नई दिल्ली(सुनील कोठारी)।13 जनवरी को जारी किए गए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नई बहस को जन्म दिया, लेकिन यह बहस जितनी तेजी से शुरू हुई उतनी ही तेजी से कानूनी मोड़ पर पहुंच गई। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए गए इन नए नियमों को महज पंद्रह दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और पहली ही सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने इन पर रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि जिस तरह से यह मसौदा तैयार किया गया है, वह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव खत्म करने के बजाय जातीय वैमनस्य को बढ़ा सकता है और सामाजिक टकराव की जमीन तैयार कर सकता है। यह असाधारण माना गया क्योंकि आम तौर पर इतने कम समय में किसी सरकारी नियम पर रोक लगना दुर्लभ होता है। इससे पहले नागरिकता संशोधन कानून जैसे बड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कई सुनवाइयों के बावजूद अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया था। बिहार चुनाव से ठीक पहले सामने आए एसआईआर जैसे मामले भी अदालत में गए, लेकिन वहां भी स्थिति वर्षों तक अनिश्चित बनी रही। ऐसे उदाहरणों के बीच यूजीसी 2026 का मात्र पंद्रह दिनों में ठहर जाना कई सवाल खड़े करता है और यही सवाल अब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं।
इस घटनाक्रम ने सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा किया कि आखिर सरकार ने इतनी जल्दी अपने कदम पीछे क्यों खींच लिए। जिस सरकार ने स्वयं यह रेगुलेशन जारी किया, उसी सरकार के वकील सुप्रीम कोर्ट के भीतर इसके समर्थन में एक भी ठोस दलील क्यों नहीं दे पाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अदालत में मौजूद थे, लेकिन उनकी खामोशी ने सभी को चौंका दिया। न्यायालय ने उनसे आग्रह किया कि वह विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का सुझाव दें, जो इस नियम के सामाजिक और संवैधानिक पहलुओं की समीक्षा कर सके, लेकिन वहां भी कोई सक्रिय पहल नहीं दिखी। यह स्थिति इस आशंका को जन्म देती है कि क्या इस मसौदे को तैयार करते समय वास्तव में किसी विशेषज्ञ की राय ली गई थी या फिर संसदीय समिति, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन और शिक्षा मंत्रालय के बीच कोई ठोस विमर्श हुआ ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि नए नियमों का ड्राफ्ट बनाते समय कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज किया गया प्रतीत होता है। यह टिप्पणी सिर्फ तकनीकी नहीं थी, बल्कि यह उस प्रक्रिया पर सवाल थी जिसके तहत इतने संवेदनशील विषय पर नियम बनाए गए।
अदालत के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल बागची की टिप्पणियों ने पूरे मुद्दे को एक व्यापक सामाजिक संदर्भ में ला खड़ा किया। न्यायालय ने कहा कि देश को जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए, लेकिन नए नियमों की भाषा और संरचना यह आभास देती है कि हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों में समान वातावरण बनाना जरूरी है, जहां छात्रों को यह महसूस न हो कि वे अलग-अलग खांचों में बांटे जा रहे हैं। एससी और एसटी छात्रों के लिए अलग हॉस्टल जैसी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि आरक्षित समुदायों के भीतर भी आर्थिक और सामाजिक विविधता है। कुछ लोग समृद्ध हैं, कुछ वंचित हैं, इसलिए किसी एक श्रेणी को एकसार मानकर नीति बनाना समस्याजनक हो सकता है। इन टिप्पणियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट केवल नियमों की वैधता नहीं, बल्कि उनके दूरगामी सामाजिक प्रभावों को भी ध्यान में रख रहा है।
वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले में सरकार की चुप्पी ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। शिक्षा मंत्री की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ कहने से बचते नजर आए। यह खामोशी ऐसे समय में सामने आई है जब देश में बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं के आक्रोश की खबरें लगातार सुर्खियों में हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक, पटना से इलाहाबाद तक, युवा सड़कों पर उतरते दिखे हैं। लद्दाख में सोनम वांगचोक से जुड़े आंदोलन ने भी यह संकेत दिया कि असंतोष सिर्फ एक राज्य या एक समुदाय तक सीमित नहीं है। ऐसे माहौल में सरकार किसी ऐसे मुद्दे को छूने से हिचकती दिख रही है, जो व्यापक स्तर पर आंदोलन का रूप ले सकता है।
देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखें तो यह डर पूरी तरह निराधार भी नहीं लगता। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन द्वारा जारी पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि रोजगार की स्थिति लगभग सभी वर्गों के लिए चिंताजनक है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और सामान्य वर्ग, सभी के भीतर बेरोजगारी और कम लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन की समस्या मौजूद है। पिछले तीन वर्षों में बेरोजगारी दर में तीन से चार प्रतिशत की वृद्धि और कुछ वर्गों में 11 प्रतिशत तक की नाजुक स्थिति ने सरकार के विकास के दावों पर सवाल खड़े किए हैं। लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 55 प्रतिशत से नीचे होना यह बताता है कि बड़ी आबादी काम के अवसरों से बाहर है। इन आंकड़ों के बीच शिक्षा से जुड़े किसी भी नियम को अगर रोजगार की वास्तविकता से काटकर देखा जाएगा, तो उसका विरोध होना तय है।
आर्थिक मोर्चे पर भी हालात कुछ ऐसे ही संकेत दे रहे हैं। डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनके लिए उपयुक्त रोजगार के अवसर नहीं बन पा रहे। रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या पांच करोड़ से अधिक होना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर तकनीकी बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के चलते नौकरियां तेजी से कम हो रही हैं। अमेजन जैसी कंपनियों द्वारा हजारों कर्मचारियों की छंटनी और टेक सेक्टर में लाखों रोजगारों का खत्म होना यह बताता है कि संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, लेकिन भारत में इसकी मार ज्यादा गहरी है। जब रोजगार की ऐसी स्थिति हो, तब शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा कोई भी नियम युवाओं की उम्मीदों और आशंकाओं को सीधे प्रभावित करता है। यही कारण है कि यूजीसी के नए रेगुलेशन को संभावित ट्रिगर के रूप में देखा जा रहा था।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और विनीत जिंदल जैसे वकीलों की दलीलों ने मुद्दे को और जटिल बना दिया। नियम 3 सी को चुनौती देते हुए यह कहा गया कि इसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा संकीर्ण है और सामान्य वर्ग को बाहर रखकर यह संदेश दिया जा रहा है कि भेदभाव केवल एक दिशा में होता है। अदालत में यह भी सवाल उठा कि जब पहले से ही धारा 3 ई मौजूद है, तो नई धारा की आवश्यकता क्या है। चीफ जस्टिस ने उदाहरण देते हुए पूछा कि अगर किसी क्षेत्रीय या भाषाई आधार पर किसी छात्र के साथ अपमानजनक व्यवहार होता है, तो क्या यह नियम उसकी समस्या का समाधान करेगा। रैगिंग जैसे मामलों में भी दुरुपयोग की आशंका जताई गई, जहां शिकायत करने वाले पर ही उल्टा आरोप लग सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट हुआ कि अदालत इस पूरे मसले को केवल जाति के चश्मे से नहीं देखना चाहती, बल्कि वह एक व्यापक, समावेशी और संतुलित ढांचा चाहती है। न्यायालय ने कहा कि एक विशेषज्ञ समिति गठित की जानी चाहिए, जिसमें सामाजिक मूल्यों और जमीनी हकीकत को समझने वाले लोग हों। इसी के साथ यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा गया और 19 मार्च की तारीख अगली सुनवाई के लिए तय की गई। तब तक के लिए नए रेगुलेशंस पर रोक लगा दी गई। यह फैसला अपने आप में यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट जल्दबाजी में किसी संवेदनशील मुद्दे को लागू करने के पक्ष में नहीं है।
राजनीतिक परिदृश्य में इस पूरे घटनाक्रम के निहितार्थ और भी गहरे हैं। 2024 के चुनावों में संविधान और जाति जनगणना जैसे मुद्दों ने जिस तरह से बहस को प्रभावित किया, उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को सतर्क कर दिया है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा यह कहना कि देश की 90 प्रतिशत आबादी हाशिए पर है, राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे चुका है। नौकरशाही, मीडिया, न्यायपालिका और नीति निर्माण के उच्च स्तरों पर प्रतिनिधित्व को लेकर उठे सवाल अब केवल चुनावी नारे नहीं रह गए हैं। ऐसे में यूजीसी जैसे संस्थान द्वारा लाया गया कोई भी नियम सीधे इस बहस से जुड़ जाता है। सरकार शायद इस आशंका में है कि अगर किसी एक वर्ग को साधने की कोशिश की गई, तो दूसरा वर्ग आंदोलन की राह पकड़ सकता है, और मौजूदा आर्थिक हालात में ऐसा आंदोलन बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है।
अंततः इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के सवाल अब एक-दूसरे से अलग नहीं देखे जा सकते। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर लगाई गई रोक केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि नीतियां बनाते समय सामाजिक संतुलन और आर्थिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार की खामोशी, संस्थानों की भूमिका और युवाओं के भीतर उभरता असंतोष आने वाले समय में भारतीय राजनीति और नीति निर्माण की दिशा तय करेगा। यह फैसला इस बात का संकेत भी है कि अगर जनता के भीतर सवाल उफनते हैं और वे संगठित रूप लेते हैं, तो उन्हें अनदेखा करना किसी भी सत्ता के लिए आसान नहीं होगा।





