निलंबन और कानूनी कार्रवाई की मांग, आत्मदाह की चेतावनी से प्रशासन में मचा हड़कंप।

रामनगर। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की ढेला रेंज से सामने आया एक विवाद अब केवल वन विभाग और ग्रामीणों के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे क्षेत्र में कानून व्यवस्था, वन कर्मियों की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। कथित मारपीट की इस घटना ने सोमवार को उस समय बेहद संवेदनशील मोड़ ले लिया, जब पीड़ित शिव गिरी के भतीजे चंदन गिरी ने हाथ में पेट्रोल की बोतल लेकर ढेला वन चौकी की छत पर चढ़ते हुए आत्मदाह की चेतावनी दे डाली। इस घटनाक्रम ने मौके पर मौजूद ग्रामीणों, वन विभाग के अधिकारियों और पुलिस प्रशासन के बीच अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया। देखते ही देखते बड़ी संख्या में ग्रामीण वन चौकी के बाहर एकत्र हो गए और आरोपित वन कर्मियों के खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई की मांग को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना था कि यदि किसी व्यक्ति पर वन अधिनियम के उल्लंघन का आरोप था तो उसके खिलाफ कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि उसके साथ कथित रूप से अमानवीय व्यवहार किया जाता। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय पुलिस बल, पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह और रेंज अधिकारी नवीन पांडे तत्काल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने काफी देर तक धैर्य और संयम के साथ चंदन गिरी से बातचीत की, उसे समझाया और किसी तरह सुरक्षित नीचे उतारने में सफलता प्राप्त की। यदि समय रहते प्रशासन सक्रियता नहीं दिखाता तो यह विरोध प्रदर्शन किसी बड़ी अप्रिय घटना में भी बदल सकता था, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ने की आशंका थी।

रविवार को हुई कथित घटना को लेकर ग्रामीणों ने जो आरोप लगाए हैं, उन्होंने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। ग्रामीणों के अनुसार शिव गिरी अपने एक अन्य साथी के साथ जंगल क्षेत्र में दैनिक उपयोग के लिए सूखी एवं जलाऊ लकड़ी लेने गए थे। इसी दौरान वहां तैनात फॉरेस्ट गार्ड अवनीश कुमार तथा वाचर्स अशोक रावत और पूरन सिंह बिष्ट ने दोनों को रोक लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वन कर्मियों ने पहले कथित रूप से जुर्माना वसूला और उसके बाद भी शिव गिरी के साथ मारपीट की गई। आरोप है कि उन्हें डंडों और लाठियों से इस कदर पीटा गया कि उनकी पीठ और शरीर पर गंभीर चोटों के स्पष्ट निशान उभर आए। परिजनों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया, जहां चिकित्सकों द्वारा उनका मेडिकल परीक्षण भी किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि मेडिकल रिपोर्ट पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। घटना की सूचना गांव में पहुंचते ही लोगों में भारी आक्रोश फैल गया और सोमवार सुबह से ही बड़ी संख्या में ग्रामीण ढेला वन चौकी पहुंचने लगे। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति ने वन क्षेत्र से लकड़ी लेने का प्रयास भी किया था, तब भी उसे कानून के दायरे में कार्रवाई के लिए पकड़ा जा सकता था, लेकिन कथित रूप से की गई मारपीट किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं कही जा सकती। इसी आरोप ने पूरे विवाद को केवल वन अपराध तक सीमित न रखकर मानवाधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दे से भी जोड़ दिया।

