प्रयागराज। माघ मेले में इस वर्ष का संगम स्नान विवाद अब पूरी तरह मीडिया और जनमानस की नजरों में है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मेला प्रशासन ने रथ में सवार होकर संगम स्नान करने से रोक दिया। प्रशासन ने साधुओं को पैदल मार्ग से संगम पहुंचने का निर्देश दिया, जिससे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आहत हुए और अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रशासन उन्हें ससम्मान स्नान के लिए नहीं ले जाएगा, वे अन्न-जल त्याग करके ही धरने पर रहेंगे। इस दौरान पुलिस और साधु-संतों के बीच भी हाथापाई हुई। स्वामी के अनुयायियों ने पुलिस पर मारपीट और रथ रोकने का आरोप लगाया। प्रशासन की ओर से बाद में प्रस्ताव आया कि स्वामी को सम्मानपूर्वक रथ से संगम ले जाकर स्नान करने दिया जाएगा, लेकिन स्वामी ने बुझे मन के साथ प्रस्ताव ठुकरा दिया और बिना स्नान के मेला छोड़ने का एलान कर दिया।
माघ मेला प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों ने लगातार समझाने का प्रयास किया। कमिश्नर सौम्या अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार और डीएम मनीष कुमार वर्मा ने स्वामी को संगम तक जाने की अनुमति देने के लिए वार्ता की, लेकिन स्वामी ने किसी भी प्रकार की समझौता की पेशकश स्वीकार नहीं की। इस दौरान पुलिस बल ने रथ को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। साधु-संतों और पुलिस कर्मियों के बीच हुई झड़प में कई अनुयायी घायल हुए। उन्हें बाद में अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल अनुयायियों को सम्मानपूर्वक अभिवादन करने का था, लेकिन प्रशासन ने जानबूझकर अभद्रता की। उन्होंने प्रशासन पर साधु-संतों के साथ मारपीट का आरोप लगाया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि अगर उन्हें पैदल मार्ग से संगम तक जाने को कहा जाता, तो भीड़ के कारण भगदड़ की संभावना थी। इसलिए उन्होंने रथ का चयन किया, ताकि ऊंचाई से श्रद्धालुओं का अभिवादन स्वीकार किया जा सके और अव्यवस्था न फैले। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों की मारपीट और अनुयायियों के प्रति अभद्र व्यवहार पर तीखी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि उनका शंकराचार्य होने का गरिमा अनुरूप ही मौनी अमावस्या के दिन स्नान करना था, जो प्रशासन ने रोका। इस घटना ने धार्मिक स्वतंत्रता और शांति के साथ विश्वास को हिला दिया।
माघ मेले में प्रशासन की ओर से 18 जनवरी 2026 को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजा गया। नोटिस में कहा गया कि सर्वाेच्च न्यायालय में विचाराधीन मामले के बावजूद खुद को शंकराचार्य घोषित करना न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है। स्वामी ने अपने वकील पीपी मिश्रा के माध्यम से नोटिस को दुर्भावनापूर्ण और अवैध बताते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब देने का आग्रह किया। उनका कहना था कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रशासन ने बाधित किया। नोटिस पर स्वामी का जवाब प्रशासन के रवैये की आलोचना और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का स्पष्ट संदेश था।
अगले दिन 19 जनवरी 2026 को शंकराचार्य ने अन्न-जल त्याग कर धरने पर बैठने का फैसला किया। उन्होंने पूरे दिन और रात खुले आसमान के नीचे विरोध किया। स्वामी ने कहा कि जब तक प्रशासन उनसे माफी नहीं मांगेगी, वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। इस दौरान 12 अनुयायी घायल हुए, जिनमें से तीन को अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्वामी ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने जानबूझकर उनकी उपस्थिति में साधु-संतों के साथ मारपीट की। उन्होंने कहा कि यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि धर्म और मानवता के खिलाफ किया गया व्यवहार है। शंकराचार्य ने पुलिस कार्रवाई के पीछे योगी आदित्यनाथ का इशारा होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार उन्हें डराना चाहती है और गो रक्षा के मुद्दे पर दबाव डाल रही है। स्वामी ने यह भी कहा कि उनके साथ मारपीट और अपमान की घटनाओं के बावजूद वे मरने से नहीं डरते। उन्होंने बताया कि प्रशासन द्वारा उन्हें रोकने का उद्देश्य धार्मिक आस्था और सनातन परंपरा को दबाना है। यह विवाद पूरे हिंदू समाज में गहरा आहत करने वाला साबित हुआ।

