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आचार्य देवेन्द्र देव की पुस्तकों के विमोचन से साहित्यिक जगत में गूंजा संवेदना और चेतना का संदेश

वरिष्ठ साहित्यकार की रचनाओं में मानवीय मूल्यों, भारतीय संस्कृति और सामाजिक सरोकारों के समन्वय पर वक्ताओं ने रखे विचार, विद्यार्थियों को मिली साहित्यिक दृष्टि और रचनात्मक अनुभवों की नई सीख।

रामनगर। पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामनगर में गुरुवार को साहित्य, संवेदना और सामाजिक चेतना से जुड़ा एक गरिमापूर्ण आयोजन देखने को मिला। महाविद्यालय के हिंदी विभाग के तत्वावधान में मयूर सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की पुस्तकों के विमोचन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान डॉ. सकीवा के काव्य-संग्रह का भी लोकार्पण किया गया। पुस्तक विमोचन के इस आयोजन में महाविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों, साहित्य प्रेमियों तथा क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने उत्साह के साथ सहभागिता की। कार्यक्रम का वातावरण पूरी तरह साहित्यिक रंग में रंगा नजर आया और वक्ताओं ने साहित्य को समाज की चेतना, संस्कार और दिशा निर्धारित करने वाली महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में रेखांकित किया। समारोह की शुरुआत अतिथियों द्वारा आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की पुस्तकों के विधिवत विमोचन के साथ हुई। इस अवसर पर उनकी साहित्यिक यात्रा, रचनात्मक दृष्टिकोण तथा लेखन में दिखाई देने वाले सामाजिक सरोकारों पर विस्तार से चर्चा की गई। आयोजन का उद्देश्य केवल पुस्तकों का लोकार्पण करना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों को साहित्य की उस जीवंत परंपरा से जोड़ना भी रहा, जिसमें रचनाकार अपने अनुभवों और विचारों के माध्यम से समाज की वास्तविक तस्वीर सामने रखता है।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम.सी. पांडे ने अपने संबोधन में साहित्य की व्यापक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य केवल समाज की परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाला माध्यम नहीं है, बल्कि वह लोगों को सही दिशा दिखाने की क्षमता भी रखता है। उन्होंने आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की रचनात्मकता का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और जीवन-मूल्यों की गहरी छाप दिखाई देती है। उनके अनुसार किसी भी समाज की वैचारिक समृद्धि को समझने के लिए उसके साहित्य और रचनाकारों को समझना आवश्यक है। साहित्य व्यक्ति को अपने आसपास की परिस्थितियों पर विचार करने, संवेदनशील बनने और सामाजिक जिम्मेदारियों को पहचानने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों में इस प्रकार के साहित्यिक आयोजन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पुस्तक विमोचन जैसे अवसर युवा पीढ़ी को पुस्तकों और रचनाकारों के करीब लाते हैं तथा उनमें पढ़ने, समझने और विचार करने की प्रवृत्ति को मजबूत करते हैं। प्राचार्य ने इस आयोजन को महाविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि साहित्य और शिक्षा का संबंध अत्यंत गहरा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसे आयोजन भविष्य में भी निरंतर होते रहेंगे और महाविद्यालय साहित्यिक गतिविधियों का प्रभावी केंद्र बनेगा।

कार्यक्रम में मितेश्वरानंद ने आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ के साहित्यिक योगदान पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी रचनाएं जीवन और समाज की वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ के लेखन में मानवीय संवेदना, भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना का ऐसा समन्वय दिखाई देता है, जो पाठक को केवल रचना पढ़ने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे उसके भीतर छिपे संदेश और जीवनानुभवों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है। उन्होंने साहित्य की उपयोगिता पर चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखना उसके व्यापक प्रभाव को सीमित करना होगा। साहित्य व्यक्ति के संस्कारों को मजबूत करता है और उसके चरित्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उनके अनुसार समाज में सकारात्मक सोच, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को आगे बढ़ाने में रचनाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों से साहित्य पढ़ने और विभिन्न रचनाकारों के विचारों को समझने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकों के माध्यम से विद्यार्थी अपने आसपास की दुनिया को एक अलग दृष्टिकोण से देख सकते हैं। आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की पुस्तकों के विमोचन को उन्होंने साहित्य जगत और महाविद्यालय दोनों के लिए उल्लेखनीय अवसर बताया तथा उनकी आगामी रचनात्मक यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं।

