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राम मंदिर की चोरी ने उठाए आस्था चरित्र और समाज पर सबसे बड़े सवाल जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

पुलिस की जांच अपनी दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन इस घटना ने कानून व्यवस्था से कहीं बड़े सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विमर्श को जन्म दे दिया है। आखिर किस चोरी ने पूरे देश को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया।

भारत(सुनील कोठारी)। राम मंदिर में हुई चोरी की घटना पहली नजर में एक सामान्य आपराधिक वारदात प्रतीत हो सकती है, लेकिन जब इस घटना की परतें सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से खोली जाती हैं तो यह केवल एक मंदिर से सामान गायब होने का मामला नहीं रह जाता। पुलिस अपनी नियमित प्रक्रिया के तहत जांच में जुटी है और यह कह रही है कि पूरे मामले की गंभीरता से पड़ताल की जा रही है। दूसरी ओर राजनीतिक गलियारों में इस घटना को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। किसी ने इसे सुनियोजित षड्यंत्र बताया तो किसी ने इसे धार्मिक आस्था पर हमला करार दिया। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक बहस का ऐसा दौर शुरू हुआ कि छोटी-सी खबर अचानक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। यह विडंबना भी कम नहीं कि जिस चोर का उद्देश्य संभवतः केवल चोरी करना रहा होगा, वह अनजाने में देशभर की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक चर्चाओं का केंद्र बन गया। यदि उस चोर को यह पता चलता कि उसकी करतूत पर इतने लंबे भाषण दिए जाएंगे, इतने बयान जारी होंगे और इतनी गंभीर बहसें खड़ी हो जाएंगी, तो शायद वह स्वयं भी हैरान रह जाता। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह नहीं कि चोरी किसने की, बल्कि यह है कि इस घटना ने समाज के सामने कौन-कौन से प्रश्न खड़े कर दिए। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि भगवान राम के मंदिर में हुई चोरी ने सबसे पहले हमारी सामूहिक चेतना, हमारे सामाजिक चरित्र और हमारी नैतिक जिम्मेदारियों को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। यही वह प्रश्न है जो इस घटना को एक साधारण अपराध से कहीं अधिक बड़ा सामाजिक विषय बना देता है।

धार्मिक आस्था का नाम लेते हुए देश में प्रतिदिन अनगिनत भाषण दिए जाते हैं। राजनीतिक मंचों पर, सामाजिक आयोजनों में और सार्वजनिक सभाओं में “जय श्रीराम” का उद्घोष लगातार सुनाई देता है। अनेक नेता अपने संबोधन की शुरुआत भगवान राम के नाम से करते हैं और स्वयं को राम के आदर्शों का अनुयायी बताने में गर्व महसूस करते हैं। लेकिन जब उसी समाज में राम मंदिर जैसी पवित्र जगह भी चोरी जैसी घटना से सुरक्षित नहीं रह पाती, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारी श्रद्धा केवल शब्दों तक सीमित होकर रह गई है। क्या राम का नाम केवल नारे लगाने का माध्यम बन गया है और उनके जीवन के आदर्श हमारे व्यवहार से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। यह विरोधाभास इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भगवान राम केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि मर्यादा, सत्य, कर्तव्य, न्याय और आदर्श जीवन के सर्वोच्च मानक माने जाते हैं। यदि समाज उनके नाम का उपयोग तो लगातार करता रहे, लेकिन उनके सिद्धांतों को अपने आचरण में स्थान न दे, तो ऐसी घटनाएं केवल सुरक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि सामाजिक चरित्र के कमजोर पड़ने का संकेत भी मानी जाएंगी। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ केवल मंदिर में सिर झुकाना नहीं बल्कि जीवन में ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और मर्यादा को अपनाना भी है। जब इन मूल्यों का क्षरण होता है, तब मंदिरों के दरवाजों पर लगे मजबूत ताले भी समाज के भीतर पैदा हो रही नैतिक दरारों को नहीं रोक पाते।

धार्मिक स्थलों पर होने वाली चोरी को केवल कुछ बहुमूल्य वस्तुओं, दानपात्रों या आभूषणों की हानि मान लेना इस पूरे विषय को बहुत सीमित दृष्टि से देखने जैसा होगा। किसी भी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या गिरजाघर में होने वाला अपराध उस स्थान की पवित्रता के साथ-साथ समाज के सामूहिक विश्वास को भी चोट पहुंचाता है। चोर जब किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश करता है तो वह केवल वहां रखी वस्तुओं को नहीं ले जाता, बल्कि लोगों की उस भावना को भी आहत करता है जिसके आधार पर श्रद्धालु वहां विश्वास और सम्मान के साथ आते हैं। यही कारण है कि ऐसी घटनाएं सामान्य चोरी की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील मानी जाती हैं। समाज की नैतिकता का मूल्यांकन केवल कानून के आधार पर नहीं होता, बल्कि इस बात से भी होता है कि लोग किन स्थानों और किन मूल्यों का सम्मान करते हैं। यदि धार्मिक स्थलों की गरिमा भी अपराधियों के लिए मायने नहीं रखती, तो यह केवल अपराधियों की निर्भीकता नहीं बल्कि समाज की नैतिक चेतना के कमजोर पड़ने का भी संकेत है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसके विशाल मंदिरों, ऊंचे शिखरों या भव्य धार्मिक आयोजनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां रहने वाले लोग कितनी ईमानदारी, जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ जीवन जीते हैं। जब इन गुणों का ह्रास होता है तो अपराध केवल आंकड़ों में नहीं बढ़ते, बल्कि विश्वास भी धीरे-धीरे कम होने लगता है।