विरोध प्रदर्शन के दौरान जिस प्रकार का माहौल देखने को मिला, उसने प्रशासन की चिंता और बढ़ा दी। प्रदर्शनकारियों में केवल ग्रामीण ही नहीं थे, बल्कि क्षेत्र की जनप्रतिनिधि मंजू नेगी सहित अनेक स्थानीय प्रतिनिधि भी खुलकर उनके समर्थन में सामने आए। सभी ने एक स्वर में मांग की कि आरोपित फॉरेस्ट गार्ड अवनीश कुमार, वाचर्स अशोक रावत और पूरन सिंह बिष्ट को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए तथा उनके खिलाफ कानूनी मुकदमा दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराई जाए। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि घटनास्थल पर मौजूद एक महिला फॉरेस्ट गार्ड ने भी प्रदर्शन के दौरान लोगों के साथ अभद्र व्यवहार किया और ऐसी भाषा का प्रयोग किया, जिससे पहले से नाराज लोगों का गुस्सा और अधिक बढ़ गया। प्रदर्शन के दौरान कई बार स्थिति तनावपूर्ण होती दिखाई दी, लेकिन पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने लगातार लोगों से संवाद बनाए रखा। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि यदि समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उनका कहना था कि जंगलों की सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी कानून का पालन करने वाले अधिकारियों का संवेदनशील और मानवीय व्यवहार भी है। लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यदि वन विभाग अपने कर्मचारियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करता तो इससे जनता का भरोसा सरकारी संस्थाओं से उठ सकता है। यही कारण रहा कि पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान कार्रवाई की मांग सबसे प्रमुख मुद्दा बनी रही।

घटना के बाद सबसे भावुक और मार्मिक बयान पीड़ित के भतीजे चंदन गिरी का सामने आया, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी। चंदन गिरी ने कहा कि यदि उनके चाचा शिव गिरी ने वास्तव में वन अधिनियम का कोई उल्लंघन किया था तो वन विभाग के पास उन्हें पकड़ने, चालान करने और कानूनी प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार था, लेकिन किसी भी सरकारी कर्मचारी को किसी व्यक्ति के साथ कथित रूप से हिंसक व्यवहार करने या उसे बुरी तरह पीटने का अधिकार नहीं दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के बाद भी वन विभाग का कोई वरिष्ठ अधिकारी अस्पताल जाकर पीड़ित का हालचाल जानने तक नहीं पहुंचा, जिससे ग्रामीणों में यह संदेश गया कि विभाग अपने कर्मचारियों को बचाने का प्रयास कर रहा है। चंदन गिरी ने कहा कि इसी उपेक्षा और कथित अन्याय के कारण वह इतना आक्रोशित हुआ कि आत्मदाह जैसा कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर हो गया। हालांकि अधिकारियों के समझाने पर उसने अपना निर्णय बदल दिया, लेकिन उसने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो ग्रामीण लोकतांत्रिक तरीके से अपना आंदोलन जारी रखेंगे। चंदन गिरी की इस चेतावनी के बाद प्रशासन ने भी पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के सम्मान और न्याय का प्रश्न बन चुका है।

दूसरी ओर वन विभाग ने भी इस पूरे विवाद पर अपना आधिकारिक पक्ष रखते हुए अलग तस्वीर सामने रखी है। पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह के अनुसार प्रारंभिक जानकारी में यह बात सामने आई है कि संबंधित फॉरेस्ट गार्ड ने जंगल के भीतर से यूकेलिप्टस के पेड़ काटे जाने के आरोप में ग्रामीण को पकड़ा था। विभाग का कहना है कि वन संपदा की सुरक्षा उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है और यदि किसी व्यक्ति द्वारा अवैध कटान किया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है। हालांकि मारपीट के आरोप सामने आने के बाद विभाग ने इसे गंभीर विषय मानते हुए तत्काल विभागीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह ने स्पष्ट किया कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी और यदि किसी कर्मचारी की भूमिका दोषपूर्ण पाई जाती है तो उसके खिलाफ नियमों के अनुरूप कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों ने भी पूरे मामले की लिखित तहरीर पुलिस को सौंप दी है। पुलिस ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए स्वतंत्र जांच शुरू कर दी है और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। अब यह मामला दो समानांतर जांचों के दायरे में पहुंच चुका है, जहां एक ओर वन विभाग अपनी आंतरिक जांच कर रहा है तो दूसरी ओर पुलिस कानूनी पहलुओं की पड़ताल में जुटी है। फिलहाल पूरे क्षेत्र में स्थिति पर प्रशासन लगातार नजर बनाए हुए है। स्थानीय लोगों की निगाहें अब विभागीय जांच रिपोर्ट और पुलिस की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि इन्हीं दोनों प्रक्रियाओं से यह स्पष्ट होगा कि आरोप कितने सही हैं, जिम्मेदारी किसकी बनती है और कानून के अनुसार आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि वन संरक्षण और कानून के पालन के साथ-साथ सरकारी तंत्र में संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी ऐसी घटना का प्रभाव केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज के विश्वास को प्रभावित करता है।

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