इसी क्रम में प्रोफे0 अधीर कुमार ने आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उनका साहित्य उनकी व्यापक जीवन-दृष्टि, गहरी संवेदनशीलता और समाज के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। उनके अनुसार आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ का व्यक्तित्व सहज, सरल और साहित्य के प्रति निरंतर समर्पित रहा है, जिसकी झलक उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि किसी रचनाकार की पहचान केवल उसकी पुस्तकों की संख्या से नहीं होती, बल्कि यह देखा जाता है कि उसकी रचनाएं समाज, समय और मानवीय जीवन के प्रश्नों को किस प्रकार अभिव्यक्त करती हैं। इस दृष्टि से आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ का लेखन महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में समाज के विभिन्न पक्षों के साथ संस्कृति, प्रकृति और मानवीय जीवन के विविध अनुभवों का प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब तेजी से बदलती जीवनशैली के कारण लोगों का पुस्तकों से जुड़ाव कम होता दिखाई दे रहा है, ऐसे समय में साहित्यिक आयोजनों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। इस तरह के कार्यक्रम युवा विद्यार्थियों को साहित्यकारों के अनुभवों से जोड़ते हैं और उनमें रचनात्मक सोच विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

विमोचन समारोह के दौरान विद्यार्थियों में भी विशेष उत्साह दिखाई दिया। छात्र-छात्राओं ने आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की रचनात्मक यात्रा और उनके साहित्यिक अनुभवों के बारे में जानकारी हासिल की तथा कार्यक्रम की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाई। विद्यार्थियों के लिए यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि उन्हें पाठ्यक्रम से अलग साहित्य के उस संसार को नजदीक से समझने का अवसर मिला, जहां रचनाकार अपने जीवन अनुभवों, सामाजिक परिस्थितियों और मानवीय भावनाओं को शब्दों का रूप देता है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि पुस्तकों का अध्ययन केवल परीक्षा और शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह व्यक्ति के चिंतन और व्यक्तित्व को व्यापक बनाने का माध्यम भी है। साहित्य पढ़ने से भाषा पर पकड़ मजबूत होने के साथ-साथ संवेदनशीलता और कल्पनाशक्ति का भी विकास होता है। विद्यार्थियों ने साहित्यकार की रचनात्मक यात्रा से जुड़े विभिन्न पहलुओं को जाना और यह समझने का प्रयास किया कि एक लेखक अपने आसपास के समाज को किस प्रकार अपनी रचनाओं का विषय बनाता है। इस सहभागिता ने समारोह को और अधिक जीवंत बना दिया। महाविद्यालय के शिक्षकों ने भी विद्यार्थियों को साहित्यिक गतिविधियों से निरंतर जुड़ने के लिए प्रेरित किया और कहा कि पढ़ने की आदत व्यक्ति को विचारशील तथा जागरूक नागरिक बनाने में अहम भूमिका निभाती है।

हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. पुनिता कुशवाहा ने अपने संबोधन में आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की पुस्तकों के विमोचन को विभाग के लिए गौरवपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ का साहित्य समकालीन समाज की संवेदनाओं, जीवन के विविध अनुभवों और मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है। उनके अनुसार साहित्य समाज में घट रही घटनाओं और बदलते परिवेश को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। रचनाकार जब अपने अनुभवों और दृष्टिकोण को शब्द देता है तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए विचार और अनुभव की एक महत्वपूर्ण विरासत भी तैयार करता है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय का हिंदी विभाग साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है और इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों तथा साहित्य जगत के बीच मजबूत संवाद स्थापित करने में सहायक होते हैं। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद साहित्य प्रेमियों और विद्यार्थियों की सहभागिता को आयोजन की सफलता का महत्वपूर्ण आधार बताया। डॉ. पुनिता कुशवाहा ने कहा कि वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत होते हैं। ऐसे अवसरों पर विद्यार्थियों को न केवल साहित्यकारों के लेखन से परिचित होने का मौका मिलता है, बल्कि उनके संघर्ष, अनुभव और रचनात्मक दृष्टि को समझने का अवसर भी प्राप्त होता है। उन्होंने सभी सहयोगियों के प्रति आभार जताते हुए भविष्य में भी साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