राम का नाम भारतीय समाज में केवल धार्मिक उच्चारण नहीं बल्कि आदर्श जीवन की प्रेरणा माना गया है। सदियों से भगवान राम को सत्य, त्याग, करुणा, कर्तव्य और मर्यादा के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन वर्तमान समय में यह चिंता लगातार व्यक्त की जा रही है कि कहीं राम का नाम केवल नारों और राजनीतिक अभियानों तक सीमित तो नहीं होता जा रहा। यदि राम केवल भाषणों में उपस्थित रहें और उनके सिद्धांत दैनिक जीवन से अनुपस्थित होते जाएं, तो समाज में विश्वास की नींव कमजोर होना स्वाभाविक है। मंदिरों में ताले मजबूत किए जा सकते हैं, सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जा सकती है और निगरानी के आधुनिक साधन लगाए जा सकते हैं, लेकिन यदि मनुष्य के भीतर का नैतिक प्रहरी कमजोर पड़ जाए तो बाहरी सुरक्षा भी सीमित साबित होती है। वास्तव में किसी भी सभ्यता की रक्षा केवल पत्थरों से बने भव्य मंदिर नहीं करते, बल्कि उन लोगों का चरित्र करता है जो उन मंदिरों में श्रद्धा लेकर पहुंचते हैं। यदि व्यक्ति के भीतर ईमानदारी, मर्यादा और कर्तव्यबोध जीवित है तो समाज सुरक्षित रहता है। लेकिन जब भीतर का राम सो जाता है, तब बाहर का मंदिर भी स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता। यही कारण है कि यह घटना केवल पुलिस की जांच या अपराधी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे आत्ममंथन का अवसर भी माना जाना चाहिए कि आखिर हमारे सामाजिक जीवन में कौन-से ऐसे परिवर्तन आए हैं जिन्होंने नैतिक मूल्यों को कमजोर किया है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि चोरी की घटना पर लगभग हर व्यक्ति दुख और आक्रोश व्यक्त करता दिखाई देता है, लेकिन वही समाज अपने दैनिक जीवन में होने वाली नैतिक चोरियों को अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देता है। सच बोलने की चोरी, जिम्मेदारी निभाने की चोरी, कर्तव्य से बचने की चोरी, संवेदनाओं की चोरी, करुणा की चोरी और ईमानदारी की चोरी जैसी अनेक घटनाएं प्रतिदिन हमारे आसपास घटती रहती हैं, लेकिन उनके लिए शायद ही कभी कोई प्राथमिकी दर्ज होती है या कोई सार्वजनिक बहस होती है। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि सोना, चांदी, आभूषण और दानपात्र जैसी भौतिक वस्तुएं कभी न कभी वापस मिल सकती हैं, लेकिन यदि किसी समाज से लज्जा, मर्यादा, विवेक और नैतिकता चोरी हो जाए तो उसकी भरपाई करना अत्यंत कठिन हो जाता है। ऐसे समय में सबसे बड़ा चोर हमेशा जेल की सलाखों के पीछे नहीं मिलता, बल्कि वह समाज के भीतर फैली उस मानसिकता में दिखाई देता है जो धीरे-धीरे सही और गलत के बीच का अंतर मिटा देती है। इसलिए आवश्यक है कि कानून अपना काम पूरी दृढ़ता से करे, अपराधी को गिरफ्तार किया जाए और उसे उचित दंड मिले, लेकिन इसके साथ-साथ समाज भी स्वयं से यह प्रश्न पूछे कि कहीं वर्षों से हमारे भीतर बैठे भगवान राम के आदर्श तो धीरे-धीरे लुप्त नहीं होते जा रहे। यदि इस अदृश्य चोरी को नहीं रोका गया, तो केवल मंदिरों की सुरक्षा बढ़ा देने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। वास्तविक आवश्यकता उस नैतिक जागरण की है जो व्यक्ति के भीतर सत्य, मर्यादा, करुणा और ईमानदारी को फिर से जीवित करे। तभी भगवान राम का नाम केवल उद्घोष नहीं रहेगा, बल्कि समाज के चरित्र का आधार बनेगा और तब “बोल सिया बलीराम चंद्र की” जैसी आस्था केवल शब्द नहीं बल्कि जीवन का व्यवहारिक सत्य बन सकेगी।

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