रामनगर। राजनीतिक गतिविधियों और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उत्तराखंड में एक नया विवाद उस समय गहरा गया जब उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए रवाना होने के दौरान पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का मामला सार्वजनिक हुआ। इस घटना के विरोध में शनिवार को रामनगर का माहौल पूरी तरह आंदोलित दिखाई दिया। विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, श्रमिक, व्यापारी और जनसंगठनों से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों ने रामनगर कोतवाली पहुंचकर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कोतवाली का घेराव करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार बताया और कहा कि किसी नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से रोकना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है। प्रदर्शन के दौरान मौजूद लोगों ने प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए तत्काल रिहाई की मांग उठाई और कहा कि यदि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले लोगों को भी पुलिस बल के माध्यम से रोका जाएगा तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत होगा। आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि सरकार विरोधी आवाजों को दबाने के लिए प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है। पूरे घटनाक्रम ने क्षेत्र में राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया तथा इस कार्रवाई को लेकर विभिन्न संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे असहमति के अधिकार पर हमला करार दिया।
बताया गया कि उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित प्रस्तावित कार्यक्रम में भाग लेने के उद्देश्य से ऋषिकेश से ट्रेन द्वारा रवाना हो रहे थे। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार तथा शिक्षा नीति से जुड़े विभिन्न सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना था। आरोप है कि 19 जुलाई की शाम लगभग पांच बजे जैसे ही ट्रेन ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर थी, उसी दौरान पुलिस अधिकारियों ने उन्हें ट्रेन से नीचे उतार लिया और हिरासत में ले लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य केवल उन्हें जंतर-मंतर पहुंचने से रोकना था। घटना की जानकारी मिलते ही विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और जनआंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी फैल गई। उनके अनुसार किसी व्यक्ति को बिना स्पष्ट कानूनी आधार बताए इस प्रकार यात्रा के दौरान रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने कहा कि यदि सरकार अपने विरोधियों की आवाज सुनने के बजाय उन्हें रास्ते में ही रोकने की नीति अपनाएगी तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होंगे। प्रदर्शनकारियों ने इस पूरी कार्रवाई को राजनीतिक प्रेरित बताते हुए इसकी निष्पक्ष जांच कराने की भी मांग उठाई।
घटनाक्रम के अगले दिन 20 जुलाई को दोपहर लगभग दो बजे प्रभात ध्यानी को पुलिस हिरासत से रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने उनका स्वागत करते हुए रामनगर में जुलूस निकाला और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। बड़ी संख्या में लोगों ने हाथों में तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारे लगाए तथा शिक्षा व्यवस्था, लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और उसे बलपूर्वक रोकना स्वीकार्य नहीं हो सकता। रिहाई के बाद निकाले गए जुलूस में मौजूद लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था आम जनता की पहुंच से लगातार दूर होती जा रही है। प्रदर्शन के दौरान यह भी कहा गया कि शिक्षा का बढ़ता निजीकरण समाज में आर्थिक असमानता को और गहरा कर रहा है। आंदोलनकारियों ने नई शिक्षा नीति को वापस लेने की मांग दोहराते हुए कहा कि देश में ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू होनी चाहिए जिसमें अमीर और गरीब के बीच किसी प्रकार का भेदभाव न हो। उनका कहना था कि सभी नागरिकों को समान, वैज्ञानिक, गुणवत्तापूर्ण, मातृभाषा आधारित तथा निशुल्क शिक्षा का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित किया जाना चाहिए और इसके लिए आवश्यक हो तो संविधान में संशोधन किया जाए।

रिहाई के बाद मीडिया और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए प्रभात ध्यानी ने पूरी घटना का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे लोगों को प्रशासनिक स्तर पर रोका गया, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि सरकार विरोधी आवाजों को दबाने के लिए पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग किया जा रहा है। प्रभात ध्यानी ने दावा किया कि 19 जुलाई की शाम लगभग पांच बजे ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर कोतवाली पुलिस ऋषिकेश के एस एस आई नवीन जोशी ने जीआरपी कर्मियों के सहयोग से उन्हें ट्रेन से नीचे उतार लिया। उनके अनुसार पुलिस ने न केवल उन्हें हिरासत में लिया बल्कि उनका सामान और मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने इस कार्रवाई का आधार पूछा तो उन्हें यह जानकारी दी गई कि नैनीताल पुलिस से इनपुट प्राप्त हुआ है और उसी के आधार पर उन्हें जंतर-मंतर जाने से रोकने के निर्देश दिए गए हैं। प्रभात ध्यानी का कहना है कि कुछ समय बाद उन्हें रामनगर कोतवाली लाया गया, जहां कोतवाल सुशील कुमार के सुपुर्द कर दिया गया और पूरी रात उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया। उन्होंने इस कार्रवाई को पूर्णतः अनुचित बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश करने वालों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया।
अपने आरोपों को आगे बढ़ाते हुए प्रभात ध्यानी ने यह भी कहा कि हिरासत के दौरान उनके परिवार और मित्रों को उनकी गिरफ्तारी अथवा हिरासत की सही जानकारी समय पर नहीं दी गई। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया स्थापित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी और इससे उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने की स्थिति में उसके परिजनों अथवा निकट संबंधियों को तत्काल सूचना देना कानून की मूल भावना का हिस्सा है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। इसी मुद्दे को लेकर उनके पक्ष की ओर से उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई है। बताया गया कि इस याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है तथा मामले में जवाब तलब किया है। जानकारी के अनुसार इस प्रकरण में आगे की सुनवाई अगले दिन प्रस्तावित है, जिस पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है और उन्हें उम्मीद है कि न्यायालय इस पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा करेगा। इस बीच राजनीतिक हलकों में भी इस घटना को लेकर चर्चा तेज हो गई है और कई संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया है। विरोध कर रहे लोगों ने कहा कि यदि भविष्य में भी शांतिपूर्ण आंदोलनों को इसी प्रकार रोका गया तो प्रदेशभर में व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा।
रामनगर कोतवाली परिसर में आयोजित विरोध प्रदर्शन में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, श्रमिक, महिला और व्यापारी संगठनों के प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। इस अवसर पर मनीष कुमार, जगमोहन सिंह, गिरीश चंद्र, व्यापार मंडल के संरक्षक मनमोहन अग्रवाल, देवभूमि व्यापार मंडल के अध्यक्ष मनिंदर सिंह सेठी, इंकलाबी मजदूर केंद्र के रोहित रुहेला, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के मोहम्मद आसिफ, सुनील, लालमणि, किरण, महिला एकता मंच की कौशल्या, सरस्वती, ललिता रावत, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की तुलसी छिंबाल, शीला शर्मा, आइसा नेता सुमित कुमार, राज्य आंदोलनकारी पुष्कर दुर्गापाल, चंद्रशेखर जोशी, इंदर सिंह मनराल, रईस अहमद, देवेंद्र भट्ट, एडवोकेट सुरेश नैनवाल, एडवोकेट प्रकाश बिष्ट, मोहन कांडपाल, कमल करगेती, हेम जोशी तथा टी के खान शाहिद सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की आवाज को दबाने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान खोजा जाना चाहिए। प्रदर्शन के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं दोहराई गईं तो आंदोलन को और व्यापक स्वरूप दिया जाएगा। प्रदर्शनकारियों ने अंत में सरकार से लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा, शांतिपूर्ण आंदोलनों का सम्मान तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग करते हुए पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।