समारोह का मंच संचालन डॉ. अलका ने प्रभावी और गरिमापूर्ण ढंग से किया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों, साहित्यकारों और वक्ताओं का परिचय कराते हुए आयोजन की विभिन्न गतिविधियों को निर्धारित क्रम में आगे बढ़ाया। उनके संचालन ने पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुस्तक विमोचन के दौरान सभागार में मौजूद साहित्य प्रेमियों और विद्यार्थियों ने रचनाकारों के प्रति अपनी रुचि और सम्मान व्यक्त किया। कार्यक्रम में डॉ. सकीवा के काव्य-संग्रह का लोकार्पण भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इस अवसर ने उपस्थित लोगों को अलग-अलग रचनात्मक दृष्टियों और साहित्यिक अभिव्यक्तियों से परिचित होने का अवसर दिया। समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन केवल औपचारिक गतिविधि नहीं बल्कि समाज और नई पीढ़ी के बीच संवाद स्थापित करने का प्रभावी माध्यम है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों में भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति रुचि विकसित होती है। साथ ही उन्हें स्थानीय स्तर पर सक्रिय साहित्यकारों के योगदान को समझने का अवसर मिलता है। महाविद्यालय के मयूर सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम ने शिक्षा और साहित्य के बीच मौजूद मजबूत रिश्ते को भी सामने रखा। पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान पूरे परिसर में साहित्यिक विमर्श का वातावरण बना रहा और उपस्थित लोगों ने आयोजन को ज्ञानवर्धक तथा प्रेरणादायी बताया।

आयोजन में शहर और क्षेत्र के अनेक साहित्यप्रेमी, गणमान्य नागरिक, प्राध्यापक तथा विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम में डॉ. संजय अग्रवाल, देवेंद्र सिंह रावत, प्रभाकर सारस्वत, हिमांशु, कैप्टन पूरन सिंह बिष्ट, सुमित लखोटिया, सुमंत घोष, विनोद पपने, निखिलेश उपाध्याय, आनंद कड़ाकोटी, टीम कॉर्बेट क्लीन ट्रेल्स, डॉ. एस. पी. मिश्रा, गणेश रावत, विनीत रेखाड़ी, अनिता आनंद, धनेश्वरी गिरिडयाल, मंगल सिंह, संजीव शर्मा और मोहन पाठक सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। इनकी मौजूदगी ने समारोह की गरिमा को और बढ़ाया तथा यह स्पष्ट किया कि रामनगर में साहित्यिक गतिविधियों के प्रति समाज के विभिन्न वर्गों में रुचि बनी हुई है। आयोजन में शामिल लोगों ने पुस्तकों के विमोचन को साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल बताते हुए रचनाकारों के योगदान की सराहना की। वहीं विद्यार्थियों के लिए यह कार्यक्रम साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के साथ संवाद स्थापित करने का अवसर भी बना। कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. पुनिता कुशवाहा ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और आयोजन में सहयोग देने वाले लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी के सहयोग और सहभागिता से ही इस प्रकार के आयोजन सफल और सार्थक बनते हैं। समापन के साथ ही महाविद्यालय में आयोजित यह साहित्यिक समारोह विद्यार्थियों और उपस्थित साहित्य प्रेमियों के बीच आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की रचनात्मक यात्रा की यादें छोड़ गया।

समग्र रूप से देखा जाए तो पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित यह पुस्तक विमोचन समारोह केवल दो साहित्यिक कृतियों को पाठकों के सामने लाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने साहित्य, शिक्षा और सामाजिक चेतना के बीच संबंध को भी मजबूती से रेखांकित किया। आचार्य देवेन्द्र ‘देव’ की पुस्तकों के विमोचन और डॉ. सकीवा के काव्य-संग्रह के लोकार्पण ने महाविद्यालय के साहित्यिक वातावरण को नई ऊर्जा दी। वक्ताओं के विचारों में साहित्य की सामाजिक उपयोगिता, मानवीय संवेदनाओं, भारतीय संस्कृति, जीवन-मूल्यों और रचनात्मक चिंतन जैसे विषय प्रमुखता से उभरकर सामने आए। विद्यार्थियों की सक्रिय उपस्थिति ने कार्यक्रम को युवा ऊर्जा से जोड़ा, जबकि वरिष्ठ साहित्यकारों और प्राध्यापकों की मौजूदगी ने इसे वैचारिक गहराई प्रदान की। कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि पुस्तकों और साहित्यिक विमर्श की प्रासंगिकता आज के बदलते दौर में कम नहीं हुई है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों को समझने के लिए साहित्य की आवश्यकता और अधिक महसूस की जा रही है। महाविद्यालय का हिंदी विभाग इस दिशा में निरंतर प्रयास करता रहा है और यह आयोजन उसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। समारोह के माध्यम से विद्यार्थियों को वरिष्ठ साहित्यकार के अनुभवों और रचनात्मक संसार से परिचित होने का अवसर मिला। इस सफल आयोजन ने रामनगर के साहित्यिक एवं शैक्षणिक परिवेश को समृद्ध करने के साथ-साथ आने वाले समय में ऐसे और आयोजनों की संभावनाओं को भी मजबूत किया।

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