20 जनवरी को काशी में दंडी संन्यासियों ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में सांकेतिक अनशन रखा। उन्होंने प्रशासन से संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इस दौरान समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि माघ मेले में संतों का अपमान अव्यवस्था का परिणाम है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार व्यवस्थाओं की बजाय प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान दे रही है। 21 जनवरी 2026 को शंकराचार्य ने प्रशासन को चेतावनी दी कि नोटिस वापस नहीं लिया गया तो मानहानि का केस करेंगे। उनके वकील एडवोकेट अंजनी कुमार मिश्रा ने नोटिस को अवमानना पूर्ण, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है जिससे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य पद से रोक दिया गया हो। माघ मेले के दौरान प्रशासन की यह कार्रवाई धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
22 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद और राष्ट्रीय बजरंग दल के संस्थापक डॉ. प्रवीण तोगड़िया ने शंकराचार्य विवाद पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज में बंटवारा खड़ा हो रहा है, जिससे भारत में सनातन परंपराओं की स्थिरता खतरे में पड़ रही है। तोगड़िया ने सुझाव दिया कि शंकराचार्य और गोरक्षनाथ पीठ मिलकर समस्या का समाधान करें। उन्होंने कहा कि माघ मेले में साधु-संतों को सम्मानपूर्वक स्नान कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने 22 जनवरी को योगी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर शंकराचार्य को अपमानित कर रही है। इसके बाद 23 जनवरी को योग गुरु बाबा रामदेव ने विवाद पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सनातनियों के बीच विवाद नहीं होना चाहिए। शंकराचार्य को भगवान स्वरूप मानकर उनके सम्मान की रक्षा करनी चाहिए। 24 जनवरी को सुभासपा प्रमुख और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि कानून का राज कायम रहना चाहिए। उन्होंने सरकार को चेताया कि बिना अनुमति किसी कार्यक्रम का आयोजन करना कानून-व्यवस्था को बिगाड़ सकता है। उसी दिन, अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर के बाहर युवकों ने नारेबाजी की। इस घटना में भगवा झंडे और लाठी-डंडे शामिल थे। ज्योतिषपीठ के पंकज पांडेय ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
26 जनवरी 2026 को बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने शंकराचार्य विवाद और यूजीसी कानून के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान एक वीडियो सामने आया, जिसमें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मजिस्ट्रेट से फोन पर बात करते नजर आए। 27 जनवरी को किन्नर अखाड़ा ने महामंडलेश्वर ममता कुलकर्णी को बाहर निकाल दिया। अखाड़े के डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि विवादित बयान संगठनात्मक मर्यादा का उल्लंघन है। 27 जनवरी को अयोध्या के जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के समर्थन में इस्तीफा दिया। उन्होंने लिखा कि वे लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसी दिन शंकराचार्य ने माघ मेला बिना स्नान किए दुखी मन से छोड़ने का एलान किया। उन्होंने कहा कि पिछले 39 सालों में पहली बार ऐसा हुआ, जो उनके आध्यात्मिक सफर और विश्वास को हिला गया।
उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 5 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा प्राप्त की। छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीता। बाद में स्वामी करपात्री जी के शिष्य ब्रह्मचारी राम चौतन्य के संपर्क में आए और 15 अप्रैल 2003 को दंड संन्यास लिया। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद सितंबर 2022 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया। हालांकि इस पद को लेकर विवाद है। उनके वकील टीएन मिश्रा का कहना है कि 12 सितंबर 2022 को पट्टाभिषेक हुआ था, जिसे स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने रोकने के लिए अपील दायर की थी। कोर्ट ने पिछली कार्यवाही में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पक्षकार नहीं माना, फिर भी उन्हें शंकराचार्य कहा गया।
माघ मेले में यह विवाद न केवल प्रशासन और शंकराचार्य के बीच रहा, बल्कि राजनीतिक नेताओं, समाजिक संगठनों और संत समाज तक को प्रभावित किया। जनता, अनुयायी और मीडिया ने इसे पूरी संवेदनशीलता के साथ देखा। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक रवैये, कानून व्यवस्था और सामाजिक आस्था का मिश्रण बन गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के इस विवाद ने देश के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य में गहरी छाप छोड़ी है। इस प्रकार प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद ने पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को लेकर बहस खड़ी कर दी। साधु-संत, अनुयायी, प्रशासन, राजनीतिक दल और समाजिक संगठन इस मामले में सक्रिय रहे। विवाद के कई आयाम हैं, जिनमें प्रशासन की कार्रवाई, शंकराचार्य का हठ, अनुयायियों की नाराजगी, राजनीतिक हस्तक्षेप और मीडिया कवरेज शामिल हैं। यह घटना धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई है।





