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कभी योगी तो कभी अखिलेश से टकराने वाले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पूरी कहानी

प्रयागराज। संगम तट पर मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर जहां एक ओर करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर इस धार्मिक वातावरण में उस समय तनाव और हंगामे की स्थिति उत्पन्न हो गई जब ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुलिस प्रशासन आमने-सामने आ गए। संगम क्षेत्र में अचानक उपजे इस विवाद ने कुछ ही देर में धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक रंग ले लिया। तीर्थराज प्रयाग में सदियों से चली आ रही परंपराओं, सनातन रीति-रिवाजों और वीआईपी व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह टकराव अब केवल एक दिन की घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक चर्चा का विषय बन चुका है। साधु-संतों की मर्यादा, प्रशासन की व्यवस्था और श्रद्धालुओं की भावनाओं के बीच खिंची इस रेखा ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बना दिया, जिससे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए हैं।

मौनी अमावस्या के दिन सुबह से ही संगम तट पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा हुआ था और प्रशासन ने सुरक्षा व यातायात व्यवस्था को लेकर कड़े इंतजाम किए थे। इसी दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने लगभग दो सौ समर्थकों के साथ पारंपरिक रथ और पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए रवाना हुए। धार्मिक शंखनाद, जयघोष और भक्ति के स्वर वातावरण में गूंज रहे थे, लेकिन बैरियर पर पहुंचते ही पुलिस ने उन्हें रोक दिया। पुलिस अधिकारियों का कहना था कि मौनी अमावस्या के दिन किसी भी प्रकार का वीआईपी मूवमेंट प्रतिबंधित है और भीड़ नियंत्रण सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रशासन के अनुसार यदि इस तरह के विशेष काफिलों को अनुमति दी जाती तो अव्यवस्था फैल सकती थी। इसी बिंदु पर दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया और बात कहासुनी से आगे निकल गई, जिससे स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बैरियर पर रोके जाने के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इसे परंपराओं और सनातन अधिकारों का अपमान बताया। उनका तर्क था कि शंकराचार्य पद कोई वीआईपी सुविधा नहीं बल्कि धर्म की सर्वोच्च परंपरा का प्रतीक है, जिसे प्रशासनिक आदेशों के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। इसी बीच उन्होंने बैरियर हटाने की कोशिश की और रथ को आगे बढ़ाने पर अड़ गए। भारी भीड़, संकरे मार्ग और श्रद्धालुओं की आवाजाही के बीच यह स्थिति करीब तीन घंटे तक बनी रही। पुलिस प्रशासन का दावा है कि इस दौरान कई बार समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन जब रथ को जबरन आगे ले जाने की जिद की गई तो हालात बेकाबू हो गए। इस खींचतान ने संगम क्षेत्र की व्यवस्था को प्रभावित किया और कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

दूसरी ओर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का आरोप है कि पुलिस प्रशासन ने जानबूझकर उनके समर्थकों के साथ दुर्व्यवहार किया और उन पर बल प्रयोग किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें और उनके अनुयायियों को अनावश्यक रूप से रोका गया और बाद में हिरासत में भी लिया गया। स्वामी जी का कहना है कि यह सब किसी प्रशासनिक भूल का नहीं, बल्कि पुरानी राजनीतिक खुन्नस का परिणाम है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि सही और गलत का निर्णय आज नहीं बल्कि समय करेगा। उनके इस बयान के बाद मामला और तूल पकड़ गया, क्योंकि उनके समर्थकों ने इसे धर्म के सम्मान से जोड़ते हुए विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो और बयान वायरल होने लगे, जिससे प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठने लगे।

यदि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के जीवन पर नजर डाली जाए तो उनका सफर भी उतना ही रोचक और संघर्षपूर्ण रहा है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के छोटे से गांव ब्राह्मणपुर में जन्मे उमाशंकर पांडे एक साधारण ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। बचपन गांव की मिट्टी में बीता और कक्षा छह तक की शिक्षा उन्होंने वहीं प्राप्त की। इसके बाद परिस्थितियों ने उन्हें पिता के साथ गुजरात ले गया, जहां उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। वहां उनकी मुलाकात काशी के संत रामचैतन्य से हुई, जिन्होंने उन्हें सन्यास मार्ग की ओर प्रेरित किया। यहीं से सांसारिक जीवन से विरक्ति और आध्यात्मिक पथ पर चलने का उनका निर्णय दृढ़ होता चला गया।

काशी पहुंचने के बाद उमाशंकर पांडे का संपर्क स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के सान्निध्य में उन्होंने वैदिक परंपराओं, दर्शन और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करते हुए वे गुरु के सबसे प्रिय शिष्यों में शामिल हो गए। उनकी विद्वत्ता, स्पष्ट वक्तव्य और निर्भीक स्वभाव ने उन्हें अन्य शिष्यों से अलग पहचान दिलाई। गुरु के सान्निध्य में रहते हुए उन्होंने सनातन धर्म से जुड़े कई मुद्दों पर मुखर राय रखनी शुरू की। वर्ष 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद परंपरा के अनुसार उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित किया गया, जिसके बाद उनका प्रभाव और दायरा राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक हो गया।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम विवादों से नया नहीं है। उनका अतीत आंदोलनों, संघर्षों और सत्ता से टकराव की घटनाओं से भरा रहा है। वर्ष 2008 में गंगा संरक्षण के लिए उन्होंने काशी में 112 दिनों तक लंबा अनशन किया था, जिसने उन्हें पहली बार राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इस आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारों की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए और गंगा की अविरलता व निर्मलता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी। इसके बाद वे लगातार पर्यावरण, धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और सनातन परंपराओं के संरक्षण के मुद्दों पर मुखर रहे, जिससे कई बार प्रशासन के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण हो गए। साल 2015 में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर हुए विवाद के दौरान संतों पर लाठीचार्ज हुआ था, जिसमें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश में संत समाज के प्रति प्रशासनिक रवैये पर सवाल खड़े कर दिए थे। बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सार्वजनिक रूप से उनसे माफी मांगनी पड़ी थी। इसी तरह वर्ष 2018 में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के दौरान प्राचीन मंदिरों के विस्थापन का मुद्दा उठाकर उन्होंने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। उनका कहना था कि विकास के नाम पर परंपरा और आस्था को कुचलना स्वीकार्य नहीं है। इन आंदोलनों ने उन्हें समर्थकों की नजर में एक निर्भीक संत के रूप में स्थापित किया।

वर्ष 2022 में ज्ञानवापी परिसर में कथित रूप से मिले शिवलिंग की पूजा का ऐलान कर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक बार फिर प्रशासन की नींद उड़ा दी थी। इस घोषणा के बाद देशभर में राजनीतिक और धार्मिक हलचल तेज हो गई थी। प्रशासन ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए रोक लगाने की कोशिश की, लेकिन स्वामी जी अपने रुख पर अडिग रहे। उनका कहना था कि आस्था को कानून के दायरे में कैद नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि प्रयागराज के संगम तट पर मौनी अमावस्या के दिन हुआ ताजा विवाद भी उनके लंबे संघर्षों की श्रृंखला का एक नया अध्याय माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि धर्म, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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